लंदन में एक व्यक्ति के स्टेम सेल ट्रांसप्लांट के बाद एचआईवी संक्रमण से मुक्त होने का मामला सामने आया है। स्टेम सेल प्रतिरोपण के बाद एड्स विषाणु से मुक्त होने का यह दूसरा मामला है। जर्नल नेचर में प्रकाशित एक केस स्टडी में मंगलवार को एक भारतवंशी शोधकर्ता के नेतृत्व में वैज्ञानिकों ने यह जानकारी साझा की।
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के शोधकर्ता रविंद्र गुप्ता ने बताया, व्यक्ति का नाम उजागर नहीं किया गया है। इसे 2003 में पता चला कि वह एचआईवी से पीड़ित है। इसके बाद उसे 2012 में ‘हॉजकिन लिंफोमा’ नाम का कैंसर हुआ, जिसका 2016 में स्टेम सेल ट्रांसप्लांट के जरिए इलाज शुरू हुआ। उसके डॉक्टरों को स्टेम सेल का ऐसा डोनर मिला जिसके शरीर में एक ऐसा दुर्लभ जीन म्यूटेशन था, जो प्राकृतिक तौर पर एचआईवी के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता मुहैया कराता है।
इससे डॉक्टरों को लगा कि कैंसर के साथ-साथ इसके एचआईवी का भी इलाज हो जाएगा। यह जीन म्यूटेशन उत्तरी यूरोप में रहने वाले महज एक फीसदी लोगों में होता है। गुप्ता ने कहा, ऐसा जीन मिलना लगभग असंभव है।
18 महीने हुए दवा बंद किए
इस ट्रांसप्लांट से इस रोगी की पूरी प्रतिरक्षा प्रणाली ही बदल गई, जिससे डोनर की ही तरह उसका शरीर भी एचआईवी वायरस के खिलाफ असरदायक हो गया। बाद में मरीज ने अपनी मर्जी से एचआईवी की दवाएं लेना बंद कर दीं, ताकि देखा जा सके कि एड्स वायरस फिर से तो सक्रिय नहीं हो जाएगा। दवा बंद करने के 18 महीनों के बाद भी उसके शरीर में एड्स वायरस नहीं पाया गया।
बर्लिन पेशेंट ने कहा, पहचान उजागर करने को कहूंगा
एड्स से ठीक होने वाला पहला व्यक्ति जर्मन था, जो बर्लिन पेशेंट के नाम से मशहूर हुआ। 2008 में एड्स मुक्त होने वाले टिमोथी ब्राउन नाम के इस शख्स ने अपनी पहचान उजागर कर दी थी। ब्राउन ने कहा, ‘मैं लंदन पेशेंट से मिल कर उससे अपनी पहचान उजागर करने को कहूंगा। इसलिए ताकि एचआईवी ग्रस्त लोगों को नई उम्मीद मिले।’