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अपनी सुरक्षा पर पूरा खर्च नहीं करता यूरोप, फिर रणनीतिक आजादी कैसे?

Sun, 22 Nov 2020 09:29 PM IST
गौरव पाण्डेय वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ब्रसेल्स
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यूरोपीय संघ
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यूरोपीय संघ (ईयू) के एक अध्ययन से जाहिर हुआ है कि यूरोपीय देश रक्षा अनुसंधान और तकनीक पर जरूरत के मुताबिक खर्च नहीं करते। जब तक वे ऐसा नहीं करेंगे, उनके लिए सामरिक मामलों में स्वायत्तता हासिल करना संभव नहीं होगा। यूरोप दूसरे विश्व युद्ध के बाद से अपनी सुरक्षा के लिए काफी हद तक अमेरिका पर निर्भर रहा है। लेकिन चार साल पहले जब डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति बने, तो उन्होंने साफ कर दिया कि अब अमेरिका ये जिम्मेदारी नहीं लेगा। उन्होंने यूरोप में तैनात अमेरिकी सैनिकों की वापसी भी शुरू कर दी। इससे पैदा हुए नए हालात के बीच ईयू ने ये अध्ययन कराया कि क्या यूरोप को सैनिक मामलों में अमेरिका से स्वतंत्र होने का लक्ष्य तय करना चाहिए। अध्ययन की रिपोर्ट अब सौंपी गई है।

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यूरोप अमेरिका पर निर्भर ना रहे, ये विचार सबसे पहले फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने दिया था। लेकिन जब ये अध्ययन रिपोर्ट आई है, तब स्थितियां कुछ बदलती दिख रही हैं। अमेरिका के निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन ने उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की है और ‘यूरोपीय सहयोगियों’ के साथ मिल कर काम करने का इरादा जताया है।


ईयू ने समन्वित वार्षिक रक्षा समीक्षा के तहत ये अध्ययन कराया। इसके सार-संक्षेप वाले हिस्से में कहा गया है- रक्षा अनुसंधान और तकनीक पर खर्च का स्तर अपर्याप्त बना हुआ है, जिससे यूरोप की सामरिक स्वायत्तता जोखिम में नजर आती है। समीक्षा से सामने आया कि जब रक्षा नियोजन की बात आती है, तो ईयू के देश यूरोपीय प्राथमिकताओं को तीसरे स्थान पर रखते हैं। इसके ऊपर वे अपने राष्ट्रीय और उसके बाद नाटो के हितों को तरजीह देते हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इन देशों में सामरिक स्वायतत्ता की समझ अलग-अलग और असमान है। 
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ये अध्ययन यूरोपियन डिफेंस एजेंसी (ईडीए) ने किया। इसमें ईयू के 26 सदस्य देशों की राष्ट्रीय रक्षा योजना और क्षमताओं का पूरा जायजा लिया गया। डेनमार्क इस अध्ययन में शामिल नहीं हुआ, क्योंकि रक्षा मामले में उसकी अपनी अलग नीति है। अध्ययन रिपोर्ट में ध्यान दिलाया गया है कि 2007-08 के वित्तीय संकट के समय यूरोपीय देशों ने अपने रक्षा में जो कटौती की थी, उसकी भरपाई आज तक नहीं की गई है। 2007 में ये देश रक्षा पर जितना खर्च कर रहे थे, उस स्तर पर वे पिछले साल जाकर वापस पहुंच पाए। जबकि इस बीच जरूरतें बढ़ती चली गई हैं। खर्च के स्तर में जो वापसी हुई है, वह भी अनुसंधान और तकनीक के क्षेत्र में नहीं है। इस क्षेत्र में यूरोप का खर्च आज भी 2007 के स्तर से नीचे है।

ईयू ने 2018 में एक नया सैनिक समझौता किया था। इसे स्थायी ढांचागत सहयोग नाम दिया गया है। इसके तहत 47 परियोजनाएं लागू करने का लक्ष्य रखा गया है। ईयू ने एक यूरोपीय रक्षा कोष की भी शुरुआत की है। लेकिन ताजा अध्ययन रिपोर्ट में बताया गया है कि इसके लिए सिर्फ सात अरब यूरो की रकम आवंटित की गई है। ये रकम सात साल के लिए है। जबकि यूरोपीय आयोग ने इससे 40 फीसदी ज्यादा रकम आवंटित करने का सुझाव दिया था।

रिपोर्ट में कहा गया है कि हाल में रक्षा क्षेत्र में जो पहल की गई है, उससे अभी तक कोई महत्त्वपूर्ण और सकारात्मक परिणाम हासिल नहीं हुआ है। यूरोप के एक समस्या यह भी है कि अलग-अलग देशों के पास अलग-अलग तरह की हथियार प्रणालियां हैं। इसमें उल्लेख किया गया है कि दुनिया की सबसे बड़ी सेना अमेरिका के पास है, लेकिन उसके पास सिर्फ चार तरह के लड़ाकू जहाज और केवल एक प्रकार का मुख्य युद्धक टैंक है। जबकि यूरोप के पास 30 अलग-अलग ढंग के लड़ाकू जहाज और 16 प्रकार के युद्धक टैंक हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि इतनी विभिन्नताओं का कोई तर्क नहीं है। इसलिए यूरोपीय देशों को अब समन्वय कायम कर प्रभावी सैनिक क्षमता विकसित करनी चाहिए।

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