अमेरिका के चिप्स एंड साइंस एक्ट से चीन की मुश्किलें बढ़ गई हैं। विशेषज्ञों की राय है कि चीन इसका निकट भविष्य में माकूल जवाब देने में सक्षम नहीं हो पाएगा। इस कानून का मकसद टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में चीन के बढ़ रहे प्रभाव को नियंत्रित करना है। इस कानून के तहत अमेरिका में कंप्यूटर चिप का निर्माण करने वाली और वैज्ञानिक अनुसंधान में योगदान करने वाली कंपनियों को अमेरिका सरकार 280 बिलियन डॉलर की सब्सिडी देगी।
इस बिल के संभावित असर के बारे में विशेषज्ञों का आकलन चीन की चिंता बढ़ाने वाला है। थिंक टैंक यूरेशिया ग्रुप में भू-तकनीक विशेषज्ञ शियाओमेंग लू ने कहा है- ‘मुझे नहीं लगता कि चीन के पास तुरंत कोई ऐसी नीति अपनाने का विकल्प है, जिससे वह इस अमेरिकी कानून का जवाब दे सके। चीन के पास ऐसे चिप बनाने की टेक्नोलॉजी नहीं है।’
शियाओमेंग ने यह बात इसी हफ्ते एस्पेन फोरम में कही। एस्पेन फोरम अमेरिका में होने वाला सालाना आयोजन है, जिसमें अमेरिकी सरकार, शिक्षा क्षेत्र और उद्योग जगत की शख्सियतें शामिल होती हैं। इस बार ये आयोजन कोलोराडो में हुआ। इसमें चर्चा का खास विषय अमेरिका और चीन के बीच बढ़ रहा तनाव था।
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने कांग्रेस (संसद) से पारित चिप्स एंड साइंस एक्ट पर दस्तखत कर दिए। इसके तहत सेमीकंडक्टर उद्योग को 52 बिलियन डॉलर की सब्सिडी मिलेगी। लेकिन ये सब्सिडी वही कंपनियां हासिल कर सकेंगी, जो दस साल तक चिप के क्षेत्र में चीन के साथ कोई कारोबार नहीं करेंगी। यह बिल पारित होने के बाद चीन के विदेश मंत्रालय ने इसकी कड़ी आलोचना की थी। उसने इस कानून को ‘अमेरिका की आर्थिक जोर-जबरदस्ती’ की एक मिसाल बताया था। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा है कि इस कानून के कारण वैश्विक सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन अस्त-व्यस्त हो जाएगा।
विशेषज्ञों ने ध्यान दिलाया है कि अमेरिकी कानून की कड़ी आलोचना करने के बावजूद चीन ने अब तक इसके जवाब में किसी कदम की घोषणा नहीं की है। वाशिंगटन स्थित थिंक टैंक न्यू अमेरिका में साइबर सुरक्षा और चीन की डिजिटल अर्थव्यवस्था के विशेषज्ञ सैम सैक्स के मुताबिक जब ताइवान की कंपनी ताइवान सेमीकंडक्टर मैनुफैक्चरिंग को. (टीएसएमसी) ने 2020 में चीनी कंपनी हुवावे को चिप सप्लाई करने से इनकार किया था, तब चीन ने उसे ‘अविश्वसनीय इकाइयों की सूची’ में डाल देने की चेतावनी दी थी। लेकिन उसने ये कदम नहीं उठाया। इसकी वजह यह है कि ऐसे कदम से चीन के कारोबारियों को नुकसान होता। इसलिए इस बार भी उसकी तरफ से किसी सख्त जवाब की संभावना कम है।
वैसे चिप्स एक्ट की आलोचना सिर्फ चीन ने ही नहीं की है। चीन के बाहर की सेमीकंडक्टर उद्योग से जुड़ी कई कंपनियों ने भी कहा है कि इस कानून के लागू होने से वैश्विक सप्लाई चेन में रुकावट आएगी। साथ ही अब टीएसएमसी जैसी कंपनियों के सामने अमेरिका या चीन में से किसी एक को चुनने की मजबूरी आएगी। इससे उन्हें किसी एक बाजार से वंचित होना पड़ेगा। शियाओमेंग लू ने कहा है कि टीएसएमसी और सैमसंग जैसी कंपनियों के हाथ बंधे हुए हैं। उनके पास अमेरिका को चुनने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है।