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Study: ज्वालामुखी विस्फोट से मिला मीथेन घटाने का नया सुराग, जलवायु परिवर्तन से निपटने में कैसे मिलेगी मदद?

Mon, 06 Jul 2026 03:45 AM IST
Devesh Tripathi अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।

सार

वैज्ञानिकों ने 2022 में टोंगा के समुद्र के नीचे हुए ज्वालामुखी विस्फोट के अध्ययन में ऐसी रासायनिक प्रक्रिया के संकेत पाए हैं, जो वातावरण में मौजूद मीथेन को कम करने में सहायक हो सकती है। शोध के अनुसार नमकीन जलवाष्प, राख और सूर्य के प्रकाश की संयुक्त क्रिया से बने क्लोरीन परमाणुओं ने मीथेन के विघटन को बढ़ावा दिया।
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टोंगा ज्वालामुखी विस्फोट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स/ANI
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विस्तार
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कार्बन डाइऑक्साइड के बाद वैश्विक तापवृद्धि के लिए सबसे जिम्मेदार ग्रीनहाउस गैसों में शामिल मीथेन को हटाने का एक नया प्राकृतिक तरीका वैज्ञानिकों के सामने आया है। दक्षिण प्रशांत महासागर में 2022 में टोंगा के समुद्र के नीचे हुए भीषण ज्वालामुखीय विस्फोट के अध्ययन से संकेत मिले हैं कि कुछ विशेष हालात में वातावरण में बनने वाले रासायनिक कण मीथेन को तोड़ सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज  जलवायु परिवर्तन से निपटने की नई तकनीकों का आधार बन सकती है।
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नमक, राख और धूप ने मिलकर किया कमाल
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह प्रक्रिया पहले अटलांटिक महासागर के ऊपर देखी गई रासायनिक प्रतिक्रिया जैसी है। वहां सहारा रेगिस्तान की धूल समुद्री नमक के साथ मिलकर लोहे पर आधारित सूक्ष्म कण बनाती है। सूर्य का प्रकाश इन कणों पर पड़ने के बाद क्लोरीन परमाणु उत्पन्न करता है, जो वातावरण में मीथेन से प्रतिक्रिया कर उसे तोड़ने लगते हैं। टोंगा ज्वालामुखी ने समताप मंडल में 58 हजार ओलंपिक आकार के स्विमिंग पूलों के बराबर नमकीन जलवाष्प व बड़ी मात्रा में राख पहुंचाई थी। सूर्य के प्रकाश के प्रभाव से इस मिश्रण में क्लोरीन बना, जिसने ज्वालामुखी से निकली मीथेन के एक हिस्से को तोड़ना शुरू कर दिया।

एक सप्ताह तक लगातार टूटती रही मीथेन
शोधकर्ताओं ने फॉर्मल्डिहाइड के बादल को 10 दिनों तक ट्रैक किया। वान हर्पेन के अनुसार फॉर्मल्डिहाइड वातावरण में केवल कुछ घंटों तक ही मौजूद रहता है। इसलिए उसका लगातार दिखाई देना इस बात का संकेत है कि ज्वालामुखीय गुबार एक सप्ताह से अधिक समय तक मीथेन को लगातार तोड़ता रहा। अध्ययन के अनुसार विस्फोट से लगभग 3.3 लाख टन मीथेन निकली थी, जिसमें से शोधकर्ताओं के अनुमान के मुताबिक प्रतिदिन करीब 900 टन मीथेन नष्ट हो रही थी।
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जलवायु परिवर्तन के लिए अहम है यह खोज
कोपेनहेगन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मैथ्यू जॉनसन के अनुसार यह पूरी तरह अप्रत्याशित खोज है। अब तक जिस प्रक्रिया को अटलांटिक महासागर के ऊपर देखा गया था, उसके समताप मंडल में ज्वालामुखीय गुबार के भीतर भी सक्रिय होने के संकेत पहली बार मिले हैं। मीथेन 20 वर्ष में कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में लगभग 80 गुना अधिक गर्मी रोक सकती है। वैश्विक तापवृद्धि में लगभग एक-तिहाई योगदान इसी गैस का है। चूंकि मीथेन अपेक्षाकृत कम समय तक वातावरण में बनी रहती है, इसलिए इसके उत्सर्जन में कमी लाकर अपेक्षाकृत कम समय में वैश्विक तापवृद्धि की रफ्तार धीमी की जा सकती है।
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