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ताजा अध्ययनः फॉर्मूला सीधा है- कोरोना संभालो तो संभलेगी अर्थव्यवस्था

Tue, 06 Apr 2021 04:38 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन

सार

ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका और चीन 2021 में वैश्विक आर्थिक विकास के दो प्रमुख इंजन होंगे। दोनों देशों में घरेलू उपभोग और बिजनेस इन्वेस्टमेंट बढ़ने के संकेत हैं...
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कोरोना वायरस - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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कोरोना महामारी पर काबू पाने में देर लगाने वाले देशों को बहुत महंगी आर्थिक कीमत चुकानी होगी। कोरोना वायरस महामारी के थमने के साथ दुनिया भर में आर्थिक वृद्धि दर में तेज बढ़ोतरी की पहले जताई गई उम्मीदें अब टूट गई हैं। ये बात अमेरिकी थिंक टैंक ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट के एक ताजा अध्ययन में कही गई है। ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट ने ये अध्ययन ब्रिटिश अखबार फाइनेंशियल टाइम्स के साथ मिल कर किया। इसकी रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक की साझा बैठक शुरू होने के मौके पर सोमवार को जारी की गई।

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रिपोर्ट में कहा गया है कि अलग-अलग देशों में महामारी की नई लहर आने के कारण अब विभिन्न देशों की आर्थिक विकास की संभावनाएं भी अलग हो गई हैं। इस अध्ययन का निष्कर्ष है कि 2021 में आर्थिक सफलता का राज़ कोरोना संक्रमण पर काबू पाना ही बना रहेगा। अभी संभावना यही नजर आ रही है कि उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों की तुलना में विकसित देश अपनी आर्थिक स्थिति को बेहतर ढंग से संभाल पाएंगे। आईएमएफ – वर्ल्ड बैंक की सोमवार को शुरू हुई बैठक में विभिन्न देशों के वित्त मंत्री और उनके केंद्रीय बैंकों के प्रमुख वर्चुअल माध्यम से अपनी बात रखेंगे।

ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका और चीन 2021 में वैश्विक आर्थिक विकास के दो प्रमुख इंजन होंगे। दोनों देशों में घरेलू उपभोग और बिजनेस इन्वेस्टमेंट बढ़ने के संकेत हैं। दोनों देशों में प्राइवेट सेक्टर का भरोसा भी मजबूत हुआ है। अमेरिका में इसकी प्रमुख वजह राष्ट्रपति जो बाइडन का साहसी कोरोना राहत पैकेज है। इससे उपभोक्ताओं के हाथ में पैसा पहुंचा, जिससे बाजार में मांग बढ़ी है। इससे कारोबारी नए निवेश के लिए प्रोत्साहित हुए हैं।
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चीन कोरोना महामारी को जल्द संभाल लेने की अपनी कामयाबी के कारण पिछले साल से ही विश्व अर्थव्यवस्था का प्रमुख इंजन बना हुआ है। अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत, इंडोनेशिया और दक्षिण कोरिया में भी इस साल अपेक्षाकृत अधिक आर्थिक वृद्धि दर देखने को मिल सकती है। इंस्टीट्यूट का अनुमान है कि दुनिया के बाकी तमाम क्षेत्रों में 2020 में आई मंदी और बेरोजगारी का असर इस साल भी बना रहेगा।

ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट की इस रिपोर्ट- इंडेक्स फॉर ग्लोबल इकॉनोमिक रिकवरी- को तैयार करने के लिए वास्तविक आर्थिक गतिविधियों, वित्तीय बाजारों और वैश्विक एवं अपने देश की अर्थव्यवस्था में भरोसे के स्तर का अध्ययन किया गया। ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट और फाइनेशियल टाइम्स ने इंडेक्स रिपोर्ट को सबसे पहले 2012 में तैयार किया था। तब से हर छह महीने पर इसे जारी किया जाता है, जिसमें ताजा आर्थिक संकेतों को शामिल कर निष्कर्ष निकाले जाते हैं। ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि इस बार तमाम संकेत जितनी बुरी हालत में दिखे, वैसा इसके पहले कभी नहीं हुआ था।

गौरतलब है कि पिछले हफ्ते आईएमएफ और संयुक्त राष्ट्र दोनों ने चेतावनी दी थी कि अगर ज्यादा महत्वाकांक्षी कदम नहीं उठाए गए तो गरीब देश कोरोना महामारी के आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी दुष्प्रभावों की मार झेलते रहेंगे। ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट के अर्थशास्त्री ईश्वर प्रसाद ने फाइनेंशियल टाइम्स से कहा- ‘मजबूत और टिकाऊ सुधार की नुस्खा अब भी वही है, जो पिछले साल था। यानी वायरस पर नियंत्रण के मजबूत कदम और उसके साथ संतुलित मौद्रिक और राजकोषीय प्रोत्साहन पैकेज, जिनमें जोर इस पर हो कि बाजार में मांग बढ़े और उत्पादकता में सुधार हो।’

यूरोप और लैटिन अमेरिका के देश ऐसे कदम उठाने में नाकाम रहे हैं। इसकी वजह है कि इस साल भी उनकी आर्थिक संभावनाएं कमजोर बनी हुई हैं। इसलिए अनुमान लगाया गया है कि उनका सकल घरेलू उत्पाद 2022 तक महामारी के पहले वाले स्तर तक नहीं पहुंच सकेगा। ईश्वर प्रसाद ने कहा- ‘नीतियों में अनिर्णय का असर उपभोक्ता और बिजनेस के भरोसे पर पर पड़ रहा है, जिससे आर्थिक मुसीबतें और बढ़ रही हैं।’

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