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शरणार्थी शिविरों में कोरोना से ज्यादा भूख से मरने का खौफ

Sun, 29 Mar 2020 08:30 AM IST
संजीव कुमार झा वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
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शरणार्थी शिविर - फोटो : पीटीआई
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सीरिया के युद्ध से जर्जर एक बस्ती में डॉक्टरों ने देखा कि लोग कोरोना वायरस से जैसी लगने वाली बीमारी से मर रहे हैं, लेकिन वे उनकी मदद नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि वहां बिस्तरों, सुरक्षात्मक चिकित्सा सामग्री और पेशेवर चिकित्सा कर्मियों की कमी है। बांग्लादेश का एक शरणार्थी शिविर इस कदर तंग है कि वहां आबादी का घनत्व न्यूयॉर्क शहर का चार गुना है, जिससे वहां सोशल डिस्टेंसिंग कायम रख पाना असंभव है।

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केन्या के शरणार्थी शिविर के क्लिनिक तो सामान्य दिनों में ही बदहाल होते हैं, जहां दो लाख लोगों के लिए सिर्फ एक डॉक्टर है। अमेरिका और इटली जैसे अमीर देश जब कोरोना वायरस से निपटने में संघर्ष कर रहे हैं, अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य विशेषज्ञ और मदद कार्यकर्ता चिंता जता रहे हैं कि यह वायरस दुनिया के सबसे कमजोर तबकों में तबाही मचा सकता है। इन दसियों लाख लोगों को हिंसक संघर्ष के कारण अपने घर छोड़ने पड़े हैं।

अफ्रीका, पश्चिम एशिया और एशिया के शरणार्थी शिविर भयभीत और कुपोषित लोगों से अटे पड़े हैं, जिनकी स्वास्थ्य सेवा और बुनियादी स्वच्छता तक सीमित पहुंच है और यह संक्रमण फैलने की एकदम मुफीद जगह बन गए हैं। ये परिवार तारपोलिन के शिविरों में रह रहे हैं, जहां मिट्टी के दरवाजे हैं। भोजन, पानी और साबुन की वहां अक्सर तंगी रहती है। खांसी से लेकर घातक बीमारियों से ग्रस्त यहां का कोई आदमी बिना इलाज के आसानी से संक्रमण फैला सकता है।

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बेहद तेज गति से फैल सकता है वायरस

दुनिया भर में लाखों लोगों को संक्रमित कर चुका कोरोना वायरस इन शिविरों में फैल कर विध्वंस गति से फैल सकता है और अनेक लोगों की जान ले सकता है। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के पब्लिक हेल्थ रिसर्चर एडम कोट्स कहते हैं, हम यह सोचते हैं कि कोरोना वायरस अमेरिका और यूरोप में बड़ा मुद्दा है, मगर हमें पता नहीं है कि यदि कोविड-19 शरणार्थी आबादी में फैल गया तो क्या होगा।

कम लोगों की हो रही जांच  
अभी तक शरणार्थियों में कोरोना वायरस की पुष्टि के मामले कम हैं, लेकिन इसके पीछे कम जांच भी कारण है। यहां जांच बेहद सीमित है और शरणार्थी तो शायद ही प्राथमिकता में हों। सीरिया और बांग्लादेश में शरणार्थियों का इलाज करने वाले डॉक्टरों का कहना है कि हाल के हफ्तों में उन्होंने इस वायरस के लक्षण वाले मरीजों का इलाज किया है। कोट्स कहते हैं कि यह सोचना बचकाना है कि यह संक्रमण शरणार्थी और विस्थापित आबादी में नहीं फैला है।

वायरस से निपटने में अक्षम ये शिविर
यदि यहां वायरस मौजूद है, तो ये शिविर इससे निपटने में भयावह तरीके से अक्षम हैं। अनेक शिविर तो पहले ही डेंगू और हैजा के प्रकोपों से जूझ रहे हैं। वहां मधुमेह और दिल की बीमारियों के संसाधन तक नहीं हैं। चिकित्सा विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि कोरोना वायरस यहां तबाही ला सकता है, जिसका अभी तक कोई इलाज नहीं ढूंढ़ा जा सका है। दुनिया भर में शरणार्थियों की मदद के लिए अपनी टीमें तैनात करने वाले डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स के कार्यकारी निदेशक एवरिल बेनोइट कहते हैं कि हम सबसे बुरी स्थिति के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं।
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वायरस बोको हराम से भी ज्यादा कहर बरपाएगा

उत्तरपूर्वी नाइजीरिया के बकास्सी कैंप के अधिकांश लोग बोको हराम के चंगुल से भागकर यहां आए हैं। उनके कम्युनिटी नेता अहमादु यूसुफ कहते हैं, यदि वायरस यहां आ गया तो यह बहुत बड़ी तबाही होगी। यहां के विद्रोह ने जितनी तबाही नहीं मचाई उससे अधिक तबाही यहां होगी। लेबनान में अधिकांश सीरियाई शरणार्थी शहरों में रहते हैं।

यहां पैंतीस बरस की निसरीन मुहरा कहती है कि उसके बच्चे बेरुत की सड़कों पर टिश्यू बेचते थे, लेकिन हमें घरों में रहने को मजबूर किया गया है। उसके पति दैनिक मजदूर हैं और जान जोखिम में डालकर काम पर जा रहे थे, लेकिन सैनिकों ने उन्हें पकड़ लिया।

यह परिवार तीन महीने से घर का किराया नहीं दे पाया है और सिर्फ तेल, ब्रेड और कुछ शाक के भरोसे है। उनके पास नकदी नहीं है, जिससे वे सैनेटाइजर खरीद सकें। वह कहती है, ‘मास्क खरीदने से बेहतर है कि मैं अपने बच्चों के लिए ब्रेड खरीद लूं। हम कोरोना से नहीं, भोजन की कमी से मारे जाएंगे।’
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