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अब नई मुश्किल: फेफड़ों को नुकसान पहुंचाकर मस्तिष्क पर हमला बोल रहा कोरोना

अमर उजाला रिसर्च टीम Published by: Amit Mandal Updated Sun, 07 Jun 2020 03:33 PM IST

सार

  • कोरोना वायरस मरीजों की जान बचाने में जुटे डॉक्टरों के लिए एक नई मुश्किल 
  • यह वायरस फेफड़ों को नुकसान पहुंचाकर मस्तिष्क पर भी हमला बोल रहा है 
  • वायरस फेफड़ों को संक्रमित करता है तो मरीज को सांस लेने में तकलीफ शुरू होती है 
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कोरोना वायरस - फोटो : PTI


येल स्कूल ऑफ मेडिसिन के न्यूरोलॉजी एंड न्यूरो सर्जरी विभाग के प्रोफेसर डॉ. केविन शेठ बताते हैं कि वायरस जब फेफड़ों को बुरी तरह संक्रमित करता है, तो मरीज को सांस लेने में तकलीफ शुरू होती है।


इस कारण शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा कम होने से मस्तिष्क पर बुरा असर पड़ता है। इस वजह से कोरोना के मरीजों में ब्रेन स्ट्रोक झटके आना, कोमा में जाना और लकवा के मामले अधिक सामने आने लगे हैं। संक्रमण से बचाने के लिए रोग प्रतिरोधक क्षमता भी अधिक सक्रिय हो जाता है। इस कारण शरीर के दूसरे अंगों को नुकसान हो रहा है। इस वजह से कोरोना वायरस जो में मल्टी ऑर्गन फेलियर के मामले या मस्तिष्क संबंधी परेशानियां बढ़ रही हैं।


संक्रमित मरीजों की जांच तक मुश्किल


संक्रमितों में स्ट्रोक का खतरा बढ़ा है लेकिन आईसीयू में गंभीर बेहोशी की हालत में होने के कारण इसका पता समय पर नहीं चल पाता है। इसके बीच दूसरी सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि ऐसे मरीजों को एमआरआई जांच के लिए आईसीयू से शिफ्ट करना सबसे चुनौतीपूर्ण काम है। अधिकतर डॉक्टरों को इस बात का भी डर सताता है कि मरीज के कारण मशीन और वहां पर मौजूद स्टाफ के संक्रमित होने का खतरा रहेगा।


घर जाने के बाद कुछ मरीजों में लक्षण


फ्रांस में संक्रमित मरीजों पर हुए अध्ययन से पता चला है कि आधे मरीज जब संक्रमण से ठीक हो कर घर लौटे तो उन्हें मस्तिष्क संबंधी परेशानियों का अनुभव हुआ जैसे चलने फिरने में दिक्कत, बोलने में दिक्कत, बार-बार चीजों को भूल जाना इत्यादि। न्यूरोक्रिटिकल केयर हेल्थ सिस्टम के निदेशक डॉक्टर रिचर्ड टेम्स बताते हैं कि मरीजों की शिफ्टिंग मुश्किल है। ऐसी मशीनों का प्रयोग हो जिसकी चुंबकीय शक्ति कम हो और बैड पर ही जांच आसानी से हो सके।


एस-2 रिसेप्टर से मस्तिष्क में वायरस


जर्मनी में अध्ययन में पता चला कि वायरस एस-2 रिसेप्टर से मस्तिष्क में पहुंच रहा है। एस-2 रिसेप्टर सिर्फ फेफड़ों में ही नहीं मस्तिष्क के कुछ हिस्सों में भी होता है। इससे सांस की बीमारी माने जाना वाला कोरोना मस्तिक और दूसरे अंगों को प्रभावित कर रहा है। वैज्ञानिकों का दावा है कि वायरस मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी के सेरेब्रोफ्लूड में भी जा सकता है।


मरीज को पता नहीं वो अस्पताल में हैं


नॉर्थ कैरोलिना के पल्मोनोलॉजिस्ट और क्रिटिकल केयर स्पेशलिस्ट डॉक्टर जसपाल सिंह बताते हैं कि आईसीयू में बेहोश मरीजों की स्थिति इतनी गंभीर है कि उनका ठीक होना मुश्किल है। मरीज को यह अनुभव ही नहीं होता कि वह अस्पताल में है। दिमाग में वायरल लोड अधिक होने से भूलने की बीमारी हो रही परिवारजनों को नहीं पहचान पाता है। इसलिए रिकवरी के बाद विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
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