सैन रैमन के मेयर पद के लिए मैदान में हैं। सैन रैमन पश्चिम कैलिफोर्निया राज्य में सैन फ्रांसिस्को से करीब 35 मील पूरब में स्थित एक खूबसूरत शहर है। सबीना जाफर फिलहाल वाइस मेयर हैं और अबकी बार मेयर के लिए चुनाव लड़ रही हैं। उनके पिता राजा शाहिद जफर बेनजीर भुट्टो सरकार में पाकिस्तान के केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं।
जूम पर बातचीत में उन्होंने मुझसे कहा, "मैं अपने पिता के कामों की प्रशंसा होते देखते पली बढ़ी हूं।" शादी के बाद वो अमेरिका आईं और वो सैन रैमन में रहने लगीं। विविध आबादी वाले इस शहर की जनसंख्या 82 हजार है और इसमें लगातार इजाफा हो रहा है।
सबीना बताती हैं कि इस शहर में 52 फीसदी लोग काले हैं और यह बीते 10-15 सालों में हुआ है। सबीना यहां की सिटी काउंसिल में जगह बनाने वाली पहली एशियाई अमेरिकी हैं।
तो, राजनीति में उनकी एंट्री कैसे हुई?
सबीना कहती हैं सात आठ साल पहले सांसद एरिक स्वालवेल के साथ काम करने के दौरान "मेरे अंदर सोया समाज सेवा का जुनून बाहर आया।" एक परिचित ने इमर्ज कैलिफोर्निया नाम के एक प्रोग्राम के बारे में बताया जिसे डेमोक्रेट महिलाओं को चुनाव में उतरने के लिए ट्रेनिंग देने के लिए डिजाइन किया गया था।
इस ट्रेनिंग में अलग अलग पृष्ठभूमि की लगभग 40 महिलाएं शामिल थीं। वो कहती हैं, "आप एक बड़े इकोसिस्टम में शामिल हो जाते हैं कि चुनाव कैसे लड़ना है, उन महिलाओं के साथ कैसे आपसी संबंध (बहनापा) बनाना है जो चुनाव में उतरने की तैयारी में जुटी हैं।"
"उस प्रोग्राम में ट्रेनिंग के बाद सवाल ये नहीं था कि कब बल्कि सवाल ये था कि कैसे।" उन्होंने इसके बाद 2018 में सिटी काउंसिल में जगह बनाई और नवंबर 2019 में एक साल के लिए डिप्टी मेयर नियुक्त की गईं।
उनका कहना है कि कॉरपोरेट और टेक्नोलॉजी में उनके अनुभव से उन्हें मदद मिली। वो कहती हैं, "कोई भी आवाज उठाने से पहले मुझे सीखना और सुनना पसंद है... जब कुछ बहुत महत्वपूर्ण हो और आपके दिल के क़रीब भी तो आपका आवाज उठाना भी उतना ही जरूरी है।"
सुरक्षा, ट्रैफिक, जलवायु परिवर्तन वो कुछ अहम स्थानीय मुद्दे हैं जिस पर वो काम करना चाहेंगी। वो कहती हैं, "हम सभी इस देश में प्रवासी हैं। चाहे आप 11 पीढ़ियां पहले आए हों या एक पीढ़ी पहले। सामूहिक रूप से यह धरती हम सब की है।"
"यह बेहद महत्वपूर्ण है, खासकर दक्षिण एशियाई समुदायों के लिए कि हमारी आवाज सुनी जाए।"
कैलिफोर्निया के अरवाइन शहर में मेयर की चुनावी दौड़ में। फराह तीन साल की उम्र में अमेरिका आईं थीं। मां लाहौर और पिता कराची से हैं।
2004 में दक्षिण कैलिफोर्निया में आने से पहले वो शिकागो और सैन फ्रांसिस्को में पली बढ़ीं। स्थानीय गैर लाभकारी संस्थाओं के साथ उनके काम करने के दौरान उन्होंने सिटी काउंसिल की सदस्यता के लिए उतरना तय किया। 2016 में वो मैदान में उतरीं और हार गईं। उससे उन्हें खूब अनुभव मिला।
फराह कहती हैं, "जब आप चुनाव लड़ रहे होते हैं, लोगों को लगता है कि यह बेहत प्रतिष्ठा की बात है लेकिन यह वाकई कठोर होता है। आपको कई तरह की बातें सुनने को मिलती हैं, जैसे हो सकता है यह शहर इतनी विविधता के लिए तैयार ही न हो। और आप पूछते हैं कि इसका क्या मतलब है?"
"फिर आप सुनते हैं कि आपके जैसे नाम के लोग शायद न चुने जाएं। तो आप सवाल करते हैं, हमारे पीछे आ रहे लड़के लड़कियों से कि वो क्या सोच रहे हैं। जब राजनीति में अपना प्रतिनिधित्व नहीं देखते हैं तो उन्हें क्या लगता है।"
फराह कहती हैं, "यही मेरे लिए प्रेरणा बन गई और मैं एक बार फिर 2018 में मैदान में उतरी और जीत गई।" फराह के मुताबिक वर्तमान मेयर यह नहीं समझते कि समुदाय आज कितना विविध और प्रगतिशील बन गया है।
"मेरा मक़सद लोगों को आपस में जोड़ना और एक साथ लाने का है।"
मिशिगन राज्य में ट्रॉय और क्लॉसन का फिर से प्रतिनिधित्व करने की रेस में। 70 के दशक में जब पद्मा अपनी मां के साथ अमेरिका गईं तो उनके पिता पहले से ही वहां रह रहे थे।
पद्मा किताबें पढ़ने की शौकीन, लेखिका और गणित पसंद करने वाली महिला हैं। इसलिए जब 1981 में उनके माता-पिता ने भारत वापस लौटने का फैसला किया तो उन्हें लगा कि उनके मौजूदा विकल्प उनसे छीन लिए गए हों। तब वो 16 बरस की थीं।
लेकिन वो 1998 में मास्टर्स करने के लिए अमेरिका वापस लौट आईं। उनके पिता और भाई दोनों पीएचडी हैं। पद्मा कहती हैं, "जब मैं मिशिगन आई तो यहां के लोग अन्य संस्कृतियों के लोगों से परिचित नहीं थे। हम अन्य हैं क्योंकि हम अप्रवासी के रूप में अलग रहते हैं।"
इंजीनियर और एक अनुभवी प्रोजेक्ट मैनेजर के रूप में उनका करियर ऑटोमोटिव, फाइनैंस और आईटी इंडस्ट्री में रहा है। पद्मा महानगर डेट्रॉयट के स्थानीय भारतीय मंदिर में स्वेच्छा से काम करते हुए विभिन्न धर्मों से जुड़ा काम किया।
पद्मा कहती हैं, "मैंने मंदिर में स्वेच्छा से काम किया क्योंकि मैं चाहती थी कि बच्चे अपनापन महसूस करें। क्योंकि आप ऐसी जगह पर हैं जहां सभी ब्राउन हैं, आप उनके बीच आराम से गुम हो जाते हैं। यहां आपको आराम और अपनापन मिलता है।"
"मैं चाहती थी कि वो हिंदू धर्म को अपने संपूर्ण रूप में समझें, न कि जैसा कि हम अपने घरों में करते हैं और उस पर बातें भी नहीं करते।" स्थानीय राजनीति के नेताओं के लिए लोगों से मिलने के दौरान उन्हें काफी अनुभव प्राप्त हुआ। 2018 में वो जीती थीं और फिर से चुनावी मैदान में हैं।