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शी जिनपिंगः एक खेतिहर कैसे पहुंचा चीन की सत्ता के शिखर पर?

Mon, 12 Mar 2018 10:45 AM IST
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
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चीन ने अपने राष्ट्रपति के सीमित कार्यकाल वाले प्रावधान को हटा लिया है, इसके बाद मौजूदा राष्ट्रपति शी जिनपिंग ताउम्र चीन के राष्ट्रपति बने रह सकते हैं। रविवार को नेशनल्स पीपल्स कांग्रेस की सालाना बैठक में इससे संबंधित प्रस्ताव को पारित किया गया। इस प्रस्ताव को चीन की नेशनल्स पीपल्स कांग्रेस में किस तरह का समर्थन मिला, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि केवल दो वोट इस प्रस्ताव के खिलाफ थे और 2,964 मतदाताओं में केवल तीन सदस्य अनुपस्थित थे।

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चीन में 1990 के दशक से यह नियम था कि कोई व्यक्ति राष्ट्रपति के तौर पर अधिकतम दो कार्यकाल के लिए ही चुना जा सकता है। लेकिन शी जिनपिंग ने पिछले साल अक्टूबर में हुए कम्युनिस्ट पार्टी के सम्मेलन में संभावित उत्तराधिकारी पेश करने की परंपरा तोड़ दी थी। इसके बजाय उन्होंने खासी राजनीतिक ताकत अपने पास रखना ही तय किया था। सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी ने जिनपिंग की विचारधारा को संविधान में शामिल करने का फैसला किया था और संविधान में उन्हें चीन के पहले कम्युनिस्ट नेता और संस्थापक माओत्से तुंग के बराबर दर्जा दिया गया था।

जिनपिंग का सफर

इक्कीसवीं सदी में ऐसे बहुत कम नेता हैं जो गुफा में रहे हों। जिन्होंने खेतों में मेहनत की हो। फिर वो सत्ता के शिखर पर पहुंचे हों। पांच दशक पहले जब चीन में सांस्कृतिक क्रांति का तूफान आया हुआ था, उस वक्त पंद्रह बरस के लड़के शी जिनपिंग ने देहात में मुश्किल भरी जिंदगी की शुरुआत की थी। चीन के अंदरूनी इलाके में जहां चारों तरफ पीली खाइयां थीं, ऊंचे पहाड़ थे। वहां से जिनपिंग की जिंदगी की जंग शुरू हुई थी।
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जिस इलाके में जिनपिंग ने खेती-किसानी की शुरुआत की थी, वो गृह युद्ध के दौरान चीन के कम्युनिस्टों का गढ़ था। येनान के लोग अपने इलाके को चीन की लाल क्रांति की पवित्र भूमि कहते थे। चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी ने राष्ट्रपति के कार्यकाल पर लगी सीमा को हटाने का प्रस्ताव रखा है। ये ऐसा कदम है जो मौजूदा नेता शी जिनपिंग को सत्ता में बनाए रखेगा। चीन की राजनीति में इसे एक निर्णायक घड़ी के तौर पर देखा जा रहा है। वो आज एक ऐसे देश की अगुवाई कर रहे हैं, जो बड़ी तेजी से दुनिया की सुपरपावर के तौर पर उभर रहा है।

लेकिन चीन ऐसा देश है जो इस बात पर कड़ी निगाह रखता है कि उसके नेता के बारे में क्या कहा जाता है। शी जिनपिंग की अपनी कहानी को काफी हद तक काट-छांटकर पेश किया जाता है। दिलचस्प बात ये है कि जहां चीन के तमाम अंदरूनी इलाकों का तेजी से शहरीकरण हो रहा है, वहीं राष्ट्रपति शी के गांव को जस का तस रखा गया है। कम्युनिस्ट पार्टी के भक्तों के लिए वो एक तीर्थस्थल है। 

जमीनी जुड़ाव

1968 में चेयरमैन माओ ने फरमान जारी किया था कि लाखों युवा लोग शहर छोड़कर गांवों में जाएं। वहां वो जिंदगी की मुश्किलात का सामना करके, आगे बढ़ने के सबक किसानों और मजदूरों से सीखें। शी जिनपिंग कहते हैं कि उस तजुर्बे से उन्होंने भी बहुत कुछ सीखा। शी का कहना है कि आज वो जो कुछ भी हैं, वो उसी दौर की वजह से हैं। उनका किरदार उसी गुफा वाले दौर ने गढ़ा। जिनपिंग अक्सर कहा करते हैं, "मैं पीली मिट्टी का बेटा हूं। मैंने अपना दिल लियांगजिआहे में छोड़ दिया था। उसी जगह ने मुझे बनाया।"

जिनपिंग कहते हैं, "जब मैं लियांगजिआहे पहुंचा तो पंद्रह बरस का लड़का था। मैं फिक्रमंद था। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था।" लेकिन 22 बरस का होते-होते मेरी सारी शंकाएं दूर हो गई थीं। मैं आत्मविश्वास से लबरेज था। मेरी जिंदगी का मकसद पूरी तरह साफ हो चुका था।" उस दौर में हर शख्स चेयरमैन माओ की मशहूर छोटी लाल किताब पढ़ा करता था। आज चेयरमैन शी के खयालात बड़ी-बड़ी लाल होर्डिंग पर लिखे दिखाई देते हैं। उनके सम्मान में एक म्यूजियम भी बनाया गया। इस म्यूजियम में इस बात का जिक्र मिलता है कि उन्होंने अपने साथी किसानों-मजदूरों के लिए क्या-क्या अच्छे काम किए।

लेकिन इन किस्सों को इस तरह काट-छांटकर पेश किया गया है कि उसमें शी जिनपिंग की जिंदगी की असली कहानी का पता लगाना बेहद मुश्किल है। राष्ट्रपति के तौर पर अपने पहले पांच साल के कार्यकाल में शी जिनपिंग ने अपना एक महान इंसान का किरदार गढ़ा है। वो खुद को एक ऐसे शख्स के तौर पर पेश करते हैं, जो जननेता है। वो अक्सर गली-कूचों की सैर पर जाते हैं। गरीबों के घर जाया करते हैं। वो जनता की जुबान में बात करते हैं। वो अक्सर छात्रों को बताते हैं कि जिंदगी एक बटन वाली कमीज है, जिसके शुरू के बटन सही तरीके से लगाने चाहिए, वरना सारे बटन गलत बंद होते हैं। वो कई बार लंच के लिए कतार में खड़े हुए हैं। वो अपने खाने का बिल खुद भरते हैं।

तजुर्बा

लेकिन एक मिथक के तौर पर शी जिनपिंग की कहानी का केंद्र है उनका गुफा में बिताया हुआ शुरुआती जीवन। जहां वो सियासत से अलग कर दिए गए थे। जिनपिंग कहते हैं, "जिनको सत्ता का तजुर्बा कम है, वो इसे नया और राजदाराना तजुर्बा समझते हैं। लेकिन मैं इन पर्दों के पार, बड़ी गहराई से सियासत को देखता हूं।" "मैं फूलों के हार और तालियों की गड़गड़ाहट से परे हटकर देखता हूं। मैं नजरबंदी वाले घर देखता हूं। मैं इंसानी रिश्तों की कमजोरी देखता हूं।"

"मैं राजनीति को गहराई से समझता हूं।" बचपन से जवानी के बीच शी जिनपिंग दोनों तरह की जिंदगी का तजुर्बा कर चुके थे। उनके पिता भी कम्युनिस्ट क्रांति के हीरो थे। ऐसे में शी ने एक राजकुमार वाली जिंदगी का तजुर्बा भी किया था। 2009 के एक खुफिया अमरीकी केबल के मुताबिक शी के एक करीबी दोस्त ने बताया था कि उनके शुरुआती दस सालों ने उनके किरदार की बुनियाद रखी थी। इसके बाद कम्युनिस्ट क्रांति के दौरान जब वो किसानों के बीच रहे, तो उस तजुर्बे ने भी उनकी आगे की जिंदगी पर गहरा असर डाला था।

जान का खतरा

लेकिन साठ के दशक में चेयरमैन माओ ने अपनी ही पार्टी के नेताओं पर जो ज़ुल्म ढाए, उसका सितम शी जिनपिंग को भी उठाना पड़ा था। पहले तो शी के पिता को पार्टी से बाहर कर दिया गया। फिर उन्हें जेल भेज दिया गया। शी के परिवार को बहुत शर्मिंदगी उठानी पड़ी थी। उनकी एक बहन की मौत हो गई। शायद उन्होंने खुदकुशी कर ली थी। 13 साल की उम्र में ही शी जिनपिंग की पढ़ाई बंद हो गई थी। क्योंकि बीजिंग के सारे स्कूल बंद कर दिए गए थे।

ऐसा इसलिए ताकि छात्र अपने अध्यापकों की निंदा कर सकें। उन्हें पीट सकें। या फिर उन्हें जान से मार सकें। परिवार और दोस्तों के बगैर, शी जिनपिंग काफी दिनों तक माओ के बदनाम रेड गार्ड्स से बचते-छुपते फिरे थे। एक बार उन्होंने एक रिपोर्टर से एक एनकाउंटर का भी जिक्र किया था। शी जिनपिंग ने बताया था, "मैं केवल 14 बरस का था। 

रेड गार्ड्स ने मुझसे पूछा कि तुम अपने जुर्म को कितना गंभीर मानते हो?" "मैंने कहा कि तुम खुद अंदाजा लगा लो, क्या ये मुझे मारने के लिए काफी है? रेड गार्ड्स ने कहा कि हम तुम्हें सैकड़ों बार मार सकते हैं।" "मेरे हिसाब से एक बार मरने या बार-बार मारे जाने में कोई फर्क नहीं।" शी की पीढ़ी के बहुत से चीनी लोग ये मानते हैं कि उस दौर में जब स्कूल बंद हो गए थे, जब वो जान बचाकर छुपते फिर रहे थे। तब की मुश्किलों ने उनके जहन पर गहरा असर डाला था। उन्हें मजबूत बनाया था।

चीन के गांवों में जिंदगी कठिन थी

पढ़ाई का शौक

खुद शी जिनपिंग कहते हैं कि मुझे अपनी गलतियां बताए जाने में लुत्फ आने लगा था। हालांकि वो ये भी कहते हैं कि हर किसी की बात को वो गंभीरता से नहीं लेते थे। साठ के दशक में चीन के गांवों की जिंदगी बहुत कठिन थी। बिजली नहीं हुआ करती थी। गांवों तक जाने का रास्ता भी पक्का नहीं होता था। खेती के लिए मशीनें भी नहीं थीं। उस दौर में शी ने खाद ढोने, बांध बनाने और सड़कों की मरम्मत का काम सीखा था। वो जिस गुफा में रहते थे, वहां कीड़े-मकोड़ों का डेरा होता था। उस में वो ईंटों वाले बिस्तर पर तीन और लोगों के साथ सोया करते थे।

उस वक्त खाने के लिए उन्हें दलिया, बन और कुछ सब्जियां मिला करते थे। उनके एक किसान साथी लू होउशेंग ने बताया था कि भूख लगने पर ये कोई नहीं देखता था कि खाने में मिल क्या रहा है। रात में शी जिनपिंग अपनी गुफा में ढिबरी की रौशनी में पढ़ा करते थे। उन्हें पढ़ने का शौक था वो सिगरेट भी बहुत पीते थे। वो अक्सर माओ के भाषण और अखबार पढ़ा करते थे। क्योंकि पढ़ने के लिए इसके सिवा कुछ और था ही नहीं।

शी की महत्वकांक्षा

शी के दोस्त लू ने बताया कि शी बहुत संजीदा रहा करते थे। हंसी-मजाक उन्हें नहीं पसंद था। वो न तो दोस्तों के साथ खेला कूदा करते थे। न ही उनकी दिलचस्पी गर्लफ्रैंड बनाने में थी। 18 की उम्र में वो अपना सियासी सफर शुरू करने के लिए तैयार थे। वो कम्यूनिस्ट यूथ लीग में शामिल हो गए। 21 साल की उम्र में वो बार-बार ठुकराए जाने के बावजूद कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बन गए। शुरुआत से ही वो जमीनी हकीकत से वाबस्ता थे। उनकी निगाह हमेशा लक्ष्य पर होती थी। जब उनके दोस्त खेलने-कूदने में मसरूफ होते थे, तब वो काम में लगे रहते थे। वो बेहद महत्वाकांक्षी थे।

कम्युनिस्ट क्रांति के बाद वो कट्टर कम्युनिस्ट बन गए थे। जब शी 25 साल के थे, तो उनके पिता की पार्टी में दोबारा वापसी हो गई थी। उन्हें गुआंगडॉन्ग सूबे में काम करने के लिए भेजा गया था। चीन का ये बड़ा सूबा हांगकांग के बेहद करीब था। ये चीन की आर्थिक तरक्की का पावरहाउस बन गया। पिता की मदद से शी जिनपिंग ने अपना करियर तेजी से आगे बढ़ाया। धीरे-धीरे पार्टी में उनके अपने दोस्तों की भी बड़ी जमात हो गई थी। सत्तर के दशक में वो चीन की सेना में शामिल हो गए थे। उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी के टॉप के नेताओ में पहुंचने का पक्का इरादा कर लिया था। जिंदगी का हर कदम वो इसी मकसद से उठा रहे थे। सेना में वो पहले ही दिन से तरक्की का लक्ष्य लेकर चले थे।

जिनपिंग का व्यक्तित्व

शी अपने आप में व्यस्त रहने वाले शख्स थे। वो बहुत अंतर्मुखी थे। शायद यही वजह थी कि एक राजनयिक की बेटी से उनकी पहली शादी नाकाम रही थी। हां, इसका फायदा उन्हें सियासी करियर आगे बढ़ाने में जरूर मिला था। जब वो सत्ता के शिखर पर पहुंचे तो सब को पता चल गया। मगर इससे पहले शी जिनपिंग ने तरक्की की सीढ़ियां बेहद खामोशी से, दबे पांव चढ़ीं। शी ने उस वक्त सुर्खियां जरूर बटोरी थीं, जब उन्होंने अपनी मौजूदा पत्नी पेंग लियुआन से शादी की। पेंग एक मशहूर गायिका थीं।

बरसों तक शी की पहचान उनके पति के तौर पर रही थी। शी जिनपिंग को शुरुआती दौर में कवर करने वाले एक सरकारी पत्रकार ने बताया था कि वो बेहद बोर इंसान थे। उन्हें लोग आसानी से भुला देते थे। वो अपने दामन पर दाग लगने से बचने के लिए हमेशा बेहद रिजर्व और सतर्क रहा करते थे। शी ने देखा था कि उनके पिता को माओ ने किस तरह सताया था। इसीलिए वो बेहद खामोश रहा करते थे। 40-50 की उम्र में एक सीनियर नेता बनने के बावजूद वो सिर्फ काम से काम रखा करते थे। एक करीबी शख्स ने कहा कि शी जिनपिंग एक ऐसी सुई हैं, जो रेशम के कवर में बंद हैं।

अंदाजा

अमरीका में शी जिनपिंग 1985 में कुछ दिन एलेनोर ड्वोरचाक के घर में कुछ दिन रहे थे। वो उनके बेटे के साथ उसके कमरे में सोते थे, जहां दीवार पर 'स्टारट्रेक' फिल्म के पोस्टर चिपके हुए थे। एलेनोर का घर अमरीका के आयोवा सूबे के मस्कैटिन शहर में है। जब 2012 में जिनपिंग आयोवा के दौरे पर आए थे, तो एलेनोर ने बताया था कि किसी को ये अंदा़जा भी नहीं हो सकता कि उनके घर आया शख्स एक दिन किसी देश का राष्ट्रपति बन जाएगा। 2012 में शी जिनपिंग चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेता बने। वो कम्युनिस्ट पार्टी के तमाम खेमों के आम सहमति से चुने गए नेता थे। लेकिन किसी को भी ये अंदाजा नहीं था कि अगले पांच सालों में वो कैसे नेता बनकर उभरने वाले हैं।

सबक सिखाया

11 जून 2015 को सफेद बालों वाला एक शख्स एक अदालत के कठघरे में खड़ा दिखा था। वो उन सुरक्षाकर्मियों से घिरा था, जो कभी उसके हुक्म के फरमाबरदार हुआ करते थे। बरसों तक ये शख्स चीन में डर का दूसरा नाम था। चीन की पुलिस पर उसका नियंत्रण था। वो अर्धसैनिक बलों का, जेल का और खुफिया ऑपरेशन का अगुवा था। लेकिन डेढ़ साल में ही किस्मत ने पलटी मारी और वो कानून के उसी कोर्ट में मुजरिम के तौर पर खड़ा था, जिस सिस्टम को कभी वो चलाता था।

अदालत में उस शख्स ने अपना जुर्म कबूला और कहा कि वो सजा के खिलाफ अपील नहीं करेगा। उस शख्स का नाम था चाऊ योंगकांग। चीन में कम्युनिस्ट शासन के इतिहास में कानून का सामना करने वाले वो सबसे सीनियर नेता थे। चाऊ के अलावा बो शीलाई नाम के एक नेता को भी इसी तरह से जिनपिंग ने कानून का सबक सिखाया। आरोप था कि बो, चाऊ और दो फौजी नेता मिलकर पार्टी की एकता को नुक़सान पहुंचाने की साजिश रच रहे थे। 
कार में फैसले

सरकार की शाहखर्ची रोकने के लिए शी जिनपिंग ने बड़े-बड़े भोज आयोजित करने पर रोक लगा दी। वो कारों के काफिले में चलने के बजाय कई बार वैन से चलते थे। जब शी जिनपिंग सत्ता में आए तो उन्होंने जनता से एक साफ-सुथरी सरकार का वादा किया। शी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया था। वो हर छोटे-बड़े भ्रष्ट नेता को सबक सिखाना चाहते थे। उन्होंने इस वादे पर सख्ती से अमल किया था। शी जिनपिंग ने साफ कर दिया कि जो पैसा कमाना चाहता है, वो कम्युनिस्ट पार्टी में न आए।

लेकिन पार्टी के करीब 9 करोड़ कार्यकर्ताओं में से ज्यादातर का मकसद तो पैसा बनाना ही है। कम्युनिस्ट पार्टी, बरसों से घूसखोरी, भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद से ही चलती रही है। इस सिस्टम को साफ करने के लिए कुछ बड़ी मछलियों पर कार्रवाई भर से काम नहीं चलने वाला था। शी जिनपिंग ने कई फरमान जारी किए। पार्टी के हर नेता के दफ्तर के साइज से लेकर नेताओं के लंच या डिनर में इस्तेमाल होने वाले बर्तनों की संख्या को लेकर भी शी ने नियम बना दिए। वो अक्सर गांव के लोगों से मिलने जाते रहे हैं। वो खुद को कम्युनिस्ट पार्टी के रईस और भ्रष्ट नेताओं से अलग रखकर पेश करते हैं। 

भ्रष्टाचार का तोड़ा नेटवर्क

भ्रष्टाचार पर वार

पर तमाम कोशिशों के बावजूद शी, खुद को पार्टी के रईस नेताओं की जमात से अलग नहीं कर सकते। शी के राष्ट्रपति बनने से पहले ही उनके कई रिश्तेदार करोड़पति हो चुके थे। हालांकि इस में शी का कोई योगदान रहा हो, इसके सबूत नहीं मिलते। शी को पता है कि चीन का समाज कितना भ्रष्ट हो चुका है। रईसों के लालच ने पूरे सिस्टम को जकड़ रखा है। जैसे चाऊ योंगकांग को ही लीजिए। उनक परिवार किसानी करता था। आमदनी बढ़ाने के लिए वो मछलियां पकड़ा करते थे।

उनके परिवार का सबसे बड़ा बेटा इंजीनियर बना तो परिवार की शोहरत बढ़ गई। फिर तो तरक्की और भ्रष्टाचार का ऐसा कॉकटेल बना कि चाऊ बेहद ताकतवर शख्स बन गए। इस नेटवर्क को शी जिनपिंग ने बहुत मुश्किलों से तोड़ा है। चाऊ की कोर्ट में पेशी से पहले उनके एक कारोबारी साझीदार को मौत की सजा दी गई थी। हालांकि चाऊ के गांव के लोग मानते हैं कि उसे गलत सजा दी गई। उसने पार्टी और देश के लिए बहुत काम किया था। मगर शी जिनपिंग ने उस पर झूठे आरोप लगाए। चाऊ के बारे में ये भी कहा जाता है कि वो कम्युनिस्ट पार्टी में शी जिनपिंग के विरोधी खेमे से ताल्लुक रखते थे।

अभियान

पिछले पांच सालों में बहुत से बड़े नेता और कारोबारी अचानक लापता हो गए। कहा जाता है कि इनमें से ज्यादातर चीन में नजरबंद हैं। संदेश साफ है कि शी जिनपिंग से उलझोगे तो मरोगे। भ्रष्टाचार के आरोप में शी जिनपिंग ने बहुत से नेताओं को पार्टी से बाहर कर दिया। शी के विरोधी और बागी नेता गुओ वेंगुई कहते हैं कि शी के बेहद करीबी वांग किशान खुद बेहद भ्रष्ट हैं। वांग की भ्रष्टाचार के खिलाफ एक्शन लेने वाली संस्था के प्रमुख भी हैं। गुओ वेंगुई, न्यूयॉर्क में रहते हैं। वो यू-ट्यूब पर अक्सर शी के करीबी नेताओं पर हमला बोलते रहते हैं।

मगर उन्होंने अब तक शी जिनपिंग पर सीधा कोई आरोप नहीं लगाया है। साफ-सफाई के अभियान के बावजूद कम्युनिस्ट पार्टी में भ्रष्टाचार कम नहीं हुआ है। जो भी कार्रवाई हुई है, वो भी साफ़-सुथरी नहीं दिखती। लेकिन सिस्टम को साफ करने के शी जिनपिंग के इरादों में जरा भी कमी नहीं आई है। इंटरनेट पर नियंत्रण बराक ओबामा और शी जिनपिंग की एक तस्वीर ने चीन में काफी बवाल मचाया था। जिनपिंग और ओबामा की चहलकदमी की तुलना, कार्टून कैरेक्टर विनी द पू से की गई थी। 

तब से इंटरनेट पर चीन से बेहद सख्ती से सेंसर किया हुआ है। चीन ने इंटरनेट पर हमेशा कड़ी नजर रखी है। इसका विरोध भी होता है। और मजाक भी उड़ाया जाता है। चीन में 75 करोड़ लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। ये तादाद यूरोप और अमरीका में मिलकर इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों से ज्यादा है। शी जिनपिंग चीन को साइबर सुपरपावर बनाना चाहते हैं। शी जिनपिंग एक तरफ पार्टी पर नियंत्रण की लड़ाई लड़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ वो इंटरनेट पर भी काबू पाना चाहते हैं।

कानून और तकनीक की मदद से उन्होंने इंटरनेट पर काफ़ी पाबंदी लागू कर दी है। साइबर सुरक्षा को शी जिनपिंग देश की सुरक्षा का मुद्दा मानते हैं। इंटरनेट की सुविधा देने वाले और सोशल मीडिया साइट पर सख्ती से सेंसर लागू किया जाता है। कोई भी फर्जी खाता बनाकर चीन में सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं कर सकता। वैसे तो चीन में संवेदनशील मुद्दों पर हमेशा से ही सख्ती बरती जाती रही है। मगर फैसले लेने की प्रक्रिया काफी हद तक विकेंद्रीकृत थी।

निगरानी

लेकिन शी जिनपिंग चाहते हैं कि चीन एक अमीर मुल्क हो। देश एकजुट और मजबूत हो। देश में सिर्फ एक पार्टी का राज हो। लोग अनुशासन में रहें। वो लोगों को पूरी तरह से वफादार बनाना चाहते हैं। यूनिवर्सिटी में पार्टी की पहुंच बढ़ाई जा रही है। किताबों में से पश्चिमी सभ्यता के निशान मिटाए जा रहे हैं। निजी कंपनियों में भी कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता की शाखाएं खोली जा रही हैं। साइबर दुनिया पर चीन की सरकार की सख्ती बहुत जयादा है। विदेश जाने वाले चीन के नागरिकों पर भी साइबर सुरक्षा एजेंसियों की निगाह रहती है।

शी जिनपिंग उस वक्त चीन के राष्ट्रपति बने थे, जब अरब देशों में इंकलाब आया हुआ था। वो किसी भी कीमत पर चीन में ऐसा नहीं होने देना चाहते। इंटरनेट पर सख्त निगरानी के लिए शी जिनपिंग की सरकार बड़े पैमाने पर निवेश कर रही है। नई-नई तकनीक से आंतरिक सुरक्षा की दीवार मजबूत बनाई जा रही है।

ताकत

शी जिनपिंग की ताकत का एहसास सिर्फ चीन के लोगों को नहीं है। साल 2014 में ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री टोनी एबट ने जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल को अपनी चीन नीति के बारे में बताया था। एबट ने कहा था कि ऑस्ट्रेलिया का चीन से रिश्ता डर और लालच का है। पूरी दुनिया को ये बताने की कोशिश की जा रही है कि चीन कितना महान है। जिनपिंग चीनी मूल के लोगों से अपील करते रहते हैं कि वो अपने-अपने देशों में चीन के महान इतिहास और इसकी ताकत के बारे में लोगों को बताएं। चीन के पैसे की ताक़त का लोहा दुनिया मानती है।

2015 में जब वो अमरीका के दौरे पर गए तो एपल, माइक्रोसॉफ्ट, सिस्को, एमेजन जैसी कंपनी के बॉस लाइन लगाकर शी से मिलने के लिए इंतजार करते दिखे। वो फेसबुक जिस पर चीन में पाबंदी है, उसके प्रमुख जुकरबर्ग भी जिनपिंग से मिले थे। गूगल पर भी चीन में पाबंदी है। उनके अधिकारियों को तो शी से मिलने का न्यौता ही नहीं दिया गया। शी जिनपिंग इंटरनेट और साइबर स्पेस पर कड़ा नियंत्रण रखना चाहते हैं। इसलिए उनके लिए ऐसी बड़ी साइबर कंपनियों पर काबू पाना जरूरी हो जाता है। जैसे फेसबुक के चैटिंग ऐप व्हाट्सऐप पर कई बार चीन में पाबंदी लग चुकी है। इसी तरह एपल ने भी चीन में अपने ऐप स्टोर में चीन की नीतियों के हिसाब से कई बदलाव किए हैं।

जमीर की आवाज

चीन में बहुत से ऐसे लोग हैं, जो शी जिनपिंग के करीबी रहे हैं। उनकी नीतियों पर अमल करते रहे हैं। फिर भी उन्हें सरकारी चाबुक का सामना करना पड़ा है। ऐसे ही एक शख्स हैं शू झियोंग। वो पहले रिसर्च स्कॉलर थे। बाद में शू झियोंग ने चीन की आर्थिक तरक़्क़ी में पिछड़ गए लोगों की नुमाइंदगी शुरू कर दी। वो लोग जिन्हें देश की तरक्की से कोई फायदा नहीं हुआ। जैसे मजदूर, बेघर लोग वगैरह। शू झियोंग ने बोलने की आजादी की मांग करते हुए नागरिकों का एक मंच खड़ा किया। उन्हें देशहित के खिलाफ काम करने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया।

अदालत में शू ने कहा कि देश का संविधान उन्हें बोलने की आजादी देता है। आजादी, इंसाफ और मोहब्बत हमारे बुनियादी मूल्य हैं। जज ने उन्हें बोलने नहीं दिया। कहा कि शू की बातें बेमतलब की हैं। ये उन शू झियोंग का हाल है, जो सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी के शी के मिशन से जुड़े रहे थे। उन्हें जेल जाना पड़ा था। शी जिनपिंग के राज में कम्युनिस्ट क्रांति या इसके नेताओं पर सवाल उठाना जुर्म है। भले ही वो और उनका परिवार माओ के जुल्म के शिकार रहे हों। भले ही माओ की नीतियों की वजह से तीन करोड़ चीनी नागरिक भूख से मर गए हों। मगर इन कड़वी सच्चाईयों को उजागर करने पर जेल जाना तय है।
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चीन ने दिया मौका

कैसी सियासत

शी जिनपिंग माओ की परंपरा को ही आगे बढ़ाना चाहते हैं। वो खुद को माओ का वारिस समझते हैं। उन्होंने देश के लोगों से वादा किया है कि वो चीन को अमीर और ताकतवर बनाएंगे। वो जानते हैं कि जनता की सियासत में दिलचस्पी कितनी खतरनाक हो सकती है। इसलिए वो नागरिकों को अभिव्यक्ति की ज्यादा आजादी देने के हक में नहीं हैं। शी जिनपिंग ने सोवियत संघ के विघटन से भी जिंदगी का सबक सीखा है। वो मानते हैं कि सोवियत संघ का पतन इसलिए हुआ क्योंकि वो अपना मकसद ही भूल गया था।

वो अपने लक्ष्य से भटक गया था। उन्होंने एक भाषण में कहा भी था कि सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से ज्यादा सदस्य थे। फिर भी किसी ने विघटन को रोकने की कोशिश नहीं की। वो खुलेपन के सख्त खिलाफ हैं। शी जिनपिंग अक्सर ग्यारहवीं सदी के चीनी विचारक सू शी का जिक्र करते हैं। जो अंदरूनी खतरे से आगाह किया करते थे। जो ये कहा करते थे कि हालात पर सख्त निगरानी की जरूरत है। वरना भीतरी खतरा तबाह कर देगा। शी जिनपिंग अक्सर अपने नागरिकों को सीख देते हैं कि वो चीन के अपने जीवन मूल्य को अपनाएं। पश्चिमी सोच ने प्रभावित न हों।

क्योंकि अगर हम दूसरों की नकल करेंगे, तो अपनी पहचान खो बैठेंगे। शी जिनपिंग के राज में मुसलमान, ईसाई, मजदूर कार्यकर्ता, ब्लॉगर, पत्रकार, महिलावादी और वकील, सब को जेल भेजा गया है। वो आंदोलन करने वालों को सख्त नापसंद करते हैं। वो खुलकर सरकार और पार्टी के खिलाफ बोलने वालों को कतई बर्दाश्त नहीं करते।

कैसा देश हो

कई बार तो ऐसे लोगों को सजा सुनाने से पहले टीवी पर सीधा प्रसारण करके दिखाया गया। उनके विचारों को नीचा दिखाने के लिए मुकदमों का सीधा प्रसारण हुआ। जहां ऐसे लोगों ने अपनी गलतियां पूरे देश के सामने मानीं। पार्टी के आगे अपना सिर झुकाया। ऐसे लोगों ने कई बार टीवी पर ये माना कि वो दुश्मन की चाल में फंस गए थे। मोहरा बन गए थे। ऐसे लोगों को बार-बार देश के लिए खतरा बताया गया। बागी नेता शू झियोंग की गिरफ्तारी से पहले पार्टी के नेताओं के बीच एक दस्तावेज बांटा गया था।

इसमें बताया गया था कि प्रेस की आजादी, आम लोगों के अधिकारों और स्वतंत्र अदालतों जैसे मुद्दों पर कुछ नहीं बोलना है। शी जिनपिंग अक्सर अपने देश के लोगों को सलाह देते हैं कि वो देश से प्यार करें। अपनी मातृभूमि से मोहब्बत करें। चीन के कम्युनिस्ट इंकलाब का सम्मान करें। चीन की संस्कृति और जीवन मूल्यों को जानें-समझे। वो लोगों को दो बातें हमेशा याद रखने को कहते हैं पहला तो चीन के गौरव की दोबारा वापसी और दूसरा चीन के सपनों की। चीन में ये बातें आपको रेलवे स्टेशनों से लेकर सड़कों पर लगे बैनर-पोस्टर पर लिखी देखने को मिल सकती हैं। इन्हें टीवी सिरीज, ऑनलाइन एनिमेशन और मोबाइल ऐप के जरिए भी लोगों तक पहुंचाया जाता है। ये नारे सब जगह हैं।

खतरा

सदियों तक चीन के बादशाहों ने देश की ताकत को दो तरीके से पेश करने की कोशिश की है। एक तरफ तो चीन की सामरिक ताकत। दूसरी तरफ उसकी सॉफ्ट पावर। वो दोनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करते आए थे। चीन के कम्युनिस्ट इतिहास का जश्न मनाते वक्त शी जिनपिंग भी यही करते हैं।
एक तरफ तो वो चेयरमैन माओ की खूनी कम्युनिस्ट क्रांति के सामने सिर झुकाते हैं। वहीं दूसरी तरफ वो देंग शियाओ पिंग की आर्थिक क्रांति के आगे भी शीश नवाते हैं। यानी वो मार्क्सवाद का सम्मान करते हैं। साथ ही आर्थिक खुलेपन का भी जश्न मनाते हैं। उनके चीनी ख्वाब का मतलब है-एक मजबूत चीन। लेकिन इस ख्वाब से इतर शू झियोंग की आजादी का ख्वाब, देश के लिए खतरा माना जाता है। शू को चार साल की कैद के बाद रिहा कर दिया गया था। उनका तब से कोई अता-पता नहीं है। 

चुनौतियां

चीन के बारे में सिंगापुर के महान नेता ली कुआन यू ने कहा था कि, 'वो दुनिया के इतिहास के सबसे बड़े खिलाड़ी हैं'। 2012 में सत्ता में आने के साथ ही शी ने चीन को सबसे बड़ा खिलाड़ी बनाने की ठान ली थी। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की सौवीं सालगिरह यानी 2021 तक चीन आर्थिक तरक्की के मामले में औसत देश हो जाएगा। वहीं चीन में कम्युनिस्टों के सत्ता में आने के सौ साल पूरे होने पर यानी 2049 तक चीन पूरी तरह से विकसित, अमीर और ताकतवर देश बन जाएगा। जल्द ही चीन की अर्थव्यवस्था अमरीका से 40 फीसद ज्यादा बड़ी हो जाएगी।

2049 तक खरीदने की ताकत के मामले में चीन की अर्थव्यवस्था, अमरीका से तीन गुना बड़ी होगी। चीन और शी जिनपिंग के लिए पिछले चार दशक एकदम अनूठे रहे हैं। जब 1972 में अमरीका के राष्ट्रपति चेयरमैन माओ से मिले थे, तो उस वक्त शी जिनपिंग एक गुफा में रहा करते थे। वो ढिबरी की रौशनी में पढ़ाई किया करते थे। उस वक्त रिचर्ड निक्सन ने कहा था कि, 'भविष्य को देखते हुए हम चीन को बाकी देशों से अलग करके नहीं रख सकते।
वरना वो अलग थलग होकर अपने ख्वाब अपने आप में बुनता रहेगा। दूसरों से नफरत को दिल में बैठाता रहेगा। अपने पड़ोसियों को धमकाता रहेगा'।

मौका

जब पश्चिम ने अपने दरवाजे चीन के लिए खोले तो शी की पीढ़ी के कई लोगों ने अपना देश छोड़ने का फैसला किया था। लेकिन शी को इस बात का एहसास था कि अपना देश छोड़कर जाने पर वो कुछ खास नहीं कर पाएंगे। वो विदेशियों से बड़े आत्मविश्वास से मिलते हैं। वो कहते हैं कि, 'चीन क्रांति का निर्यात नहीं करता। भुखमरी और गरीबी का निर्यात नहीं करता। चीन आप को कोई सिरदर्द नहीं देता। आपको और क्या चाहिए।' शी को विरासत में जो चीन मिला, वो ताकतवर था। वो दुनिया के मंच पर अपनी ताकत का मुजाहिरा करना चाहता था। चीन को शी जिनपिंग ने वो मौका दिया है।

विवादित दक्षिणी चीन सागर में बनावटी द्वीप बनाने से लेकर बेल्ट ऐंड रोड प्रोजेक्ट तक उन्होंने अपने देश को ये मौके दिए हैं। वो उस कहावत पर अमल कर रहे हैं कि जब तक आप के पास अच्छा मौका न हो, आप को अपनी ताकत छुपाकर रखनी चाहिए। चीन ने ट्रंप के पेरिस जलवायु समझौते और व्यापार समझौतों से हटने का भी फायदा उठाया है। शी ने इस समझौतों को लेकर खुद को दुनिया के बड़े नेता के तौर पर पेश किया है। हाल ही में एक टीवी डॉक्यूमेंट्री में उनकी विदेश नीति को करिश्मा बताकर पेश किया गया था। एक और टीवी सिरीज में उनके भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान का बखान किया गया है। 

लेकिन शी के सामने और भी बड़ी चुनौतियां हैं। चमक-दमक के पर्दे के पीछे बड़ी आर्थिक दिक्कतें हैं। चीन की विकास की रफ्तार धीमी हो रही है। सरकार पर कर्ज बढ़ रहा है। बहुत से अर्थशास्त्री चेतावनी दे रहे हैं कि चीन के लिए सुधारों का वक्त तेजी से खत्म हो रहा है। वैचारिक एकता की लोहे की दीवार के पीछे चीन को लेकर तमाम अलग-अलग खयालत भी आवाज उठा रहे हैं। अच्छी बात ये है कि शी से पहले भी चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने बहुत सी चुनौतियों का सामना किया है। उन पर जीत हासिल की है।

माओ के दौर में अकाल से लेकर सांस्कृतिक क्रांति तक की चुनौतियां झेलीं। तो, 1989 में लोकतांत्रिक आंदोलन को झेला। शी जिनपिंग के राज में जोर-जुल्म पर आर्थिक तरक्की का मुलम्मा चढ़ाया गया है। उन्होंने बहुत से नेताओं को जेल भेजा। भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई की। विरोधियों के सुर दबाए। चेयरमैन माओ के बाद ऐसा पहली बार देखा जा रहा है कि चीन का भविष्य किसी एक शख्स पर इस तरह निर्भर है। 
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