अमेरिका-ईरान करीब दो महीने से जंग लड़ रहे हैं, इसी बीच 8 अप्रैल को युद्धविराम की घोषणा की गई। जिसके बाद दोनों पक्ष इस्लामाबाद में शांति वार्ता के लिए तैयार हुए, हालांकि ये बिना किसी नतीजे के खत्म हुई। लेकिन इस सबके बाद भी समझौते की उम्मीद जगी है, क्योंकि इस बातचीत के दौरान दोनों पक्षों में एक-दूसरे के प्रति भरोसा बढ़ा है।
अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुई शांति वार्ता भले ही किसी ठोस समझौते तक नहीं पहुंच पाई, लेकिन इसने दोनों देशों के बीच रिश्तों में कुछ नरमी जरूर पैदा की है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, जेडी वेंस की अगुवाई में हुई करीब 21 घंटे लंबी बातचीत ने ईरान की नई नेतृत्व टीम के साथ 'गुडविल' यानी भरोसे का माहौल बनाने में मदद की। द वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि इस बातचीत से ईरान के साथ संवाद का रास्ता थोड़ा आसान हुआ है और आने वाले समय में ईरान अमेरिकी शर्तों को मानने पर विचार कर सकता है। हालांकि, अभी भी सबसे बड़ा विवाद ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर ही बना हुआ है।
अविश्वास खत्म होने में लगा वक्त
रिपोर्ट में बताया गया कि बातचीत के दौरान शुरुआत में दोनों पक्षों के बीच अविश्वास था, लेकिन धीरे-धीरे माहौल बेहतर होता गया और दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों के बीच तालमेल भी बढ़ा। खुद अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी कहा कि बातचीत काफी गहन रही और अंत में माहौल काफी दोस्ताना हो गया था। हालांकि, उन्होंने यह भी साफ किया कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है, जो सबसे बड़ी रुकावट है।
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अमेरिका ने क्या रखी मांग?
अमेरिका की मांग है कि ईरान पूरी तरह से अपनी परमाणु संवर्धन क्षमता खत्म करे, ताकि वह कभी भी परमाणु हथियार न बना सके। वहीं ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम सिर्फ शांतिपूर्ण और नागरिक उपयोग के लिए है, और वह इसे पूरी तरह बंद नहीं करेगा। रिपोर्ट के अनुसार, वार्ता के दौरान अमेरिका को यह भी समझ आया कि ईरान खुद को जितना मजबूत मान रहा है, असल स्थिति उतनी मजबूत नहीं हो सकती। यानी अमेरिका को अब ईरान की कमजोरियों का थोड़ा बेहतर अंदाजा लग गया है और आगे की रणनीति उसी आधार पर बनाई जा सकती है।
ट्रंप ने होर्मुज के नाकाबंदी की घोषणा की
इसी बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से होर्मुज जलडमरूमध्य में नाकाबंदी की घोषणा भी ईरान पर दबाव बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। माना जा रहा है कि इससे ईरान पर समझौता करने का दबाव और बढ़ सकता है।