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अमेरिका ने अब ईरान पर साइबर हमला किया, कल से नए प्रतिबंध संभव

Sun, 23 Jun 2019 10:58 AM IST
संदीप भट्ट वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला,वॉशिंगटन
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अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा गतिरोध जारी है। इस बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार को कहा कि ईरान के खिलाफ सोमवार से नये बड़े प्रतिबंध लगाये जाएंगे। ट्रंप ने ट्वीट किया, ‘हम ईरान के ऊपर सोमवार से नये बड़े प्रतिबंध लगाने जा रहे हैं।’

महज कुछ घण्टों में ही पलटे ट्रंप, ईरान को बताया था अच्छा मित्र

हालांकि, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कुछ ही घंटे पहले कहा था कि ईरान वाशिंगटन का ‘सबसे अच्छा मित्र’ बन सकता है कि अगर वह परमाणु हथियार त्याग दे। राष्ट्रपति ट्रंप का यह बयान ईरान की ओर से दी गई चेतावनी के बाद आया है। 

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व्हाइट हाउस के बाहर पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने कहा, ‘हम नहीं चाहते हैं कि ईरान एक परमाणु संपन्न राष्ट्र बने। इस्लामिक गणराज्य एक अमीर देश बन सकता है। हम अच्छे दोस्त बन सकते हैं। ईरान एक खुशहाल देश बन सकता है, अगर वह परमाणु हथियार हासिल करने की अपनी मंशा छोड़ दे। मुझे उम्मीद है ऐसा हो सकता है।


अमेरिका ने ड्रोन गिराए जाने के बाद ईरान पर साइबर हमला किया

अमेरिका ने ईरान में अपने निगरानी ड्रोन गिराये जाने के बाद ईरान की मिसाइल नियंत्रण प्रणाली और एक जासूसी नेटवर्क पर साइबर हमले किए हैं। अमेरिकी समाचार पत्र वाशिंगटन पोस्ट ने यह खबर दी है। समाचार पत्र ने लिखा है कि हमले से राकेट और मिसाइल प्रक्षेपण में इस्तेमाल होने वाले कंप्यूटरों को नुकसान पहुंचा है। हालांकि अमेरिका के रक्षा अधिकारियों ने समाचार पत्र की रिपोर्ट की पुष्टि नहीं की है।

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’ 

बड़े युद्ध की तरफ इशारा कर रहा अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ता तनाव 

फारस की खाड़ी में ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव एक बड़े युद्ध की तरफ इशारा कर रहा है। इसकी शुरुआत पिछले साल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ हुई परमाणु संधि तोड़कर की और बाद में इस खाड़ी देश पर कई प्रतिबंध लगा दिए गए। हाल ही में ओमान की खाड़ी में तेल के दो टैंकरों पर हमले के बाद तनाव और बढ़ गया।

अमेरिका ने इस हमले में ईरान का हाथ बताया जबकि ईरान ने इसका खंडन किया। इसके बाद अमेरिकी जासूसी ड्रोन को ईरान ने मार गिराया। ट्रंप ने इसी दिन ईरान पर हमले के आदेश दिए लेकिन 10 मिनट में ही वे पीछे हट गए। लेकिन यहां के हालात अब भी तनावपूर्ण हैं।

ट्रंप का आदेश पाकर अमेरिकी लड़ाकू विमान और युद्धपोत सक्रिय हो गए। इस बीच ट्रंप ने अपने सलाहकारों से पूछा कि ईरान पर हमले में कितने लोग मारे जाएंगे। सेना के जनरल बताया कि करीब डेढ़ सौ लोगों की मौत होगी। इसके बाद ट्रंप ने हमले को रोकने के आदेश दिए।

दरअसल, ईरान ने बृहस्पतिवार को एक अमरिकी ड्रोन मार गिराया था। ईरान का दावा है कि यह जासूस ड्रोन ईरानी हवाई क्षेत्र में था जबकि अमेरिका इस दावे को झूठा बताया। ईरान ने यह भी कहा कि कम से कम 35 लोगों को लेकर जा रहा अमेरिकी विमान ईरानी हवाई क्षेत्र के बिल्कुल करीब से होकर गुजरा था लेकिन उन्होंने उस पर हमला नहीं किया। 

अमेरिका-ईरान के बीच बीते कुछ दिनों से तनाव लगातार बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने मध्य-पूर्व में अपनी सेना और साजो-सामान की तैनाती कर ली है। ईरान ने खुद को परमाणु समझौते से आंशिक तौर पर अलग करने के बाद कह दिया है कि वह अमेरिका के साथ इस समझौते पर अब और बात नहीं करेगा। जबकि अमेरिका ने इसके अलावा इराक में मौजूद अपने कई राजनयिक कर्मचारियों की संख्या भी घटा दी है। ऐसे में स्पष्ट संकेत हैं कि मध्य-पूर्व पर अब अमेरिका और ईरान के बीच होने वाले संभावित युद्ध के बादल मंडराने लगे हैं।

यह तनाव पूरे इलाके के लिए खतरनाक है। चूंकि ईरान तेल निर्यात का एक बड़ा केंद्र है और कई देशों की तेल आपूर्ति ईरान पर निर्भर है इसलिए यहां युद्ध छिड़ने से पूरे विश्व में तेल संकट छा सकता है। यही नहीं यहां से होकर कई देशों का जलमार्ग गुजरता है, ऐसे में दुनिया के कई देशों में जरूरी आयात-निर्यात भी प्रभावित हो सकता है।

कौन किस तरफ

  • रूस, जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, चीन और यूरोपीय संघ फिलहाल ईरान के पक्ष में, भारत है तटस्थ

  • अमेरिका के साथ हैं इजरायल, कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई)

विवाद से क्या चाहते हैं ट्रंप

  • अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप परमाणु संधि का पुनर्गठन चाहते हैं

  • ट्रंप की मंशा ईरान के बैलेस्टिक मिसाइल प्रोग्राम पर नियंत्रण की है

  • ट्रंप मध्य पूर्व देशों में चल रहे विवादों से ईरान को दूर रखना चाहते हैं

  • -अमेरिका के सहयोगी सऊदी अरब व यूएई के तेल व्यापार को बढ़ाना

क्या थी परमाणु संधि

2015 में संयुक्त राष्ट्र के पांच स्थाई सदस्य देशों रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस व अमेरिका और जर्मनी ने मिलकर ईरान के साथ ज्वॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (जेसीओपीए) नाम से परमाणु संधि की थी। इसके तहत ईरान को अपना करीब नौ टन का अल्प संवर्धित यूरेनियम भंडार घटाकर 300 किलोग्राम पर लाना था, जिससे वह परमाणु बम नहीं बना सके। इसके बदले ईरान में यूरोपीय कंपनियां तेल शोधन, मेडिसिन और इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में निवेश के लिए आगे बढ़ीं। ईरान को कई हजार रोजगार के अवसर बनने और अपनी जीडीपी 12.3 फीसदी तक बढ़ने का लाभ हुआ। 

नया नहीं है अमेरिका-ईरान तनाव

  • 1953 में अमेरिका और ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों ईरान के प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसदेक के तख्तापलट का आरोप लगा

  • 1979 में तेहरान स्थित यूएस दूतावास में 52 अमेरिकी नागरिकों को ईरानी चरमपंथियों ने 444 दिन तक बंधक बनाया

  • 1980 में इराक-ईरान युद्ध शुरू हुआ तो अमेरिका ने इराक का समर्थन करते हुए उसे हथियार उपलब्ध कराए

  • 1985 में अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के कार्यकाल में इराक के साथ ईरान को भी हथियार देने का खुलासा हुआ, इसे ईरान कोंट्रा अफेयर कहते हैं

  • 1988 अमेरिकी नौसेना ने ईरान के खिलाफ ऑपरेशन प्रेयिंग मैंटिस चलाकर उसके तेल के कुओं को निशाना बनाया

  • 2003 से अमेरिका लगातार ईरान पर छिपकर परमाणु हथियार बनाने का आरोप लगाता रहा है

  • 2006 में अमेरिका ने इरान फ्रीडम एंड सपोर्ट एक्ट पास किया, दोनों देशों के कुछ राजनेताओं ने इसे युद्ध की ओर कदम बढ़ाना बताया

  • 2006 में ही अमेरिका की तरफ से ईरानी बैंकों पर प्रतिबंध लगाया गया, दोनों देशों के बीच प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष वित्तीय लेनदेन बंद

  • 2007 में अमेरिका ने इराक स्थित ईरानी वाणिज्य महादूतावास पर छापा मारकर पांच कर्मचारी गिरफ्तार किए

  • 2008 में अमेरिका ईरान पर होरमुज जलसंधि में अमेरिकी जहाजों के साथ छेड़छाड़ करने का आरोप लगाया

 

अमेरिकी दावा : कमजोर हो चुका है ईरान

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का दावा है कि परमाणु संधि से अमेरिका के बाहर जाने और प्रतिबंध लगने से ईरान पहले ही काफी कमजोर हो चुका है और अमेरिका ईरान से युद्ध नहीं करना चाहता है। इसका एक बड़ा कारण है ईरान से तेल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाना।

अमेरिका ने ईरान से तेल खरीदने वाले देशों पर दबाव बनाकर इसे रुकवा दिया। इस मामले में भारत को भी उसका साथ देना पड़ा। तेल का खरीदी रुकने से ईरान की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ा और सऊदी अरब को इसका फायदा मिला। ईरान की कमजोर अर्थव्यवस्था का लाभ उठाकर अमेरिका उसे अपनी शर्तों पर राजी करना चाहता है।

अमेरिका में ईरान विरोधी भावनाएं प्रबल

शुरू से ही ट्रंप प्रशासन का एजेंडा रहा है कि ईरान को वह नियंत्रित करे। इससे मध्य-पूर्व में उसका प्रभाव बढ़ेगा और यमन में हूती विद्रोहियों को मिलने वाला ईरानी समर्थन बंद हो जाएगा। इसका सीधा लाभ अमेरिका के दोस्त सऊदी अरब को मिलेगा।

वैसे भी अमेरिका 1979 में ईरानी क्रांति के वक्त से ही ईरान से खफा है। उस वक्त वहां लगभग 400 दिनों तक अमेरिकी दूतावास में अमेरिकियों को बंधक बनाकर रखा गया था इससे अमेरिका में ईरान विरोधी भावनाएं काफी प्रबल हो गई।

 
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इस्राइल को खुश करना प्राथमिकता

दूसरा इस्राइल की लॉबी अमेरिका में बेहद मजबूत है, फलस्तीन के मामले को ध्यान से हटाने के लिए इस्राइल ने इस बात पर जोर दिया कि ईरान के परमाणु हथियार पूरे विश्व के लिए खतरा हैं। इस्राइल के अरबपति अमेरिकी चुनाव में पैसे लगाते हैं, इसलिए 2020 में अमेरिकी राष्ट्रपति पद के चुनाव से पहले ट्रंप को अपने दोस्त को उपहार देना जरूरी था। इससे पहले 2016 के राष्ट्रपति पद के चुनाव में भी इस्राइल ने रिपब्लिकन पार्टी को बड़ी रकम दी थी। इस्राइल एजेंडा ईरान विरोधी रहा है, जो अमेरिका के लिए सकारात्मक साथ बन गया।

भारत समेत कई देशों पर पड़ेगा असर

हालांकि भारत ने यह साफ कर दिया है कि वह ईरान से तेल नहीं खरीदेगा, लेकिन भारत इसकी कमी कैसे पूरी करेगा इसकी तस्वीर साफ नहीं है। ऐसे में तय है कि अगर फारस की खाड़ी में युद्ध छिड़ा तो इसका असर सभी पर पड़ेगा।

खासकर यहां पड़ने वाले देशों में तेल की भारी किल्लत हो सकती है। पिछले हफ्ते टैंकर हमले के बाद से ही कीमतों में बढ़ोत्तरी होने लगी थी। अमेरिका को इससे कोई नुकसान नहीं होगा, क्योंकि वह मध्य-पूर्व से तेल लेना बंद कर चुका है।

यही नहीं बल्कि अमेरिका अपनी जरूरत से ज्यादा का तेल उत्पादन अपने ही देश में कर लेता है। अमरीका के पास एक साल का तेल रिजर्व है, लेकिन बाकी देशों की अर्थव्यवस्था ठप्प होने से वैश्विक संकट की स्थिति पैदा हो जाएगी।

तेहरान की गद्दी पर अपना व्यक्ति चाहता है अमेरिका

1953 में जब ईरान लोकतांत्रिक देश बना था तब वहां के तत्कालीन प्रधानमंत्री ने देश के तेल क्षेत्र का राष्ट्रीयकरण कर दिया था। उस वक्त अमेरिका ने वहां तख्तापलट किया और लोकतंत्र को राजतंत्र में बदल दिया। ईरान की कमान मोहम्मद रजा पहलवी के हाथों में आ गई।

चूंकि वह अमेरिका की मदद से सत्ता में थे इसलिए हमेशा अमेरिका का समर्थन करते रहे। लेकिन ईरान में 1979 की क्रांति के बाद हालात बदल गए। शिया बहुल ईरान अब मध्य-पूर्व में काफी ताकतवर हो चुका था और अमेरिका के लिए चुनौती बन गया।

अमेरिका चाहता है कि वहां फिर तख्तापलट हो और अमेरिका का समर्थन करने वाला नेता तेहरान की गद्दी पर बैठे। वह चाहता है कि जैसे सऊदी अरब, पाकिस्तान, पहले तुर्की अमेरिका के साथ रहते थे वैसे ही तेहरान भी अमेरिका की ओर झुकाव रखे।


 
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