राष्ट्रपति चुनाव के बीच अमेरिका पेरिस जलवायु समझौते से बुधवार को औपचारिक रूप से अलग हो गया। राष्ट्रपति ट्रंप ने 2017 ने ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती से संबंधित इस ऐतिहासिक करार से अमेरिका को अलग करने की अपनी इच्छा जाहिर की थी।
ट्रंप प्रशासन ने पिछले साल संयुक्त राष्ट्र को औपचारिक रूप से इस संबंध में अधिसूचित किया था। अनिवार्य एक साल की प्रतीक्षा अवधि पूरा होने पर अमेरिका इस समझौते से बाहर आ गया। इस ऐतिहासिक करार में धरती के बढ़ते तापमान को दो डिग्री के नीचे रखने की व्यवस्था पर बल दिया गया है।
यह एक ऐसा आंकड़ा है, जिसके संबंध में जलवायु जानकारों का मानना है कि अगर तापमान इससे ऊपर गया तो विनाशकारी परिणाम होंगे। अमेरिका पेरिस जलवायु संधि से निकलने वाला एक मात्र देश है। हालांकि, वह अब भी जलवायु पर अपनी राय रख सकता है, लेकिन अब उसकी स्थिति बस एक ‘पर्यवेक्षक’ की होगी।
ट्रंप ने कई बार पेरिस समझौते की आलोचना की थी और इसे आर्थिक रूप से नुकसानदेह बताया था। उन्होंने दावा किया था कि इससे 2025 तक अमेरिका में 25 लाख नौकरियां चली जाएंगी। अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी कहा था कि इससे चीन और भारत जैसे बड़े कार्बन उत्सर्जन वाले देशों को बड़ी छूट मिल जाएगी।