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चीन के खिलाफ अमेरिका किस हद तक जाएगा, इस पर टिकी जापान की नजर

Wed, 03 Feb 2021 03:38 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, टोक्यो

सार

जापानी रक्षा मंत्री से फोन पर बातचीत में लॉयड ऑस्टिन ने जापान के साथ अमेरिकी गठजोड़ को मजबूत करने वादा किया था। साथ ही उन्होंने सेनकाकू द्वीप समूह के मामले में जापान को पूरा समर्थन देने का एलान भी किया।...
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lloyd austin - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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अमेरिका के रक्षा मंत्री जनरल (रिटा.) लॉयड ऑस्टिन के जल्द ही जापान की यात्रा करने की संभावना है। स्थानीय मीडिया के मुताबिक ऑस्टिन अपनी यात्रा के दौरान जापान के साथ उठ खड़े हुए विवादास्पद मुद्दों को हल करने की कोशिश करेंगे। कुछ जानकारों के मुताबिक अमेरिकी रक्षा मंत्री की इस यात्रा से इस बारे में ठोस संकेत मिलेगा कि जो बाइडन प्रशासन चीन का मुकाबला करने के लिए किस हद तक संकल्पबद्ध हैं। वेबसाइट एशिया टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक जापान में आम भावना यह है कि चीन इस क्षेत्र और बाकी एशिया में अपनी ताकत का जिस तरह इस्तेमाल कर रहा है, उसका मुकाबला करने के बारे में अमेरिका को साफ संकेत देना चाहिए।

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रक्षा मंत्री का पद संभालने के बाद ऑस्टिन ने 24 जनवरी को जापान के रक्षा मंत्री नोबुओ किशी से फोन पर बातचीत की थी। उसमें ऑस्टिन ने कहा कि अमेरिका-जापान सुरक्षा संधि की धारा 5 के प्रति बाइडन प्रशासन प्रतिबद्ध है। इस धारा के तहत किसी जापानी इलाके पर हमला होने की स्थिति में अमेरिका जापान की मदद के लिए आगे आने को वचनबद्ध है। ये धारा सेनकाकू द्वीप समूह के मामले में भी लागू होती है, जिस पर चीन का भी दावा है। चीन इस द्वीप समूह को पूर्वी चीन कहता है।

अमेरिका-जापान सुरक्षा संधि पर दस्तखत 1951 में हुए थे। 1960 में इसमें संशोधन किया गया। इस संधि का मकसद दूसरे विश्व युद्ध में पराजित हुए जापान को फिर से एक सैनिक ताकत के रूप में उभरने से रोकना था। तब से एशिया-प्रशांत क्षेत्र के लिए ये संधि अमेरिका की भू-राजनीतिक नीतियों के केंद्र में रही है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद जापान में नया संविधान 1947 में लागू हुआ था। उसमें प्रावधान है कि जापान ऐसी कोई सेना नहीं रखेगा, जो युद्ध लड़ने में सक्षम हो। इसके बावजूद जापान की सेना शक्तिशाली होती गई है।
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आज उसे तकनीकी रूप से दुनिया की सबसे उन्नत सेनाओं में एक गिना जाता है। लंदन स्थित इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्ट्रेटेजिक स्टडीज के मुताबिक अब जापान के पास दुनिया की आठवीं सबसे बड़ी सेना है। इसके बावजूद चीन का मुकाबला करने के मामले में जापान आज भी अमेरिका पर निर्भर है।

जापानी रक्षा मंत्री से फोन पर बातचीत में लॉयड ऑस्टिन ने जापान के साथ अमेरिकी गठजोड़ को मजबूत करने वादा किया था। साथ ही उन्होंने सेनकाकू द्वीप समूह के मामले में जापान को पूरा समर्थन देने का एलान भी किया। उधर ताइवान के मामले में भी बाइडन प्रशासन चीन के खिलाफ सख्त रुख का संकेत दिया है। राष्ट्रपति के रूप में जो बाइडन के शपथ ग्रहण समारोह में वाशिंगटन स्थित ताइवान के अनौपचारिक राजदूत हसियाओ बी-खिम को भी बुलाया गया। चीन ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया जताई।

चीन ने उसके तुरंत बाद ताइवान के करीब सैनिक अभ्यास किया। चीनी प्रवक्ता ने इस अभ्यास को बाहरी ताकतों के लिए एक चेतावनी बताया। इसे परोक्ष रूप से अमेरिका को दी गई चेतावनी समझा गया है। पिछले 23 और 24 जनवरी को चीन के लड़ाकू विमानों ने ताइवान के स्वघोषित दक्षिण-पश्चिम रक्षा क्षेत्र के ऊपर से उड़ानें भरीं।

इसी पृष्ठभूमि के कारण इस क्षेत्र में ऑस्टिन की प्रस्तावित जापान यात्रा की खबर को बहुत अहमियत दी जा रही है। विश्लेषकों के मुताबिक ऑस्टिन का मकसद चीन विरोधी गोलबंदी को मजबूत करना होगा। लेकिन इस मामले में दक्षिण कोरिया से उन्हें निराशा हाथ लगने के संकेत हैं।

जापानी रक्षा मंत्री से फोन पर बात करने के तुरंत बाद ऑस्टिन ने दक्षिण कोरिया के रक्षा मंत्री सुह वूक से भी बात की थी। उन्होंने तब कहा था कि उत्तर-पूर्व एशिया में शांति और स्थिरता के लिए अमेरिका और दक्षिण कोरिया के गठबंधन का मजबूत होना जरूरी है। लेकिन दक्षिण करिया किसी ऐसे गठबंधन में शामिल होने को लेकर उत्साहित नहीं है, जिसमें जापान भी हो।

मंगलवार को खबर आई कि दक्षिण कोरिया के रक्षा मंत्रालय ने अपने एक श्वेत पत्र में जापान का ‘भागीदार’ के रूप में जिक्र नहीं किया है। दक्षिण कोरिया के मीडिया ने इसे जापान के साथ संबंध का दर्जा गिराना बताया। दक्षिण कोरिया का हाल में ‘कम्फर्ट वीमन्स’ के मुआवजे के सवाल पर जापान से तनाव बढ़ गया है। इसके मद्देनजर चीन विरोधी देशों की गोलबंदी का मकसद हासिल करना कठिन माना जा रहा है। इसके बावजूद जापान आकर ऑस्टिन क्या संकेत देते हैं, इस पर विश्लेषकों की नजर टिकी रहेगी।  
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