फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

इंसानी दिमाग तक पहुंच बनाएगी तकनीक: यूएन ने क्यों जताई चिंता; निजता और मानवाधिकारों पर कितना बड़ा खतरा?

Sun, 11 Oct 2026 04:30 AM IST
निर्मल कांत जोनाथन मोएंस, द न्यूयॅर्क टाइम्स।

सार

अपराधियों के दिमाग से जबरन जानकारी निकालना या उनके सोचने के तरीके से यह अनुमान लगाना कि वे भविष्य में कोई अपराध करेंगे या नहीं, यह किसी साइंस-फिक्शन फिल्म की कहानी लग सकती है, लेकिन अब यह वास्तविकता के करीब पहुंच रही है। कैसे? पढ़िए इस रिपोर्ट में। 
विज्ञापन
यूएन का अलर्ट: इंसानी दिमाग पढ़कर लोगों के विचार जान सकेंगी सरकारें - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरस ने बृहस्पतिवार को पहली बार दुनिया को आगाह किया है कि न्यूरोटेक्नोलॉजी (मस्तिष्क से जुड़ी तकनीकें) इतनी तेजी से आगे बढ़ रही हैं कि आने वाले समय में सरकारों द्वारा इन्सानी दिमाग तक पहुंच बनाने और उसे नियंत्रित करने की क्षमता मौलिक मानवाधिकारों के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। यूएन की एक रिपोर्ट के अनुसार, इन उभरती प्रौद्योगिकियों के दुरुपयोग से लोगों को मनमाने ढंग से हिरासत में लिया जा सकता है, उनकी मानसिक स्थिति में बदलाव किया जा सकता है और निजता का गंभीर हनन हो सकता है। गुटेरेस ने लिखा, जब न्यूरोटेक्नोलॉजी को न्याय प्रशासन पर लागू किया जाता है, तो यह गहरे मानवाधिकार संकट खड़े करती है। क्लिनिकल (अस्पतालों) के दायरे से बाहर निकलकर इसका जांच, न्यायिक और जेल प्रशासन में विस्तार अपने संभावित लाभों के साथ-साथ अत्यंत गंभीर जोखिम लेकर आता है।
विज्ञापन

 
  • 2008 में भारत सरकार द्वारा गठित एक समिति ने भी इसे 'सब-ऑप्टिमल' करार दिया था।
  • मनमाने ढंग से लोगों को हिरासत में भी लिया जा सकता है।

विचारों को मिले अति-संवेदनशील निजी डाटा का दर्जा
  • इन्सानी विचारों और मस्तिष्क डाटा को कानूनी रूप से अत्यधिक संवेदनशील व्यक्तिगत डाटा के रूप में मान्यता दी जाए।
  • आपराधिक न्याय प्रणाली में न्यूरोटेक्नोलॉजी के किसी भी उपयोग से पहले व्यक्ति की स्पष्ट सहमति अनिवार्य की जाए।
  • वैश्विक स्तर पर मानवाधिकारों के अनुकूल स्पष्ट कानून बनाए जाएं, इससे पहले कि अदालतों, जांचों और जेलों में दिमाग पढ़ना एक सामान्य दिनचर्या बन जाए।
विज्ञापन

भारत में दो दशकों से इस्तेमाल  लेकिन वैज्ञानिक आधार कमजोर
भारतीय पुलिस पिछले दो दशकों से 'ब्रेन इलेक्ट्रिकल ऑसिलेशन सिग्नेचर'  नामक तकनीक का इस्तेमाल कर रही है, ताकि यह जांचा जा सके कि संदिग्ध किसी अपराध में शामिल था या नहीं। मस्तिष्क की तरंगों को पढ़ने वाली इस तकनीक का वैज्ञानिक आधार बहुत सीमित है और इसे भारतीय अदालतों में सबूत के तौर पर स्वीकार नहीं किया जाता।

ये भी पढ़ें: पाकिस्तान में ईसाई के घर-दुकान में लगाई आग: 35 परिवारों ने छोड़े घर; ईशनिंदा के आरोप में क्या सामने आया?
विज्ञापन


फिर भी हत्या, दुष्कर्म और आतंकवाद जैसे सैकड़ों संवेदनशील मामलों में इसका उपयोग किया गया है। अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय ने बीईओएस को मान्यता नहीं दी है, और 2008 में भारत सरकार द्वारा गठित एक समिति ने भी इसे 'सब-ऑप्टिमल' करार दिया था।

दुनिया में 'न्यूरो-राइट्स' की मांग ने पकड़ा जोर
मस्तिष्क डाटा की सुरक्षा को लेकर कई देशों में कानून बनाए जा रहे हैं।
  • चिली : 2012 में अपने संविधान में मस्तिष्क गतिविधि की सुरक्षा को शामिल किया।
  • अमेरिका : कैलिफोर्निया, कोलोराडो और मोंटाना जैसे राज्यों ने न्यूरल डेटा सुरक्षा कानून पारित किए हैं।
  • लैटिन अमेरिका : अर्जेंटीना, ब्राजील, कोलंबिया और मैक्सिको में भी ऐसे ही कानूनी उपाय प्रस्तावित हैं।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें