अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू करने के महज 12-13 दिनों के भीतर जीत का दावा किया है, लेकिन जमीनी हालात संकेत दे रहे हैं कि यह युद्ध जल्दी खत्म होना मुश्किल हो सकता है। अमेरिकी हमलों के बावजूद ईरान की सैन्य और राजनीतिक संरचना पूरी तरह नहीं टूटी है, जबकि इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) बदले की भावना के साथ संघर्ष जारी रखने की तैयारी में है।
विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप अब उस पारंपरिक सैन्य जाल में फंसते दिख रहे हैं जिसमें त्वरित सैन्य कार्रवाई से स्थायी राजनीतिक परिणाम हासिल करने की उम्मीद की जाती है, लेकिन युद्ध का वास्तविक स्वरूप कहीं अधिक जटिल साबित होता है। सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार ट्रंप प्रशासन इस युद्ध को जीता हुआ लेकिन अभी खत्म नहीं बताने की कोशिश कर रहा है।
राष्ट्रपति ट्रंप ने केंटकी में एक भाषण के दौरान दावा किया कि अमेरिका इस संघर्ष में जीत हासिल कर चुका है, लेकिन सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि युद्ध किसी खेल की तरह नहीं होता जिसमें तय समय के बाद स्कोर विजेता तय कर दे। विश्लेषकों के अनुसार आधुनिक युद्धों में यह अक्सर देखा गया है कि शुरुआती सैन्य सफलता स्थायी राजनीतिक परिणामों में नहीं बदल पाती। सोवियत संघ ने अफगानिस्तान में यही गलती की थी, अमेरिका ने 2003 में इराक में ऐसा ही सोचा था और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन में तेज जीत की उम्मीद की थी, लेकिन वहां भी युद्ध लंबा खिंच गया।
पूरी तरह सफल नहीं हुई इस्राइली योजना
इस्राइल की खुफिया जानकारी और डिकैपिटेशन स्ट्राइक भी पूरी तरह सफल होती नहीं दिख रही है। डिकैपिटेशन स्ट्राइक का अर्थ है किसी देश या संगठन के शीर्ष नेतृत्व को अचानक सैन्य हमले में निशाना बनाकर उसकी कमान को पंगु बना देना। यानी यह ऐसी सैन्य रणनीति होती है जिसमें राष्ट्रपति, सर्वोच्च नेता,सेना के शीर्ष कमांडर और खुफिया एजेंसियों के प्रमुख जैसे निर्णायक नेतृत्व को एक साथ या तेजी से खत्म करने की कोशिश की जाती है ताकि दुश्मन की कमांड और कंट्रोल प्रणाली टूट जाए और वह संगठित प्रतिरोध न कर सके।
रिपोर्ट के अनुसार व्हाइट हाउस ने संभवतः इस्राइली खुफिया एजेंसियों से मिली जानकारी के आधार पर ईरान के शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाने का अवसर देखकर तेजी से सैन्य कार्रवाई का फैसला किया। 28 फरवरी को ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत ने जितनी समस्याएं हल कीं उससे अधिक नई चुनौतियां पैदा कर दीं।
सत्ता परिवर्तन की उम्मीदों के बीच मोजतबा का उभार
खामेनेई की मौत के बाद ईरान में सत्ता का खालीपन पैदा हुआ, लेकिन वहां किसी बाहरी समर्थित नेता के उभरने की स्थिति नहीं बनी। अमेरिकी विश्लेषकों ने पहले यह संभावना जताई थी कि सत्ता परिवर्तन हो सकता है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके बजाय कट्टरपंथी धड़े ने खामेनेई के बेटे मोज्तबा खामेनेई को आगे कर दिया।वही व्यक्ति जिसे ट्रंप सार्वजनिक रूप से नेतृत्व में नहीं देखना चाहते थे। रिपोर्ट के मुताबिक मोज्तबा खामेनेई की सेहत को लेकर भी सवाल उठे हैं। ईरानी सरकारी मीडिया के अनुसार सर्वोच्च नेता बनने के बाद उनका पहला संदेश गुरुवार को प्रसारित किया गया, लेकिन इसे टीवी पर पढ़कर सुनाया गया और उनका वीडियो संदेश सामने नहीं आया।
आईआरजीसी की बदले की रणनीति
ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) अपने शीर्ष कमांडरों की लगातार हत्याओं का बदला लेने की तैयारी में है। विश्लेषकों का कहना है कि जिस तरह अमेरिकी सैनिक अपने नेतृत्व की हत्या पर प्रतिक्रिया देते, उसी तरह आईआरजीसी भी बदले की भावना से प्रेरित है। महज 13 दिनों में ईरान ने इस संघर्ष को सहनशक्ति की परीक्षा में बदल दिया है और फिलहाल वह इसमें टिके रहने की स्थिति में दिख रहा है।
ईरान का मनोबल तोड़ना मुश्किल…
अमेरिकी और इस्राइली हमलों से ईरान के मिसाइल लॉन्चर, ड्रोन बेस, सैन्य ढांचे और कर्मियों को नुकसान जरूर हुआ है। इसके बावजूद इतना ढांचा बचा रह सकता है कि ईरानी सेना पूरी तरह घुटने टेकने की स्थिति में न आए। आईआरजीसी के नेतृत्व ने वर्षों से ऐसे ही परिदृश्य के लिए तैयारी की है। उनके पास संसाधन खत्म हो सकते हैं.. बम, ड्रोन या यहां तक कि सैनिक भी लेकिन उनकी प्रेरणा खत्म होने की संभावना कम है। यह वही सबक है जो अमेरिका ने इराक और अफगानिस्तान में भी देखा था।
होर्मुज जलडमरूमध्य और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव
ईरान के पास जवाबी दबाव बनाने के कई तरीके हैं। वह हॉर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों को निशाना बना सकता है या उन्हें परेशान कर सकता है, जिससे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रह सकती हैं। ऐसी स्थिति में वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा और दुनिया भर में यह सवाल उठ सकता है कि क्या ट्रंप प्रशासन ने इस संकट के संभावित परिणामों का पहले से अनुमान लगाया था।ईरान के मिसाइल हमले भले कम हो जाएं, लेकिन उनका लगातार जारी रहना भी उसके लिए रणनीतिक जीत जैसा हो सकता है।
बस टिके रहना ईरान की रणनीति
विश्लेषकों के मुताबिक अब ईरान की रणनीति अपेक्षाकृत स्पष्ट है। उसे इस संघर्ष में सिर्फ टिके रहना है। यदि अमेरिका या इस्राइल किसी और शीर्ष नेता को मार भी देते हैं, तो इससे ईरान के भीतर प्रतिरोध की भावना और मजबूत हो सकती है।अफगानिस्तान में अमेरिका ने देखा था कि तालिबान नेतृत्व पर लगातार हमले करने से बातचीत और समाधान और मुश्किल हो गए थे, क्योंकि नए नेता अक्सर अधिक कट्टर और बदले की भावना से भरे होते थे।