अगर आपको लगता है कि वोट चोरी का हल्ला सिर्फ भारत में ही मचा हुआ है तो ऐसा नहीं है। अमेरिका में अगले महीने होने वाले मध्यावधि चुनावों के बीच सियासी गलियारों में ऐसे सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों, प्रशासन की चेतावनियों और संघीय एजेंसियों के संभावित इस्तेमाल के साये में यह मतदान निष्पक्ष और पूरी तरह सुरक्षित रह पाएगा। इसी अहम सवाल के जवाब तलाशने के लिए द न्यूयॉर्क टाइम्स ने अमेरिकी चुनाव कानून, प्रशासन और राजनीतिक रणनीतियों से जुड़े आठ प्रमुख विशेषज्ञों से चर्चा की।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
विशेषज्ञों की राय का स्पष्ट निष्कर्ष है कि अमेरिकी चुनाव प्रणाली इतनी विकेंद्रीकृत है कि इसे सीधे तौर पर हाईजैक करना असंभव है। हालांकि, ट्रंप के बयान और राजनीतिक घटनाक्रम जनता के भीतर अविश्वास और भ्रम फैला सकते हैं लेकिन इससे चुनाव नतीजे प्रभावित होने की संभावना ना के बराबर है।
एकमत राय...पूरी तरह असुरक्षित नहीं चुनाव
चर्चा में शामिल विशेषज्ञों बॉब बाउर, वनीता गुप्ता, एडवर्ड फोली, बेन गिंसबर्ग, जेसिका जॉनसन और डग थॉर्नेल ने माना कि वे वर्तमान राजनीतिक माहौल को लेकर मध्यम स्तर पर चिंतित हैं। वहीं, डेरेक मुलर व पार्कर पोलिंग जैसे जानकारों का कहना था कि बहुत ज्यादा चिंता की जरूरत नहीं है।
खास बात यह है कि किसी भी विशेषज्ञ ने यह नहीं माना कि चुनाव पूरी तरह असुरक्षित हैं। सभी आठ विशेषज्ञों ने एक स्वर में इस पर भरोसा जताया कि देश के कानूनी और प्रशासनिक अधिकारी नागरिकों के वोटों की सुरक्षा करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
आठ विशेषज्ञों ने बताया ट्रंप के दावों का सच
आठ विशेषज्ञों का मत है कि अमेरिकी संविधान के तहत चुनाव कराने का पूरा अधिकार राज्यों और स्थानीय काउंटीज के पास है, न कि वॉशिंगटन में बैठे राष्ट्रपति के पास। डेमोक्रेटिक विशेषज्ञ बॉब बाउर कहते हैं, ट्रंप के पास जो शक्तियां होने का दावा किया जाता है, उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर बताया जाता है। पेशेवर और निष्पक्ष चुनाव अधिकारी किसी भी तरह की धांधली को रोकने में सक्षम हैं।
बेन गिंसबर्ग के मुताबिक, राष्ट्रपति के पास सीधे तौर पर चुनाव संचालन की कोई शक्ति नहीं है। लेकिन वह जनता के बीच संशय व अविश्वास जरूर फैला सकते हैं।
लॉ प्रोफेसर डेरेक मुलर की राय है, 50 राज्य, हजारों काउंटी और लाखों वालंटियर...इतनी विशाल और विकेंद्रीकृत व्यवस्था को कोई भी एकतरफा पलट नहीं सकता है।
चार बड़ी चुनौतियां कर सकती हैं परेशान
- एनवाईयू लॉ स्कूल के प्रो. बॉब बाउर ने चेताया कि ट्रंप प्रशासन का चुनाव अधिकारियों पर मुकदमे की धमकियां देना या संघीय एजेंसियों को तैनात करने की बातें करना चुनावी माहौल को तनावपूर्ण बना रहा है।
- ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी के लॉ प्रोफेसर एडवर्ड फोली का मानना है कि एक बड़ा खतरा यह है कि अगर सीनेट का नियंत्रण 2008 के मिनेसोटा चुनाव जैसे किसी बेहद करीबी मुकाबले पर अटका तो फैसला महीनों लटक जाएगा।
- बाइडन प्रशासन में एसोसिएट अटॉर्नी जनरल रहीं वनीता गुप्ता के मुताबिक, सबसे बड़ा जोखिम यह है कि मतदाता यह सोचकर घर बैठ जाएं कि सिस्टम में धांधली हो रही है, जिससे मतदान प्रतिशत घट सकता है।
- डग थॉर्नेल ने रेखांकित किया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के इस दौर में डीपफेक और भ्रामक सूचनाएं आग की तरह फैल रही हैं। उनका मानना है कि इन पर लगाम लगाना प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।
कोरी अफवाहों से डरने की जरूरत नहीं : प्रोफेसर फोली ने साफ किया कि अधिकांश स्थानों पर पेपर ऑडिट ट्रेल मौजूद है, इसलिए मशीनों को चुपके से हैक करके नतीजे नहीं बदले जा सकते। विशेषज्ञों ने दोहराया कि गैर-नागरिकों के बड़े पैमाने पर वोट डाले जाने के दावे पूरी तरह बेबुनियाद हैं। वनीता गुप्ता ने कहा कि संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिसके तहत राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपातकाल घोषित कर चुनाव टाल सकें।