तुर्किये में राष्ट्रपति चुनाव के लिए रविवार को होने वाले दूसरे दौर के मतदान में राष्ट्रपति रजिब तयिब आर्दोआन की संभावनाएं बेहतर मानी जा रही हैं। लेकिन इस चुनाव ने देश में जनमत को गहराई तक बांट दिया है। यह बात विदेशों में रहने वाले तुर्किये के नागरिकों के बीच चली मतदान प्रक्रिया के दौरान जाहिर हुई। विदेशी राजधानियों में तुर्किये वासियों के लिए मतदान पिछले कई दिन से चल रहा है।
जर्मनी में बर्लिन स्थित तुर्किये वाणिज्य दूतावास में अपना वोट डालने के बाद पेशे से आर्किटेक्ट 32 वर्षीया कानसू येनी ने ब्रिटिश अखबार द गार्जियन से कहा कि यह देश के लिए निर्णायक चुनाव है। इसके परिणाम से तय होगा कि देश आगे बढ़ेगा या बिखराव की तरफ जाएगा। येनी उन दर्जनों लोगों में एक हैं, जो पांच साल पहले तुर्किये से जर्मनी चले गए थे। उन लोगों की शिकायत है कि तुर्किये में लोकतंत्र का गला घोंटने की चली प्रक्रिया के बाद वहां रहना कठिन हो गया है। उन्होंने कहा- ‘देश में तानाशाही कायम हो गई है। मुझे और मेरे दोस्तों को बहुत भुगतना पड़ा है। इसलिए हमें यह तय करने में कोई दिक्कत नही हुई कि हमें इस चुनाव में किसे वोट देना है।’
पूरे यूरोप में 34 लाख तुर्किये वासियों ने अपने को मतदाता के तौर पर रजिस्टर कराया है। इनमें सबसे ज्यादा लगभग 15 लाख जर्मनी में हैं। उसके बाद फ्रांस का नबर है, जहां तकरीबन चार लाख तुर्किये वासियों ने मतदान के लिए अपना नाम दर्ज कराया था। द गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक प्रवासी तुर्किये वासियों में इस चुनाव को लेकर गहरा विभाजन देखा गया। बड़ी संख्या में इन लोगों ने राष्ट्रपति आर्दोआन के पक्ष में मतदान किया, जबकि उनके विरोधी कमाल किलिचदारग्लू को वोट देने वाले मतदाताओं की संख्या भी अच्छी-खासी रही है।
गार्जियन के मुताबिक इन देशों के साथ-साथ नीदरलैंड्स और बेल्जियम में भी बड़ी संख्या में तुर्किये के नागरिक दशकों से रहते चले आए हैं। गार्जियन के मुताबिक इन सभी देशों में आर्दोआन के पक्ष में भारी मतदान हुआ है। एक सर्वे के मुताबिक जर्मनी में 66 फीसदी तुर्की नागरिकों ने आर्दोआन के पक्ष में मतदान किया। फ्रांस, नीदरलैंड्स और बेल्जियम में यह संख्या क्रमशः 64, 68 और 72 फीसदी रही।
फ्रांस में रहने वाले टर्क लेखक क्लायर कोच ने द गार्जियन से कहा- ‘जब आप विदेश में रहते हैं, तो देश के अंदर क्या हो रहा है, इससे आप ज्यादा प्रभावित नहीं होते। ऐसे में उस व्यक्ति के पक्ष में मतदान करने का रुझान ज्यादा हो जाता है, जो आपकी धार्मिक और राष्ट्रीय पहचान को तुष्ट करता हो, भले ऐसा वह अपने हित में कर रहा हो।’
थिंक टैंक जर्मन सेंटर फॉर इंटीग्रेशन एंड माइग्रेशन रिसर्च से जुड़े राजनीतिक-समाजशास्त्री रोजा बुर्च ने कहा है- ‘बहुत से लोगों के लिए व्यक्तिगत रूप से आकर मतदान करना वर्षों से जमा होते गए गुस्से और असंतोष को व्यक्त करने का एक माध्यम बन गया है।’ अन्य विश्लेषकों ने कहा है कि विदेशों में रहने वाले लोगों को वहां की जिंदगी में कई तरह के असंतोष से गुजरना पड़ता है। अपने देश के ‘मजबूत’ नेता के पक्ष में मतदान करने से उनमें अहसास जगता है कि उन्होंने उसका जवाब दे दिया है।