हाल में आई इस खबर ने आर्थिक जानकारों की चिंता बढ़ा दी है कि अमेरिका सरकार पर कर्ज बढ़ कर 31.1 ट्रिलियन डॉलर हो चुका है। फिलहाल, अमेरिका सरकार के कर्ज लेने पर 31.4 ट्रिलियन डॉलर की सीमा लगी हुई है। यानी अब जो बाइडन प्रशासन के पास सिर्फ 300 बिलियन डॉलर और कर्ज लेने का विकल्प बचा है। इससे ज्यादा जरूरत होने पर उसे कांग्रेस (संसद) की मंजूरी लेनी होगी। विपक्षी रिपब्लिकन पार्टी के विरोध के कारण ये अनुमति मिलना बेहद मुश्किल माना जा रहा है।
न्यूयॉर्क शहर में लगे नेशनल डेट क्लॉक (राष्ट्रीय ऋण घड़ी) के मुताबिक तीन अक्तूबर ताजा आकंड़ा जारी होने के बाद के हफ्ते में सरकार पर कर्ज और चढ़ा है। ये घड़ी यह आगाह करने लिए लगाई गई थी कि अमेरिका अपनी आमदनी से ज्यादा खर्च कर रहा है। ताजा आंकड़े का मतलब यह है कि अमेरिका के हर नागरिक पर इस समय 93,400 डॉलर का कर्ज है। अगर सिर्फ करदाता नागरिकों की बात करें, तो उन पर प्रति नागरिक ढाई लाख डॉलर का ऋण है। कर्ज अमेरिका की कुल जीडीपी के 126 फीसदी के बराबर हो चुका है। ये रकम चीन, जापान, जर्मनी और ब्रिटेन की साझा सालाना जीडीपी से भी ज्यादा है।
ब्रिटिश वित्तीय मीडिया- फिनबॉल्ड ने 2022 के आंकड़ों का आधार पर कहा है कि अमेरिका सरकार पर हर रोज छह बिलियन डॉलर का कर्ज चढ़ रहा है। अमेरिकी संस्था कमेटी फॉर ए रेस्पॉन्सिबल फेडरल बजट की अध्यक्ष माया मैक्गिनीज ने कहा है- ‘(कर्ज का) ये ऐसा रिकॉर्ड है, जिस पर किसी अमेरिकी को गर्व नहीं होगा।’ बीते हफ्ते ताजा आंकड़ा जारी होने के बाद अमेरिकी पत्रकार जॉन स्टोसेल ने राय जताई थी कि अगर कर्ज के इस बोझ को ठीक से नहीं संभाला गया, तो जो सूरत बनेगी, वह अमेरिका और बाकी दुनिया के लिए एक बुरे सपने की तरह होगी।
अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल ने पिछले महीने लिखा था कि अमेरिका के राष्ट्रीय कर्ज पर ब्याज के तेजी से बढ़ने से वैसी स्थिति बन रही है, जिसे अर्थशास्त्री ‘डूम लूप’ कहते हैँ। यह वो सूरत होती है, जब सरकार को ब्याज चुकाने के लिए नया कर्ज लेना पड़ता है। उससे ब्याज का बोझ और बढ़ता है और फिर उसे चुकाने के लिए और कर्ज लेना पड़ता है।
चढ़ते कर्ज चिंता काफी समय से जानकारों को सता रही है। पिछले वर्ष थिंक टैंक पीटरसन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स में सीनियर फेलॉ जैक किर्कगार्ड ने वॉयस ऑफ अमेरिका से बातचीत में कहा था- अगर किसी वजह से अमेरिका सरकार ने डिफॉल्ट (खुद को कर्ज चुकाने में अक्षम घोषित) कर दिया, तो उसका विश्व वित्तीय व्यवस्था पर टाइम बम फटने जैसा असर होगा। उसके परिणामस्वरूप वैश्विक कारोबार में भारी गिरावट आएगी और वैश्विक रिजर्व करेंसी के रूप में डॉलर की हैसियत खत्म हो जाएगी।
विशेषज्ञों ने कहा है कि कर्ज की मात्रा और बढ़ने पर कर्ज चुका पाने की अमेरिका सरकार की क्षमता में निवेशकों का भरोसा घट सकता है। उससे अमेरिका को नया कर्ज अधिक महंगी ब्याज दर पर लेना होगा। उससे कर्ज का दुश्चक्र अधिक गंभीर हो जाएगा। उसके बीच डिफॉल्ट की आशंका अधिक ठोस नजर आने लगेगी।