ब्रिटेन में दीर्घकालिक बीमारी से शिकार श्रमिकों की संख्या रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। जुलाई में ये संख्या 25 लाख तक पहुंच गई। ऐसा बेरोजगारी दर में गिरावट के बावजूद आया है। ताजा जारी आंकड़ों के मुताबिक सिर्फ जुलाई में डेढ़ लाख से ज्यादा श्रमिक लंबी अवधि की बीमारियों के शिकार हो गए। स्वास्थ्य संबंधी ऐसी समस्याओं के कारण लगभग चार लाख लोगों ने नौकरी छोड़ दी है। विशेषज्ञों के मुताबिक ये स्थिति कोरोना महामारी का नतीजा है। कोरोना संक्रमण अपने कई प्रभाव छोड़ गया, जिनका ठीक से इलाज नहीं हुआ। अब उसका असर देखने को मिल रहा है।
ब्रिटेन के राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के मुताबिक 50 से 64 वर्ष उम्र वर्ग के जितने श्रमिकों ने जुलाई में नौकरी छोड़ी, वैसा सिर्फ मार्च 2020 में देखा गया था, जब कोरोना महामारी की पहली मार के बीच लॉकडाउन लागू हुआ था। जानकारों ने कहा है कि ब्रिटेन में 20 साल से ट्रेंड लोगों की सेहत में सुधार का रहा है। कोविड-19 महामारी ने इस ट्रेंड को पलट दिया है।
जुलाई में ब्रिटेन में बेरोजगारी की दर 3.8 फीसदी से घट कर 3.6 फीसदी पर आ गिरी। लेकिन अब विशेषज्ञों ने कहा है कि ऐसा संभवतः बड़ी संख्या में बीमार कर्मचारियों के श्रम बाजार से खुद को अलग कर लेने के कारण हुआ है। थिंक टैंक आईएनजी से जुड़े अर्थशास्त्री जेम्स स्मिथ ने अखबार द गार्जियन को बताया कि बहुत से लोगों ने सर्वे के दौरान अपने को बेरोजगार की जगह निष्क्रिय लिखवाया। इस वजह से बेरोजगारी की दर गिरी हुई दिखी है। स्मिथ ने कहा कि यह स्थिति बेशक राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (एनएचएस) पर बढ़े दबाव का नतीजा है, जो सबको समय पर चिकित्सा नहीं दे पा रही है। जॉब संबंधी वेबसाइट ग्लोबल जॉब से जुड़े अर्थशास्त्री जैक केनेडी ने कहा है- हम स्पष्टतः श्रम बाजार कमजोर पड़ते देख रहे हैं।
कुछ विशेषज्ञों के मुताबिक असामान्य रूप से बढ़ी महंगाई भी श्रमिक वर्ग की बिगड़ती स्थिति का कारण है। ब्रिटेन में जुलाई में वेतन में औसत वृद्धि 5.5 फीसदी रही, जबकि महंगाई दर 10.1 फीसदी थी। महंगाई की सबसे ज्यादा मार पब्लिक सेक्टर के कर्मचारियों पर पड़ी है। इन कर्मचारियों के वेतन में जुलाई औसत वृद्धि दो फीसदी रही, जबकि प्राइवेट सेक्टर में ये दर 6 फीसदी रही। कुल मिला कर अगर मुद्रास्फीति दर की तुलना में देखा जाए, तो कर्मचारियों के वेतन में असल में 2.6 फीसदी की गिरावट आई।
कंसल्टैंसी फर्म पैथियॉन मैक्रोइकोनॉमिक्स के अर्थशास्त्री सैमुएल टॉम्ब्स ने कहा है कि नौकरियों के अवसर लगभग ना के बराबर बढ़ रहे हैं। मई से जुलाई तक के तीन महीनों में नौकरियों की संख्या में 36 हजार की गिरावट आई। उधर कर्मचारियों के लॉन्ग टर्म सिकनेस और उम्र से जुड़ी बीमारियों से पीड़ित होने के कारण श्रम बाजार की सूरत और बिगड़ गई है।
ब्रिटिश चैंबर्स ऑफ कॉमर्स में पीपुल पॉलिसी विभाग के प्रमुख जेन ग्रैटॉन ने द गार्जियन से बातचीत में स्वीकार किया कि असल समस्या महंगाई और आर्थिक मंदी जैसी स्थिति है। उन्होंने कहा- ‘बढ़ती महंगाई और गतिरुद्ध अर्थव्यवस्था के बीच हम कर्मचारियों की भर्ती नहीं कर सकते।’