दुनिया के सभी राष्ट्र 25 साल पहले पृथ्वी की आधी आबादी को अन्य आधे के अधिकार, शक्ति और स्थान देना सुनिश्चित करने के लिए एक साथ आए थे। यह अभी तक नहीं हुआ है और न ही इसके जल्द ही होने के संकेत हैं। आज की अधिक विभाजित, रूढ़िवादी और अभी भी बहुत पुरुष-प्रधान दुनिया में, संयुक्त राष्ट्र के शीर्ष अधिकारियों का कहना है कि महिलाओं के लिए समानता प्राप्त करने की आशा एक दूर का लक्ष्य है।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेस ने कहा कि लैंगिक असमानता हमारे समय की न रोके जा सकने वाली नाइंसाफी है और हमारे सामने सबसे बड़ी मानवाधिकार चुनौती भी है। पिछले हफ्ते महासभा में विश्व नेताओं की वर्चुअल बैठक में अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि कोविड-19 महामारी ने महिलाओं और लड़कियों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। उन्होंने कहा कि जब हम काम नहीं करेंगे लैंगिक समानता को दशकों तक उसकी जगह नहीं दे सकेंगे। बीजिंग में 1995 की संयुक्त राष्ट्र के महिला सम्मेलन के उपलक्ष्य में बृहस्पतिवार की उच्च स्तरीय बैठक के बाद यूएन प्रमुख ने लैंगिक समानता का लक्ष्य पूरा न होने की बात कही।
संयुक्त राष्ट्र उप महासचिव, यूएन वुमन की कार्यकारी निदेशक म्लाम्बो नुका ने कहा कि इस मामले में थोड़ा ही सुधार अभी तक हो सका है। वहीं गुटेरेस ने सदियों से चले आ रहे भेदभाव, पितृसत्ता की गहरी जड़ें वाले और कुप्रथाओं को लैंगिक असमानता का श्रेय दिया।