ट्यूनिशिया में प्रधानमंत्री हिचेम मेचिचि को हटाए जाने और संसद निलंबित किए जाने के बाद अब देश का लोकतंत्र अधर में है। ट्यूनिशिया अकेला देश है, जहां अरब स्प्रिंग (वसंत) के बाद टिकाऊ लोकतंत्र कायम हुआ। लेकिन पर्यवेक्षकों का कहना है कि कोविड-19 महामारी और इसके कारण पैदा हुए आर्थिक संकट ने लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर दीं। गौरतलब है कि 2011 में कई अरब देशों में हुए सत्ता विरोधी आंदोलनों को अरब स्प्रिंग के नाम से जाना जाता है।
देश में जारी सरकार विरोधी प्रदर्शनों के बीच बीते रविवार को ट्यूनिशिया के राष्ट्रपति कैश सईद ने अपने संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए सरकार को बर्खास्त कर दिया। संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक राष्ट्रपति 30 दिन तक सरकार के अधिकार अपने हाथ में रख सकते हैं। राष्ट्रपति ने कहा है कि उन्होंने तख्ता पलट नहीं किया है और जल्द ही नए प्रधानमंत्री की नियुक्ति करेंगे। लेकिन राजनीतिक दलों का आरोप है कि वे अपनी तानाशाही कायम करने की कोशिश कर रहे हैं।
देश की जनता में राष्ट्रपति के इस कदम के खिलाफ ज्यादा विरोध भाव नहीं देखा गया है। बल्कि कई जन समूहों ने सड़कों पर आकर खुशी का इजहार किया। पर्यवेक्षकों का कहना है कि इससे यह जाहिर होता है कि मेचिची सरकार किस हद तक अलोकप्रिय हो गई थी। अब आशंका जताई जा रही है कि ट्यूनिशिया में मिस्र जैसी घटनाएं दोहराई जा सकती हैं, जहां 2011 में लोकतंत्र कायम होने के बाद फिर तानाशाही लौट आई थी। गौरतलब है कि मिस्र और सऊदी अरब ने राष्ट्रपति सईद के कदम को परोक्ष समर्थन दिया है।
सईद 2019 में सबको हैरत में डालते हुए राष्ट्रपति निर्वाचित हुए थे। इसके पहले वे कानून के प्रोफेसर थे। उनकी अपनी कोई राजनीतिक पार्टी भी नहीं है। जानकारों का कहना है कि चूंकि ट्यूनिशिया के संविधान में राष्ट्रपति को बहुत कम अधिकार मिले हुए हैं, इसलिए देश में पैदा हुए आर्थिक संकट की जिम्मेदारी से वे बचे रहे। कहा जा रहा है कि अब उन्होंने देश में गहराते गए जन असंतोष का फायदा उठाया है।
अमेरिकी एजेंसी पिउ रिसर्च के सर्वे के मुताबिक कोरोना महामारी से पहले भी ट्यूनिशिया में गहरा जन असंतोष था। पिछले साल मार्च में पिउ के एक सर्वे में यह सामने आया कि देश के सिर्फ 15 फीसदी लोगों का भरोसा सरकार में बचा था। 89 फीसदी लोगों ने कहा था कि देश में भ्रष्टाचार फैला हुआ है। जबकि सिर्फ 34 फीसदी लोगों ने राय जताई कि सरकार भ्रष्टाचार की समस्या से निपटने की कोशिश कर रही है। महामारी के बाद आर्थिक संकट बढ़ा, तो असंतोष और बढ़ गया। हाल में एक सर्वे से सामने आया कि देश की एक चौथाई आबादी खाद्य संकट से जूझ रही है।
विश्लेषकों का कहना है कि ताजा घटनाओं ने इस समझ को गलत साबित किया है कि ट्यूनिशिया में लोकतंत्र का प्रयोग सफल रहा है। हालांकि आज भी ट्यूनिशिया के ज्यादातर लोग एक दशक पहले हुई क्रांति को लेकर गर्व का भाव जताते हैं, लेकिन उनकी यह भी राय है कि क्रांति गलत दिशा में चली गई। अब विश्लेषकों का ध्यान राष्ट्रपति सईद के अगले कदम पर है।
अमेरिकी थिंक टैंक कारनेगी एनडॉवमेंट में ट्यूनिशिया विशेषज्ञ सराह येर्कीज ने अमेरिकी वेबसाइट एक्सियोस.कॉम से कहा- ‘देखने की बात यह है कि सईद जल्द ही एक नए प्रधानमंत्री की नियुक्ति करते हैं या फिर आम हालत बहाल करने के नाम पर सत्ता अपने पास बनाए रखते हैँ।’ येर्कीज ने कहा कि अब सेना का क्या रुख रहता है, यह भी देखना होगा। आशंका जताई गई है कि अगर सड़कों पर विरोध प्रदर्शन हुए, तो सेना उसके बीच दखल दे सकती है।