ये खबर उत्साह बढ़ाने वाली है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के तहत महामारियों के बारे में वैश्विक संधि करने के प्रस्ताव पर अमेरिका और रूस में शुरुआती सहमति बन गई है। डब्ल्यूएचओ की बैठक 24 मई से शुरू हो रही है। उसमें ऐसी संधि का प्रस्ताव पेश किया जाएगा। लेकिन जानकारों का कहना है कि ऐसी संधि हो सके, उसके रास्ते में अभी कई अड़चनें हैं। इनमें सबसे बड़ी तो यही है कि बहुत से देश अभी इस मामले में बातचीत शुरू करने को इच्छुक नहीं हैं। उनका कहना है कि कोरोना महामारी पर काबू पाने के बाद ही इस दिशा में आगे बढ़ना ठीक होगा।
गौरतलब है कि फिलहाल डब्ल्यूएचओ के सामने ये प्रस्ताव आएगा कि ऐसी संधि पर बातचीत की शुरुआत की जाए। ऐसी संधि का विचार सबसे पहले यूरोपियन काउंसिल के अध्यक्ष चार्ल्स मिशेल ने रखा था। उसे अब तक दो दर्जन देशों का समर्थन मिल चुका है। इनमें ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका और इंडोनेशिया शामिल हैँ। डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेड्रोस एडनॉम घेब्रेयसस भी प्रस्तावित संधि के विचार से सहमत हैं।
चीन की इस बारे मे क्या राय है, यह विश्व स्वास्थ्य के बारे में जी-7 की शिखर बैठक में जाहिर हो सकती है। ये वर्चुअल बैठक जी-7 के अध्यक्ष इटली के प्रधानमंत्री मारियो द्राघी ने बुलाई है। बैठक शुक्रवार रात (भारतीय समय के अनुसार) होगी, जिसे चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी संबोधित करेंगे।
अभी जो प्रस्ताव सामने है, उसके मुताबिक लक्ष्य भविष्य की महामारियों के लिए दुनिया को तैयार रखने के लिए वैश्विक सहयोग की जमीन तैयार करना है। गौरतलब है कि कोरोना महामारी के दौरान ये जोरादर आलोचना हुई है कि दुनिया इसके लिए तैयार नहीं थी। साथ ही दुनिया में जो सिस्टम है, वह बहुत कमजोर साबित हुआ। प्रस्तावित संधि के समर्थकों का कहना है कि अब महामारी को जलवायु परिवर्तन और परमाणु निरस्त्रीकरण जितनी अहमियत देकर दुनिया के सभी देशों को सहयोग के लिए आगे आना चाहिए।
पहले की खबरों में बताया गया था कि अमेरिका अभी किसी नई संधि की वार्ता शुरू करने के पक्ष में नहीं है। उसकी राय है कि जिस समय दुनिया कोरोना महामारी से संघर्ष में जुटी है, नई संधि की कोशिश में बेवजह ऊर्जा और संसाधन लगेंगे। अमेरिकी राय में अभी फौरी जरूरत कोरोना महामारी पर काबू पाने की है। लेकिन जिनेवा स्थित सूत्रों ने मीडिया को बताया है कि अब अमेरिका 24 मई से शुरू होने वाली बैठक में नई संधि की चर्चा शुरू होने पर उसमें अड़ंगा नहीं लगाएगा।
विश्लेषकों के मुताबिक अमेरिका के बाइडन प्रशासन की एक मुख्य चिंता ऐसी किसी संधि को अपने यहां सीनेट की मंजूरी दिलाने से जुड़ी है। अमेरिकी कानून के मुताबिक किसी वैश्विक संधि को मंजूरी दिलवाने के लिए वहां सीनेट में दो तिहाई बहुमत चाहिए। बाइडन की डेमोक्रेटिक पार्टी के पास इतना समर्थन नहीं है। उधर जमैका और ब्राजील जैसे देशों ने सवाल उठाया है कि जब उसके जैसे देश महामारी की मार झेल रहे हैं, तब क्या दुनिया के पास इतना समय है कि वह नई संधि की चर्चा में लगाए?
जानकारों के मुताबिक एक बड़ी अड़चन डब्ल्यूएचओ महासभा की प्रक्रिया है। वहां फैसले आम सहमति से होते हैं। इसके बीच किसी एक देश का विरोध रुकावट बन सकता है। पर्यवेक्षकों के मुताबिक अभी की हालत में आम सहमति हासिल करना बड़ी चुनौती साबित होगा। अभी संधि को लागू करने का क्या तौर-तरीका होगा, इसे सामने नहीं रखा गया है। इस बारे में अनेक देशों को आपत्ति हो सकती है। लेकिन संधि के पैरोकारों का कहना है कि अभी वार्ता की शुरुआत की जा सकती है। बाकी मुद्दे बाद में हल हो सकते हैँ। उनके मुताबिक अभी संधि का विचार छोड़ देने का कोई तर्क नहीं है।