क्रीमिया को लेकर रूस और यूक्रेन के बीच बढ़ते टकराव और उसके पीछे अमेरिका और चीन की भूमिकाएं जहां एक ओर उच्च स्त्रातेजिक तापमान वाले इस अंतरराष्ट्रीय विवाद को और अधिक भड़काने का काम कर रहे हैं वहीं इस गंभीर विषय को लेकर विश्व की चिंताएं भी बढ़ती जा रही हैं।
हाल ही में उपरोक्त विषय पर दो ऐसी घटनाएं हमारे समक्ष हैं, जिन्होंने सबकी चिंता और अधिक बढ़ा दी है, पहले उस घटनाक्रम का उल्लेख करना होगा, जिसके तहत यूक्रेन के विदेश मंत्री दिमित्रो कुलेबा ने आधिकारिक रूप से यह घोषणा करके इस क्षेत्र में तनाव काफ़ी अधिक बढ़ा दिया कि उनके देश की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने उस स्ट्रेटेजी के क्रियान्वयन को अपनी मंज़ूरी दे दी है, जिसके अंतर्गत यूक्रेन न सिर्फ क्रीमिया को दोबारा हासिल करने के लिए हर संभव प्रयास करेगा, बल्कि उनका देश सेवस्तोपोल बंदरगाह को भी पुनः अपने साथ शामिल करने को लेकर प्रतिबद्ध है।"
दूसरी तरफ, सेवस्तोपोल बंदरगाह जिसे शीत युद्ध काल मे यूक्रेनियन सरकारों ने सोवियत संघ को लीज पर दे रखा था, वह आज न केवल रूस के सबसे बड़े नौसैनिक अड्डो में से एक है, बल्कि स्ट्रेटेजिक महत्व वाले काले सागर में साल के बारह महीने खुले रहने वाला महत्वपूर्ण रूसी नौसैनिक अड्डा भी है, जिस पर रूस किसी भी कीमत पर आंच नही आने देगा।
विदेश मंत्री कुलेबा की उपरोक्त घोषणा के उपरांत यूक्रेनी राष्ट्रपति जिलेंस्की ने ट्विटर हैंडल पर यह जानकारी दी कि उनका देश 'क्रीमियन प्लेटफॉर्म इनिशिएटिव' नाम से एक अंतरराष्ट्रीय मंच तैयार कर रहा है, जो क्रीमिया पर अवैध रूसी कब्जे के विरुद्ध न सिर्फ़ अंतर्राष्ट्रीय वातावरण बनाएगा बल्कि अमेरिका, यूरोपियन यूनियन, कनाडा और टर्की के साथ वे जल्दी ही इसके अंतर्गत एक बैठक भी करने जा रहे हैं।
अमेरिका ने हाल ही में एलान किया कि यूक्रेन को 125 मिलियन अमेरिकी डॉलर की सैनिक सहायता के अलावा शीघ्र ही उन्हें 150 मिलियन डॉलर की सहायता और भी दी जाएगी। लेकिन यह सहायता यूक्रेन को तभी दी जा सकेगी, जब यूक्रेन अपनी 'उचित' रूस विरोधी गतिविधियों से अमेरिकी रक्षा और विदेश मंत्रालय को संतुष्ट नहीं कर देगा, वास्तव में यूक्रेन रूस के विरुद्ध पूरी तरह अमेरिकी शरण में जाता हुआ दिखाई दे रहा है, अमेरिका लगातार क्रीमिया के विषय पर यूक्रेन को हर संभव सहायता के लिए आश्वस्त करता दिखता है, जबकि रूस एक लाख से अधिक सैनिकों की तैनाती के साथ यूक्रेन पर दबाव बनाए हुए है कि अमेरिका के साथ नाटो में जाने का खामियाजा यूक्रेन को बहुत भारी पड़ सकता है।
इस विषय पर यहां एक दूसरी घटना का उल्लेख करना भी आवश्यक होगा, जिसके अंतर्गत चीन ने उपरोक्त विवाद पर रूस का साथ देने की प्रतिबद्धता जताई है जिसके विरुद्ध तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए हुए शिनजियांग और हांगकांग में मानवाधिकार हनन के नाम पर अमेरिका ने बीजिंग में आयोजित हो रहे विंटर ओलंपिक्स के राजनयिक बहिष्कार की घोषणा कर दी।
इसके विरुद्ध चीन ने भी काफी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की, लेकिन यहां एक विशेष बात यह भी हुई कि भारत जो अब तक यूक्रेन के अंतरराष्ट्रीय विवाद से खुद को अलग किए हुए था, उसे भी तब बड़ी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करनी पड़ी जब चीन की तरफ से दो फरवरी को ओलंपिक मशाल रैली में चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के उस रेजिमेंट कमांडर क्वी फैबाओ को मशाल दे गई गई, जो 15 जून 2020 को पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों के साथ हुई मुठभेड़ शामिल था।
उपरोक्त घटना को उकसाने वाली व अति निंदनीय करार देते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने अपनी प्रेस वार्ता में यह जानकारी दी कि "भारत बीजिंग में आयोजित हो रही शीतकालीन ओलम्पिक खेलों के उद्घाटन व समापन समारोह का बहिष्कार करेगा"। ज़ाहिर है जहां रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान सहित 30 से अधिक राष्ट्रों व अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के अध्यक्ष इस समारोह में भागीदारी करेंगे वहीं, दूसरी ओर अमेरिका, यूरोपियन यूनियन और कनाडा के साथ भारत इस समारोह का बहिष्कार करेगा।
यूक्रेन व पूर्वी यूरोप को लेकर वर्तमान में अमेरिका और रूस के तेज़ी से बिगड़ते हुए संबंध और इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेज़ी से होती खेमेबंदी एक नए शीत युद्ध की आहट भी हो सकती है, निश्चित रूप से आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय घटनाचक्र न सिर्फ़ काफ़ी महत्वपूर्ण होगा बल्कि इसकी परिणति काफी भयानक भी हो सकती है।
(लेखक मेरठ कॉलेज में रक्षा अध्ययन विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है)