डायबिटीज पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट
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डायबिटीज, एक ऐसी बीमारी है, जिसमें रक्त में शुगर की मात्रा बढ़ जाती है जिसका देर से पता चलने, या सही ढंग से उपचार ना किए जाने से, हृदय, रक्त धमनियों, आंखों, गुर्दों और स्नायुतन्त्रों (नर्वस सिस्टम) संबंधी गंभीर बीमारियां हो सकती हैं। सबसे अधिक मामले, 'टाइप 2' डायबिटीज के दिखाई देते हैं, जोकि अक्सर शरीर में इन्सुलिन के प्रति प्रतिरोध बढ़ने की वजह से पैदा होता है। इन्सुलिन शरीर में रक्त शर्करा (blood sugar) को नियंत्रित करने वाला हार्मोन है।
तीन दशकों में तेजी से बढ़े मामले
अब संयुक्त राष्ट्र के एक ताजा अध्ययन में पता चला है कि साल 1990 से 2022 के दौरान डायबिटीज के मामले दुनियाभर में सात प्रतिशत से बढ़कर 14 प्रतिशत हो गए हैं। निम्न और मध्यम आय वाले देशों में सबसे ज्यादा डायबिटीज के मरीज बढ़े हैं। आसानी से उपचार न मिलना इसकी प्रमुख वजह है। यह वैश्विक असमानता को दर्शाता है। वर्ष 2022 में, 30 वर्ष या उससे अधिक आयु के करीब 45 करोड़ वयस्कों को जरूरी उपचार उपलब्ध नहीं था। यह आंकड़ा कुल मरीजों का 59 फ़ीसदी है, जिनमें से 90 फीसदी निम्न- और मध्य-आय वाले देशों में रह रहे हैं।
डायबिटीज के साथ ही मोटापे की समस्या भी बढ़ी
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के महानिदेशक टैड्रॉस ग्रैबेसियस ने कहा कि पिछले तीन दशकों में डायबिटीज के मामलों में चिन्ताजनक रूप से उछाल आया है, इससे मोटापे की समस्या भी बढ़ी है। खान-पान की गलत आदतें, शारीरिक गतिविधियों में कमी और आर्थिक कठिनाइयों के चलते यह समस्या गहराती जा रही है। उन्होंने कहा कि डायबिटीज की समस्या पर नियंत्रण पाने के लिए, देशों को तुरन्त क़दम उठाने होंगे। यूएन की रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण-पूर्व एशिया और पूर्व भूमध्यसागर क्षेत्र में 18 वर्ष या उससे अधिक आयु की 20 फ़ीसदी वयस्क आबादी डायबिटीज से पीड़ित है। इन दोनों क्षेत्रों और अफ़्रीकी क्षेत्र में डायबिटीज़ के उपचार के लिए कवरेज सबसे कम है। हर 10 में से केवल 4 वयस्कों को ही ग्लूकोज कम करने वाली दवा मिल पा रही है।
डायबिटीज़ के बढ़ते बोझ से निपटने के लिए, यूएन स्वास्थ्य एजेंसी ने एक वैश्विक निगरानी फ़्रेमवर्क की शुरुआत की है, जिसके तहत रोकथाम उपायों, उपचार व देखभाल प्रयासों का आकलन किया जा सकेगा।
(नोट: यह लेख संयुक्त राष्ट्र हिंदी समाचार सेवा से लिया गया है।)