समझौते के मुताबिक ईरान को अपने संवर्धित यूरेनियम के भंडार को कम करना था और अपने परमाणु संयंत्रों को निगरानी के लिए खोलना था, बदले में उसपर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में आंशिक रियायत दी गई थी। इस समझौते के तहत ईरान को अपने उच्च संवर्धित यूरेनियम भंडार का 98 प्रतिशत हिस्सा नष्ट करना था और उसे अपने मौजूदा परमाणु सेंट्रीफ्यूज में से दो तिहाई को भी हटाना था। वहीं समझौते के अनुसार ईरान पर हथियार खरीदने के लिए लगाया गया प्रतिबंध पांच वर्षों के लिए जारी रहता जबकि मिसाइल प्रतिबंध आठ साल तक बने रहने थे। इसके बदले में ईरान को तेल और गैस के कारोबार, वित्तीय लेन देन, उड्डयन और जहाजरानी के क्षेत्रों में लागू प्रतिबंधों में ढील दी जानी थी।
ईरान में दो जगहों, नाटांज और फोर्डो में यूरेनियम का संवर्धन किया जाता है। जिसका उपयोग परमाणु ऊर्जा के लिए किया जाता है। इसका उपयोग परमाणु हथियारों को विकसित करने के लिए किया जा सकता है। जुलाई 2015 में ईरान के पास 20 हजार ऐसे मशीनी केंद्र थे, जहां यूरेनियम के रासायनिक कणों को अलग किया जाता था। ज्वाइंट एंड कम्प्लीट एक्शन प्लान के तहत इसकी संख्या 5,060 तक सीमित करने को कही गई थी।
ईरान ने वादा किया था कि वो अपने यूरेनियम का भंडार 98 फीसदी तक घटाकर 300 किलोग्राम तक करेगा। जनवरी 2016 में ईरान ने यूरेनियम केंद्रों की संख्या कम की और सैंकड़ों किलोग्राम लो-ग्रेड यूरेनियम रूस भेजा था। समझौते के तहत शोध और विकास के कार्यक्रम सिर्फ नाटांज में अधिकतम आठ सालों तक किया जा सकेगा। वहीं, फोर्डो में अगले 15 सालों तक इस पर रोक लगाने की बात कही गई है।
ईरान के परमाणु समझौते पर जर्मनी, चीन, अमरीका, फ्रांस, ब्रिटेन और रूस क साथ तेहरान ने भी हस्ताक्षर किया था, जिसके तहत ईरान पर लगे प्रतिबंधों को हटाने के बदले उसे परमाणु कार्यक्रमों पर नियंत्रण लगाना है। इस समझौते को ज्वाइंट एंड कम्प्लीट एक्शन प्लान का नाम दिया गया था, जो जनवरी 2016 में शुरू हुआ था।