कैसी सियासत
शी जिनपिंग माओ की परंपरा को ही आगे बढ़ाना चाहते हैं। वो खुद को माओ का वारिस समझते हैं। उन्होंने देश के लोगों से वादा किया है कि वो चीन को अमीर और ताकतवर बनाएंगे। वो जानते हैं कि जनता की सियासत में दिलचस्पी कितनी खतरनाक हो सकती है। इसलिए वो नागरिकों को अभिव्यक्ति की ज्यादा आजादी देने के हक में नहीं हैं। शी जिनपिंग ने सोवियत संघ के विघटन से भी जिंदगी का सबक सीखा है। वो मानते हैं कि सोवियत संघ का पतन इसलिए हुआ क्योंकि वो अपना मकसद ही भूल गया था।
वो अपने लक्ष्य से भटक गया था। उन्होंने एक भाषण में कहा भी था कि सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से ज्यादा सदस्य थे। फिर भी किसी ने विघटन को रोकने की कोशिश नहीं की। वो खुलेपन के सख्त खिलाफ हैं। शी जिनपिंग अक्सर ग्यारहवीं सदी के चीनी विचारक सू शी का जिक्र करते हैं। जो अंदरूनी खतरे से आगाह किया करते थे। जो ये कहा करते थे कि हालात पर सख्त निगरानी की जरूरत है। वरना भीतरी खतरा तबाह कर देगा। शी जिनपिंग अक्सर अपने नागरिकों को सीख देते हैं कि वो चीन के अपने जीवन मूल्य को अपनाएं। पश्चिमी सोच ने प्रभावित न हों।
क्योंकि अगर हम दूसरों की नकल करेंगे, तो अपनी पहचान खो बैठेंगे। शी जिनपिंग के राज में मुसलमान, ईसाई, मजदूर कार्यकर्ता, ब्लॉगर, पत्रकार, महिलावादी और वकील, सब को जेल भेजा गया है। वो आंदोलन करने वालों को सख्त नापसंद करते हैं। वो खुलकर सरकार और पार्टी के खिलाफ बोलने वालों को कतई बर्दाश्त नहीं करते।
कैसा देश हो
कई बार तो ऐसे लोगों को सजा सुनाने से पहले टीवी पर सीधा प्रसारण करके दिखाया गया। उनके विचारों को नीचा दिखाने के लिए मुकदमों का सीधा प्रसारण हुआ। जहां ऐसे लोगों ने अपनी गलतियां पूरे देश के सामने मानीं। पार्टी के आगे अपना सिर झुकाया। ऐसे लोगों ने कई बार टीवी पर ये माना कि वो दुश्मन की चाल में फंस गए थे। मोहरा बन गए थे। ऐसे लोगों को बार-बार देश के लिए खतरा बताया गया। बागी नेता शू झियोंग की गिरफ्तारी से पहले पार्टी के नेताओं के बीच एक दस्तावेज बांटा गया था।
इसमें बताया गया था कि प्रेस की आजादी, आम लोगों के अधिकारों और स्वतंत्र अदालतों जैसे मुद्दों पर कुछ नहीं बोलना है। शी जिनपिंग अक्सर अपने देश के लोगों को सलाह देते हैं कि वो देश से प्यार करें। अपनी मातृभूमि से मोहब्बत करें। चीन के कम्युनिस्ट इंकलाब का सम्मान करें। चीन की संस्कृति और जीवन मूल्यों को जानें-समझे। वो लोगों को दो बातें हमेशा याद रखने को कहते हैं पहला तो चीन के गौरव की दोबारा वापसी और दूसरा चीन के सपनों की। चीन में ये बातें आपको रेलवे स्टेशनों से लेकर सड़कों पर लगे बैनर-पोस्टर पर लिखी देखने को मिल सकती हैं। इन्हें टीवी सिरीज, ऑनलाइन एनिमेशन और मोबाइल ऐप के जरिए भी लोगों तक पहुंचाया जाता है। ये नारे सब जगह हैं।
खतरा
सदियों तक चीन के बादशाहों ने देश की ताकत को दो तरीके से पेश करने की कोशिश की है। एक तरफ तो चीन की सामरिक ताकत। दूसरी तरफ उसकी सॉफ्ट पावर। वो दोनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करते आए थे। चीन के कम्युनिस्ट इतिहास का जश्न मनाते वक्त शी जिनपिंग भी यही करते हैं।
एक तरफ तो वो चेयरमैन माओ की खूनी
कम्युनिस्ट क्रांति के सामने सिर झुकाते हैं। वहीं दूसरी तरफ वो देंग शियाओ पिंग की आर्थिक क्रांति के आगे भी शीश नवाते हैं। यानी वो मार्क्सवाद का सम्मान करते हैं। साथ ही आर्थिक खुलेपन का भी जश्न मनाते हैं। उनके चीनी ख्वाब का मतलब है-एक मजबूत चीन। लेकिन इस ख्वाब से इतर शू झियोंग की आजादी का ख्वाब, देश के लिए खतरा माना जाता है। शू को चार साल की कैद के बाद रिहा कर दिया गया था। उनका तब से कोई अता-पता नहीं है।
चुनौतियां
चीन के बारे में सिंगापुर के महान नेता ली कुआन यू ने कहा था कि, 'वो दुनिया के इतिहास के सबसे बड़े खिलाड़ी हैं'। 2012 में सत्ता में आने के साथ ही शी ने चीन को सबसे बड़ा खिलाड़ी बनाने की ठान ली थी। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की सौवीं सालगिरह यानी 2021 तक चीन आर्थिक तरक्की के मामले में औसत देश हो जाएगा। वहीं चीन में कम्युनिस्टों के सत्ता में आने के सौ साल पूरे होने पर यानी 2049 तक चीन पूरी तरह से विकसित, अमीर और ताकतवर देश बन जाएगा। जल्द ही चीन की अर्थव्यवस्था अमरीका से 40 फीसद ज्यादा बड़ी हो जाएगी।
2049 तक खरीदने की ताकत के मामले में चीन की अर्थव्यवस्था, अमरीका से तीन गुना बड़ी होगी। चीन और शी जिनपिंग के लिए पिछले चार दशक एकदम अनूठे रहे हैं। जब 1972 में अमरीका के राष्ट्रपति चेयरमैन माओ से मिले थे, तो उस वक्त शी जिनपिंग एक गुफा में रहा करते थे। वो ढिबरी की रौशनी में पढ़ाई किया करते थे। उस वक्त रिचर्ड निक्सन ने कहा था कि, 'भविष्य को देखते हुए हम चीन को बाकी देशों से अलग करके नहीं रख सकते।
वरना वो अलग थलग होकर अपने ख्वाब अपने आप में बुनता रहेगा। दूसरों से नफरत को दिल में बैठाता रहेगा। अपने पड़ोसियों को धमकाता रहेगा'।
मौका
जब पश्चिम ने अपने दरवाजे चीन के लिए खोले तो शी की पीढ़ी के कई लोगों ने अपना देश छोड़ने का फैसला किया था। लेकिन शी को इस बात का एहसास था कि अपना देश छोड़कर जाने पर वो कुछ खास नहीं कर पाएंगे। वो विदेशियों से बड़े आत्मविश्वास से मिलते हैं। वो कहते हैं कि, 'चीन क्रांति का निर्यात नहीं करता। भुखमरी और गरीबी का निर्यात नहीं करता। चीन आप को कोई सिरदर्द नहीं देता। आपको और क्या चाहिए।' शी को विरासत में जो चीन मिला, वो ताकतवर था। वो दुनिया के मंच पर अपनी ताकत का मुजाहिरा करना चाहता था। चीन को शी जिनपिंग ने वो मौका दिया है।
विवादित दक्षिणी चीन सागर में बनावटी द्वीप बनाने से लेकर बेल्ट ऐंड रोड प्रोजेक्ट तक उन्होंने अपने देश को ये मौके दिए हैं। वो उस कहावत पर अमल कर रहे हैं कि जब तक आप के पास अच्छा मौका न हो, आप को अपनी ताकत छुपाकर रखनी चाहिए। चीन ने ट्रंप के पेरिस जलवायु समझौते और व्यापार समझौतों से हटने का भी फायदा उठाया है। शी ने इस समझौतों को लेकर खुद को दुनिया के बड़े नेता के तौर पर पेश किया है। हाल ही में एक टीवी डॉक्यूमेंट्री में उनकी विदेश नीति को करिश्मा बताकर पेश किया गया था। एक और टीवी सिरीज में उनके भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान का बखान किया गया है।
लेकिन शी के सामने और भी बड़ी चुनौतियां हैं। चमक-दमक के पर्दे के पीछे बड़ी आर्थिक दिक्कतें हैं। चीन की विकास की रफ्तार धीमी हो रही है। सरकार पर कर्ज बढ़ रहा है। बहुत से अर्थशास्त्री चेतावनी दे रहे हैं कि चीन के लिए सुधारों का वक्त तेजी से खत्म हो रहा है। वैचारिक एकता की लोहे की दीवार के पीछे चीन को लेकर तमाम अलग-अलग खयालत भी आवाज उठा रहे हैं। अच्छी बात ये है कि शी से पहले भी चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने बहुत सी चुनौतियों का सामना किया है। उन पर जीत हासिल की है।
माओ के दौर में अकाल से लेकर सांस्कृतिक क्रांति तक की चुनौतियां झेलीं। तो, 1989 में लोकतांत्रिक आंदोलन को झेला। शी जिनपिंग के राज में जोर-जुल्म पर आर्थिक तरक्की का मुलम्मा चढ़ाया गया है। उन्होंने बहुत से नेताओं को जेल भेजा। भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई की। विरोधियों के सुर दबाए। चेयरमैन माओ के बाद ऐसा पहली बार देखा जा रहा है कि चीन का भविष्य किसी एक शख्स पर इस तरह निर्भर है।