अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की छात्र कर्ज माफी योजना कानूनी विवाद में उलझती दिख रही है। कई हलकों से ऐसा निर्णय लेने के राष्ट्रपति के अधिकार को कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी की जा रही है। जो बाइडन ने बुधवार को छात्र कर्ज माफी का एलान किया था। इसके तहत सरकार से कर्ज लेने वाले छात्रों के 20 हजार डॉलर तक और निजी संस्थानों से कर्ज लेने वाले छात्रों के 10 हजार डॉलर तक के ऋण को रद्द करने की घोषणा उन्होंने की। विश्लेषकों के मुताबिक बाइडन ने ये कदम नवंबर में होने वाले मिडटर्म चुनावों में अपनी डेमोक्रेटिक पार्टी की स्थिति सुधारने के मकसद से उठाया।
लेकिन अखबार द वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस फैसले को कोर्ट में चुनौती दी जाने वाली है। सरकार ने ये कदम 2003 के एक संघीय कानून के तहत उठाया है, जिसके तहत शिक्षा विभाग को युद्ध या राष्ट्रीय आपदा के समय छात्र कर्ज रद्द करने का अधिकार दिया गया था। बाइडन प्रशासन ने कोरोना महामारी का हवाला देते हुए ये कदम उठाया है। शिक्षा विभाग की वकील लीजा ब्राउन ने कहा है- ‘शिक्षा मंत्री पूरी स्थिति को ध्यान में रखते हुए ऐसा फैसला करने का अधिकार है। वे हर कर्ज के मामले में अलग-अलग निर्णय लेने के लिए बाध्य नहीं हैं।’
विश्लेषकों का कहना है कि अगर कोर्ट ने इस फैसले पर अमल रोका, तो मिडटर्म चुनावों में लाभ पाने की जो बाइडन की उम्मीदों पर पानी फिर सकता है। मिडटर्म चुनाव अगले आठ नवंबर को होगा। उस दिन नए हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव, सीनेट के एक तिहाई सदस्यों, कई राज्यों के गवर्नर और राज्यों की विधायिकाओं के लिए मतदान होगा। अभी तक अनुमान यही है कि इन चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी को भारी नुकसान होगा।
इस बीच कॉरपोरेट सेक्टर, रिपब्लिकन पार्टी और खुद डेमोक्रेटिक पार्टी के भी कई नेताओं ने जो बाइडेन के इस कदम की कड़ी आलोचना की है। आलोचकों ने ध्यान दिलाया है कि खुद बाइडन ने पहले कहा था कि उनके पास इस तरह का फैसला लेने का अधिकार नहीं है। पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के समय शिक्षा विभाग से संबंधित रहे एक अधिवक्ता ने भी इस राय को सही बताया है।
छात्र कर्ज माफी के मामले में राष्ट्रपति की उनकी पार्टी के प्रगतिशील धड़े ने भी आलोचना की है। इस धड़े के नेताओं के मुताबिक बाइडन ने 2020 में राष्ट्रपति के चुनाव के दौरान पूरा छात्र कर्ज माफ करने का वादा किया था। उनके मुताबिक ताजा माफी का फैसला ऊंट के मुंह में जीरा है।
इस फैसले के मुताबिक जिन लोगों की आमदनी सवा लाख डॉलर सालाना है, उनके स्टूडेंट लोन में दस हजार डॉलर की रकम माफ हो जाएगी। जिन्होंने सरकारी सहायता योजना के तहत कर्ज लिया है, उनकी माफी की रकम 20 हजार डॉलर तक होगी। कॉरपोरेट सेक्टर की संस्थाओं ने इस फैसले को बैंकिंग व्यवस्था पर प्रहार बताया है। कुछ अर्थशास्त्रियों ने कहा है कि इस फैसले से महंगाई और बढ़ेगी। जिस समय सरकार बाजार में मुद्रा प्रसार घटाने की कोशिश कर रही है, कर्ज माफी के कारण होने वाली बचत से बाजार में अधिक मुद्रा उपलब्ध होगी। विधि विशेषज्ञों ने कहा है कि कोर्ट में ये सारी दलीलें पेश की जाएंगी।