राष्ट्रीय स्वयंसवेक संघ (आरएसएस) के महासचिव दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि आरएसएस भारत की प्राचीन सभ्यता और सांस्कृतिक मूल्यों से प्रेरित एक जन-आधारित स्वैच्छिक संगठन है। इसे आम तौर पर हिंदू संस्कृति के रूप में जाना जाता है। उन्होंने बताया कि संगठन चरित्र, आत्मविश्वास और सेवा की भावना वाले स्वयंसेवक तैयार करने के लिए रोजाना और साप्ताहिक एक घंटे की साखाएं चलाता है। इनके माध्यम से जीवन मूल्य सिखाए जाते हैं और समाज के लिए इंसान को तैयार किया जाता है। इसके साथ ही संगठन प्राकृतिक आपदाओं के समय राहत कार्य भी करता है। संगठन से जुड़े स्वयंसेवकों ने 40 नागरिक संस्थाएं भी बनाई हैं।
'अमेरिका में आरएसएस और भारत को लेकर गलत धारणा'
अमेरिकियों को आरएसएस के बारे में क्या गलतफहमी है, इस पर आरएसएस महासचिव होसबाले ने कहा, अमेरिकियों की गलतफहमी केवल आरएसएस के बारे में नहीं है। भारत के बारे में भी है। अमेरिका की गलतफहमी यह है कि यह (भारत) अधिक जनसंख्या वाला, झुग्गियों से भरा, गरीबी वाला देश है और इसे सांप-सपेरों, झुग्गियों और साधुओं की भूमि माना जाता है। जबकि भारत एक तकनीकी केंद्र भी है और दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। ये बातें आम अमेरिकी धारणा में कहीं न कहीं छूट जाती हैं। आरएसएस के बारे में भी जो धारणा बनाई गई है, चाहे जानबूझकर या अनजाने में या किसी एजेंडे के हिस्से के रूप में, वह यह है कि आरएसएस हिंदू श्रेष्ठतावादी है और किसी तरह ईसाई-विरोधी, अल्पसंख्यक-विरोधी, महिलाओं के विकास का विरोधी और आधुनिकता का विरोधी है। जो सकारात्मक बातें हैं, वह हमेशा नहीं बताई जाती।
'हिंदुओं का श्रेष्ठता का स्वभाव नहीं'
कार्यक्रम में उनसे सवाल किया गया कि इस विचार को कि आरएसएस एक हिंदू श्रेष्ठतावादी संगठन है, आप कैसे चुनौती देंगे, इस पर होसबाले ने कहा, हिंदू दर्शन और संस्कृति हमेशा खुद को दूसरों से अधिक श्रेष्ठ मानने की नहीं हैं। हम हर किसी में एक जैसे देखते हैं, चाहे वह सजीव हो या निर्जीव। जब यह हिंदुओं का मूल दर्शन है, तो हिंदुओं का श्रेष्ठता का स्वभाव नहीं हो सकता। इतिहास में, हिंदुओं ने कभी किसी देश पर आक्रमण नहीं किया या किसी को गुलाम नहीं बनाया। हिंदुओं के माफी मांगने के लिए कुछ नहीं है।
'सांस्कृतिक मूल्य और आधुनिकता एक-दूसरे के विपरीत नहीं'
होसबाले ने कहा, आधुनिकता और सांस्कृतिक मूल्य साथ-साथ चल सकते हैं। हाल के दशकों में, खासकर पूर्वी समाजों में संस्कृति और आधुनिकता का एक साथ अस्तित्व देखा गया है। मुझे नहीं लगता कि सांस्कृतिक मूल्य और आधुनिकता एक-दूसरे के विपरीत दिशा में जाते हैं। सनातन का मतलब शाश्वतता है। यह निरंतर बढ़ता भी है, लेकिन साथ ही प्राचीन भी है।
'आपसी विश्वास से बेहतर हो सकते हैं भारत-अमेरिाक संबंध'
भारत अपनी पूरी क्षमता कैसे हासिल कर सकता है, इस पर आरएसएस महासचिव ने कहा, अगर अमेरिका भी भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी की तलाश में है, तो बेहतर संबंध और साझेदारी की आवश्यकता है। यह आपसी विश्वास और समान अवसर से किया जा सकता है। लोगों के बीच संबंधों को मजबूत किया जाना चाहिए।
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पड़ोसी देशों के साथ तनाव के सवाल पर क्या कहा?
आरएसएस भारत में बढ़ती 'हिंदू पहचान' और 1947 के विभाजन के बाद बने देशों के बीच तनाव को कैसे देखता है, इस सवाल पर आरएसएस महासचिव दत्तात्रेय होसबाले कहते हैं, आरएसएस के दृष्टिकोण में हिंदू पहचान एक सभ्यतागत पहचान है, न कि धार्मिक। आरएसएस ने हमेशा सांस्कृतिक लोकाचार और सभ्यतागत मूल्यों पर जोर दिया है, जिनका किसी धर्म से सीधे संबंध नहीं है। राजनीतिक हितों, इतिहास की गलत व्याख्या और अन्य कारणों से (पाकिस्तान के साथ) तनाव समय-समय पर रहा है।'
उन्होंने आगे कहा, आरएसएस मानता है कि सभी समूहों के साथ निरंतर और व्यापक संवाद निश्चित रूप से गलतफहमियों को दूर करने में मदद करेगा। आरएसएस अल्पसंख्यकों और उनके नेतृत्व वाले एक समूह के साथ ऐसे संवाद में जुड़ा हुआ है। पड़ोसी देशों के बीच तनाव विभिन्न कारणों से है, उनके राजनीतिक नेतृत्व के कारण। पिछले दशकों में कई बार आपसी भरोसा और संबंध कमजोर हुए हैं। समस्या केवल एक पड़ोसी देश के साथ है, जो भारत की कोख से जन्मा था। वह एक पड़ोसी देश बन गया है, लेकिन कई लोग उस देश के पीछे हैं जो समस्याएं पैदा करने की कोशिश करते हैं।