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क्या तानाशाही की ओर बढ़ा तुर्किये: कैसे धर्मनिरपेक्ष विरासत मिटा रहे अर्दोआन? जानें ओटोमन काल से पूरा इतिहास

Sat, 17 May 2025 07:06 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र स्पेशल डेस्क, अमर उजाला

सार

तुर्किये का इतिहास क्या है? ओटोमन काल में एक शक्तिशाली साम्राज्य से लेकर आधुनिक तुर्किये की कहानी क्या है? इस देश को किन दो नामों ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया और कैसे इन्हीं दो शख्सियतों के रास्ते बिल्कुल उलट रहे हैं? आइये जानते हैं...
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आधुनिक तुर्किये के संस्थापक अतातुर्क और मौजूदा राष्ट्रपति अर्दोआन (बाएं से दाएं)। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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भारत की तरफ से पाकिस्तान में छिपे आतंक के आकाओं को निशाना बनाए जाने के बाद अधिकतर देशों ने ऑपरेशन सिंदूर को मौन सहमति दी है। हालांकि, जिन तीन देशों की तरफ से पाकिस्तान के प्रति समर्थन जताया गया है, उनमें चीन के अलावा तुर्किये और अजरबैजान शामिल हैं। इनमें सबसे चौंकाने वाला रवैया अब तक तुर्किये का रहा है, जो कि ऐतिहासिक समय से भारत का करीबी रहा। हालांकि, रजब तैयब अर्दोआन के शासन में यह देश धीरे-धीरे इस्लामिक जगत का नेतृत्व करने के सपने के साथ धर्मनिरपेक्ष और गुटनिरपेक्ष देशों से दूर होता चला गया और धार्मिक आधार पर कूटनीति में शामिल हो गया। 
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चौंकाने वाली बात यह है कि इस्लामिक जगत का नेता बनने के चक्कर में जिस तुर्किये ने बीते वर्षों में पाकिस्तान से संबंध बढ़ाए हैं, वह कभी धर्मनिरपेक्षता और गुटनिरपेक्षता की तरफ बढ़ने की वजह से भारत के काफी करीब आ गया था। आधुनिक तुर्किये के संस्थापक कहे जाने वाले मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने इस देश की नींव कुछ इस तरह रखी थी कि तुर्किये लंबे समय तक संसदीय और सैन्य व्यवस्था के साए में रहने के बावजूद लोकतांत्रिक मार्गों पर लौट आया। हालांकि, अब अर्दोआन के नेतृत्व में तुर्किये एक बार फिर अपने संस्थापक की विरासत से ही उलट बढ़ने लगा है। 

ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर तुर्किये का इतिहास क्या है? ओटोमन काल में एक शक्तिशाली साम्राज्य से लेकर आधुनिक तुर्किये की कहानी क्या है? इस देश को किन दो नामों ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया और कैसे इन्हीं दो शख्सियतों के रास्ते बिल्कुल उलट रहे हैं? आइये जानते हैं...
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पहले बात मौजूदा तुर्किये के अस्तित्व में आने की?
तुर्किये जिसे पहले तुर्की कहते थे दुनिया का नक्शे पर यूरेशिया में स्थित है। दरअसल, यूरेशिया एक भौगोलिक भूखंड है, जो यूरोप और एशिया महाद्वीप को मिलाकर बना है। इस देश का कुछ भाग यूरोप में और अधिकांश भाग एशिया में पड़ता है। इसीलिए इसे यूरोप और एशिया के बीच का 'पुल' भी कहा जाता है। 1923 में आधुनिक तुर्किये के अस्तित्व में आने से पहले यह ओटोमन साम्राज्य का हिस्सा था। 



पहले विश्वयुद्ध में ओटोमन साम्राज्य को हार मिली। हार के साथ इस साम्राज के पतन की पटकथा भी लिख दी गई। ओटोमन सम्राज्य के अंतिम सुल्तान मेहमत VI ने मित्र राष्ट्रों की मांगों का विरोध असंभव मान लिया था। इसके बाद भी कुछ  सैनिकों और अलग-अलग संगठनों ने इसका प्रतिरोध जारी रखा। 15 मई 1919 को यूनानी सेना ने जब इजमिर पर कब्जा कर लिया तो यह आंदोलन और तेज हो गया। इस आंदोलन में मुस्तफा कमाल अतातुर्क एक नायक के रूप में उभरे।

मुस्तफा कमाल युद्ध के दौरान ओटोमन सेना के एक सफल अधिकारी थे। प्रथम विश्व युद्ध के बाद कमाल को एक आधिकारिक मिशन पर सम्सून भेजा गया। वहां पहुंचते ही उन्होंने सरकार की इच्छा के खिलाफ प्रतिरोध को संगठित करना शुरू कर दिया। जुलाई-अगस्त 1919 में एरज़ुरुम और फिर सितंबर में सिवास में देशव्यापी प्रतिनिधियों की कांग्रेस आयोजित हुई। इसके बाद अनातोलिया और रूमेलिया के अधिकारों की रक्षा के लिए एक संघ की स्थापना हुई।  मुस्तफा कमाल इसकी कार्यकारी समिति के अध्यक्ष बने और उन्होंने आंदोलन का नेतृत्व किया। चार साल तक चले संघर्ष के बाद 29 अक्टूबर 1923 को तुर्की देश को गणराज्य घोषित कर दिया गया। 

मुस्तफा कमाल इस नए गणराज्य के पहले राष्ट्रपति चुने गए। इसके बाद 3 मार्च 1924 को खिलाफत व्यवस्था समाप्त कर दी गई और ओटोमन वंश के सभी सदस्यों को देश से निष्कासित कर दिया गया। 20 अप्रैल 1924 को तुर्की ने एक पूर्ण गणतांत्रिक संविधान अपनाया। इसमें इस्लाम को राज्य धर्म के रूप में बनाए रखा गया था, लेकिन अप्रैल 1928 में यह प्रावधान भी हटा दिया गया और तुर्की एक पूर्ण रूप से धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बन गया। मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने व्यापक सुधार किए जिसने तुर्की समाज के हर हिस्से को प्रभावित किया। लोगों को यूरोपीय पोशाक पहनने के लिए प्रोत्साहित किया गया। तुर्की कानून में जर्मन, स्विस और इतालवी कानून संहिताओं को शामिल किया गया। यहां तक कि तुर्की वर्णमाला को अरबी से लैटिन लिपि में बदलने तक का आदेश भी अतातुर्क ने ही दिया था।  

1938 में अतातुर्क का निधन हो गया और एक साल बाद दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ। जब ये विश्वयुद्ध खत्म हुआ तो उसके बाद तुर्की जिसे अब तुर्किये कहते हैं में भी हालत बदलने लगे। इस युद्ध में तुर्किये अतातुर्क के सिद्धांत के मुताबिक तटस्थ रहा। युद्ध के अंत में जरूर उसने जापान और जर्मनी के खिलाफ युद्ध की बात कही लेकिन इसका हिस्सा नहीं बना। युद्ध के बाद अतातुर्क की रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी से अलग होकर  1946 में डेमोक्रेटिक पार्टी बनी।  इसका विरोध हुआ तो उस वक्त राष्ट्रीय नेता और अतातुर्क के उत्तराधिकारी इस्मेत इनोनू ने इसे बहुदलीय व्यवस्था का समर्थन कर दिया और 1947 में राष्ट्रीय अपिवर्तनीय नेता का दर्जा भी छोड़ दिया।  इसके बाद 1950 में जब देश के पहले स्वतंत्र चुनाव हुए तो डेमोक्रेटिक पार्टी ने 54% वोट और 396 सीटें जीतकर भारी बहुमत हासिल किया।  जबकि रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी सिर्फ 68 सीटों पर सिमट गई। इस जीत के पीछे अमेरिकी प्रभाव, सामाजिक परिवर्तन, आर्थिक उदारीकरण की इच्छा, बेहतर संगठन और अतातुर्क की पार्टी के प्रति जन असंतोष जैसे कई कारण माने जाते हैं।

लोकतांत्रित तुर्किये की सत्ता सेना पास कैसे चली गई? 
डेमोक्रेटिक पार्टी के सत्ता में आने के बाद तुर्किये के सिद्धांतों में भी बदलाव आने लगा। 1952 में तुर्किये ने अतातुर्क की तटस्थता की नीति को त्याग दिया और नाटो में शामिल हो गया। डेमोक्रेटिक पार्टी पर रूढ़िवादी धार्मिक संगठनों को बढ़ावा देने के आरोप लगे। विपक्षियों के दमन की भी कोशिश की गई। 1958–60 के बीच देश की आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी। बेरोजगारी, महंगाई चरम पर पहुंच गई। सरकार का दमन और कठोर हुआ। अप्रैल 1960 में इनोनू के प्रचार को रोकने के लिए सेना को लगाया गया और रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी  की जांच के लिए समिति बनाई गई। जब यह अफवाह फैली कि सरकार रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी  को प्रतिबंधित कर सकती है, तो छात्रों ने प्रदर्शन शुरू कर दिया और 28 अप्रैल को मार्शल लॉ लागू कर दिया गया। 

इसके साथ ही देश की सत्ता में सेना के हाथ में आ गई।  इसके बाद डेमोक्रेटिक पार्टी को खत्म कर दिया गया। इसके अधिकांश नेता जेल भेज दिए गए। कुछ नेताओं को फांसी तक की सजा हुई। इसके बाद देश में नए सिरे से संविधान पर काम हुआ और 1961 में नए सिरे से चुनाव हुए। तुर्किये में इस्लाम समर्थक पार्टियों का तंत्र अपनी पकड़ बनाने लगा। 1970-80 के दशक में यह अपने चरम पर था। उस दौर में रजब तैयब अर्दोआन भी इस्लामवादी गुटों का हिस्सा बने। यही अर्दोआन आज तुर्किये की सत्ता पर काबिज हैं। उस दौर में अर्दोआन सबसे पहले नेकमेट्टिन अर्बाकान की इस्लामिक वेलफेयर पार्टी का हिस्सा बने। जैसे-जैसे इस पार्टी की लोकप्रियता बढ़ती, अर्दोआन भी ताकतवर होते चले गए। 



1980 में एक बार फिर देश में मॉर्शल लॉ लागू किया। 1983 में नए सिरे से चुनाव हुए तो तुर्गुत ओजल की मदरलैंड पार्टी को जीत मिली। एक साल बाद ही 1984 में कुर्दिशतान वर्कर्स पार्टी ने देश की सत्ता के खिलाफ अलगाववादी गुरिल्ला युद्ध शुरू कर दिया। 1992 में तुर्किये के 20,000 सैनिकों ने इराक में स्थिति अलगावादियों की पनाहगार पर हमला किया। 

…और शुरू हुआ देश की सत्ता का इस्लामीकरण? 
1994 में इस्लामिक वेलफेयर पार्टी ने अर्दोआन को इस्तांबुल के मेयर पद का उम्मीदवार बनाया और उन्होंने जीत हासिल की। इसी के साथ अर्दोआन का देश के सबसे अहम शहर में शासन शुरू हुआ। अगले चार साल उन्होंने अपनी राजनीति को और मजबूत किया। 1996 में तुर्किये की सेंटर-राइट विचारधारा वाला गठबंधन खत्म हो गया और वेलफेयर पार्टी के नेता नेकमेटिन एर्बाकन सत्ता में आए। 1922 के बाद यह पहली बार था जब तुर्किये में इस्लाम समर्थक सरकार का नेतृत्व कर रहे थे। हालांकि, एक साल बाद ही सैन्य विद्रोह के चलते यह सरकार गिर गई। 1998 में वेलफेयर पार्टी पर प्रतिबंध लगा दिया गया। अर्दोआन पर नस्लीय नफरत भड़काने के आरोप लगे और उन्हें इस मामले में दोषी भी पाया गया। इस मामले में उन्हें करीब चार महीने जेल में काटने पड़े थे। 



अगस्त 2001 में अर्दोआन ने सहयोगी अब्दुल्ला गुल के साथ अपनी इस्लामवादी पार्टी- एकेपी की स्थापना की। एकेपी को 2002 में हुए संसदीय चुनाव में बहुमत हासिल हुआ। इसी के साथ अर्दोआन तुर्किये के प्रधानमंत्री बने। तब से लेकर अब तक बीते 22 वर्षों में अर्दोआन कभी प्रधानमंत्री तो कभी राष्ट्रपति के तौर पर सत्ता पर पकड़ बनाए हुए हैं।  मौजूदा समय में भी वे अपनी जस्टिस एंड डेवलपमेंट पार्टी (एकेपी) के अध्यक्ष हैं। 

और फिर देखते ही देखते इस्लामवादी राष्ट्रप्रमुख बन गए अर्दोआन?
तुर्किये पर एक दशक तक शासन के बाद अर्दोआन ने तुर्किये के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को तोड़ने की शुरुआत कर दी। मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने तुर्किये की बुनियाद जिस आधुनिक इस्लाम के आधार पर रखने का सपना देखा था, अर्दोआन ने उस सपने को ही किनारे लगा दिया। अर्दोआन ने सबसे पहले सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ी महिलाओं के लिए सिर ढंकने पर लगे प्रतिबंध को हटाया। यह प्रतिबंध 1980 में तुर्किये में हुए सैन्य तख्तापलट के बाद लगा था। अर्दोआन ने कई मौकों पर व्याभिचार (एडल्टरी) को भी अपराध घोषित करने पर बात की है। उन्होंने यह भी कहा है कि किसी भी मुस्लिम परिवार को परिवार नियोजन नहीं करना चाहिए और अपने वंश को लगातार आगे बढ़ाना चाहिए।



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अर्दोआन को इस्लामवादियों को बढ़ावा देने के भी आरोप लगे हैं। उन पर मिस्र में सक्रिय रहे कट्टरपंथी संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड के चार उंगलियों वाले सैल्यूट को भी दोहराने का आरोप लगा है। उनके साथ एक हालिया विवाद, जिसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा हुई, वह इस्तांबुल के ऐतिहासिक हैगिया सोफिया को एक मस्जिद में बदलने से जुड़ा था। दरअसल, 1500 साल से ज्यादा पुराने हैगिया सोफिया को ईसाइयों के कैथेड्रल के तौर पर बनाया गया था। लेकिन ओटोमन साम्राज्य के दौरान इसे मस्जिद में बदल दिया गया। जब आधुनिक तुर्किये के संस्थापक कमाल अतातुर्क सत्ता में आए तो उन्होंने हैगिया सोफिया को एक संग्रहालय बना दिया, ताकि तुर्किये की पहचान धर्मनिरपेक्ष देश की तरह रहे। हालांकि, अर्दोआन ने देश के संस्थापक के फैसले को ही पलट दिया। 



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सत्ता से हटने का खतरा दिखा तो तुर्किये की शासन व्यवस्था बदली
भारत की तरह ही तुर्किये में भी राष्ट्रपति का पास सत्ता से जुड़ी ताकतें नहीं होती थीं और राष्ट्रपति का चुनाव भी संसद के जरिए ही होता था। हालांकि, अर्दोआन ने इस व्यवस्था को बदलने के लिए 2010 में एक जनमत संग्रह कराया और सबसे पहले राष्ट्रपति के चुनाव को जनता के जरिए करवाना सुनिश्चित किया। 

इसके बाद अर्दोआन ने 2014 में तुर्किये के प्रधानमंत्री का पद छोड़कर राष्ट्रपति के पद के लिए खड़े होने का फैसला किया और जीत हासिल की। लेकिन इसके दो नुकसान हुए। पहला- 2015 में हुए आम चुनाव में उनकी पार्टी के हाथ से बहुमत चला गया। दूसरा- 2016 में तुर्किये में तख्तापलट की कोशिशें हुईं। बताया जाता है तब बागी सैनिक अर्दोआन को पकड़ने ही वाले थे। हालांकि, वे बच निकले और तख्तापलट की कोशिशों को नाकाम कर दिया गया। 

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अर्दोआन ने इस तख्तापलट की कोशिशों को सत्ता में अपनी पकड़ और मजबूत करने के लिए इस्तेमाल किया और 2017 में एक और जनमत संग्रह कराया। इसके तहत तुर्किये में अधिकतर ताकतें राष्ट्रपति के पास लाने का प्रावधान रखा गया। जनमत संग्रह में उनकी पार्टी को जीत मिली और संसद की आगे की भूमिका कमजोर होती चली गई। इस बदलाव के बाद 2018 में जब आम चुनाव कराए गए तो यह प्रधानमंत्री पद के लिए न होते हुए सीधा राष्ट्रपति पद के लिए हुए। यानी तुर्किये एक संसदीय लोकतंत्र से अमेरिका की तरह राष्ट्रपति के नेतृत्व वाला सिस्टम बन चुका था। 2018 के चुनाव में अर्दोआन को जबरदस्त जीत मिली। तब से लेकर अब तक अर्दोआन बेरोकटोक और तानाशाही रवैया अपनाते हुए तुर्किये की सत्ता में बने हुए हैं। 

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चलते-चलते रजब तैयब अर्दोआन के राजनीति में आने से पहले का जीवन भी जान लीजिए?
फरवरी 1954 में जन्मे रजब तैयब अर्दोआन के पिता तुर्किये के काला सागर तट पर कोस्टगार्ड थे। जब रजब 13 साल के थे, तब उनके पिता अपने पांच बच्चों के साथ इस्तांबुल आ गए। यहां अर्दोआन ने शुरुआती समय में शरबत बेचकर गुजारा किया। इसके अलावा अतिरिक्त कमाई के लिए वे ब्रेड-बन भी बेचने लगे। इसी के जरिए उन्होंने इस्लामिक स्कूल में पढ़ाई जारी रखी। अर्दोआन ने बाद में इस्तांबुल की मरमारा यूनिवर्सिटी से प्रबंधन की डिग्री हासिल की। इस दौरान उन्होंने प्रोफेशनल फुटबॉल खेला। हालांकि, उनके खेल जीवन से ज्यादा चर्चा हमेशा राजनीतिक जीवन की रही है।
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