हाई टेक मामले में चीन से संबंध तोड़ने की अमेरिकी मुहिम को लेकर उसके कई सहयोगी देश सहमत नहीं हैं। यूरोपियन यूनियन (ईयू) में शामिल कई देशों, मलेशिया और सिंगापुर ने इसको लेकर संदेह जताया है। एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक ये देश चीन से हाई टेक सहयोग में कारोबार पूरी तरह रोकने की अमेरिकी मांग मानने को लेकर अनिच्छुक हैं।
अमेरिका का मकसद चीन को हाई टेक क्षेत्र में महाशक्ति बनने से रोकना है। लेकिन उसके सहयोगी देशों की राय है कि ऐसा करने की कोशिश में उनकी अपनी अर्थव्यवस्थाओं को भारी नुकसान होगा। पिछले हफ्ते ग्लोब टेक डे (विश्व तकनीक दिवस) मनाया गया। इस मौके पर वेबसाइट पोलिटिको.ईयू ने कई देशों के वरिष्ठ अधिकारियों से इस मुद्दे पर बातचीत की।
सिंगापुर की साइबर सिक्योरिटी एजेंसी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डेविड कोह ने इस वेबसाइट से कहा कि उनके देश ने मुक्त अर्थव्यवस्था की नीति पर अमल करते हुए समृद्धि हासिल की है। इसलिए वह चीन के साथ कारोबारी रिश्ते बनाना जारी रखेगा। उधर यूरोपीय आयोग से जुड़ी अधिकारी लुसिला सियोली ने कहा कि हालांकि यूरोपीय देश चीन पर बढ़ रही आर्थिक निर्भरता से चिंतित हैं, लेकिन ईयू चीन के साथ कारोबारी संबंध बनाए रखेगा।
दक्षिण-पूर्व एशिया में मलेशिया को भी अमेरिका का सहयोगी देश समझा जाता है। लेकिन वहां संचार और डिजिटल तकनीक मंत्री फहमी फदजिल ने बीते हफ्ते लंदन में आयोजित एक चर्चा कहा- ‘मलेशिया के लिए चीन एक महत्त्वपूर्ण व्यापार सहयोगी है। मलेशिया एक तटस्थ देश है और हम मुक्त बाजार की नीति का पालन करते हैं।’
वेबसाइट पोलिटिको.ईयू ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के प्रशासन के अधिकारियों के साथ-साथ अमेरिकी कांग्रेस (संसद) के सदस्य भी अपने सहयोगी देशों से चीन के खिलाफ दो टूक रुख तय करने को कह रहे हैं। उन्होंने कहा है कि देशों को चीनी टेक्नोलॉजी को संदेह की निगाह से देखना चाहिए। अमेरिका के निशाने पर जो चीनी तकनीक क्षेत्र हैं, उनमें चीन के तेजी से विकसित हो रहे दूरसंचार और सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री शामिल हैं। अमेरिका यह भी चाहता है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) के क्षेत्र में चीनी क्षमता को नियंत्रित करने के उपाय भी तुरंत किए जाएं। समझा जाता है कि आने वाले समय में दुनिया में सबसे ज्यादा निर्णायक एआई तकनीक ही होगी।
डेविड कोह ने कहा कि चीन को लेकर सुरक्षा संबंधी चिंताएं उनके देश को भी हैं। लेकिन अभी अमेरिका चीन से संबंध में जोखिम घटाने (डी-रिस्किंग) की जिस नीति पर चल रहा है, वह भी परेशान करने वाली है। अमेरिका ने अप्रैल में चीन के मामले में अपनी नीति को स्पष्ट करते हुए कहा था कि उसका मकसद चीन से संबंध विच्छेद (डी-कपलिंग) नहीं, बल्कि डी-रिस्किंग है। इसके तहत आम कारोबार जारी रखते हुए हाई टेक मामले में चीन को अलग-थलग किया जाएगा। इस बारे में कोह ने कहा- ‘हमारी चिंता यह है कि अगर डी-रिस्किंग को ज्यादा खींचा गया, तो उसका असर हमारे संबंधों की मौजूदा स्थिति पर पड़ेगा।’
उधर ईयू की अधिकारी सियोली ने कहा कि यूरोपीय देश चीन पर अति निर्भरता को घटा रहे हैं। लेकिन उन्होंने- ‘हम चीन को एक आर्थिक ताकत मान कर उससे कारोबार करने के पक्ष में हैं।’