दूसरे विश्व युद्ध में फ्रांस पर नाजी कब्जे का बहादुरी से प्रतिरोध करने वाले अप्रवासी कामगारों के समूह के आखिरी जीवित सदस्य का शनिवार को निधन हो गया। आर्मीनियाई मूल के आर्सेन चकारियन के परिवार ने रविवार को बताया कि उन्होंने पेरिस के बाहरी क्षेत्र में स्थित विट्री-सुर-सैन में अपने घर के पास स्थित एक अस्पताल में 101 साल की उम्र में आखिरी सांस ली।
तुर्की में वर्ष 1916 में जन्मे आर्सेन पेशे से दर्जी थे और मशहूर आर्मीनियाई कवि व फेलो कम्युनिस्टस मिसाक मानोउचियान के नेतृत्व वाले उस छोटे से अप्रवासी प्रतिरोधक समूह में शामिल थे, जिसने वर्ष 1943 में फ्रांस के नाजी कब्जे वाले हिस्से में जर्मन सेना को नुकसान पहुंचाने वाले बहुत सारे कारनामों को अंजाम दिया था। इस समूह के 23 सदस्यों को 1944 में पकड़े जाने के बाद जर्मन सैन्य अदालत की तरफ से फांसी दे दी गई थी, जिसमें से अधिकतर यहूदी थे। इसके बाद इस समूह की गतिविधियां कम हो गई थीं।
आर्सेन चकारियन हालांकि बोरड्यूक्स जाकर गिरफ्तारी से बच गए थे और लड़ाई खत्म होने तक प्रतिरोधक गतिविधियां चलाते रहे थे। उन्हें बाद में बहादुरी के लिए बहुत सारे पदक मिले, लेकिन फ्रांसीसी नागरिकता के लिए उन्हें 1958 तक इंतजार करना पड़ा था। वर्ष 2012 में उन्हें फ्रांस के सर्वोच्च सम्मान लीजन ऑफ ऑनर से सम्मानित किया गया था।