Sri Lanka tax hike: Sri Lanka President Ranil Wickremesinghe
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श्रीलंका में आय कर बढ़ाने के रानिल विक्रमसिंघे सरकार को देश का कारोबार जगत आत्मघाती कदम मान रहा है। इस क्षेत्र का मानना है कि कॉरपोरेट टैक्स में इजाफे के कारण अब जहां कारोबारियों के पास निवेश के लिए कम पूंजी बचेगी, वहीं आय कर बढ़ने के कारण मध्यम वर्ग उपभोग घटाने पर मजबूर होगा, जिससे बाजार में मांग घटेगी।
विक्रमसिंघे सरकार के टैक्स बढ़ाने के हालिया फैसले के बाद देश में टैक्स की दरें वापस 2019 के स्तर पर पहुंच गई हैं। इस निर्णय के तहत प्रत्यक्ष करों के अलावा वैल्यू ऐडेड टैक्स (वैट) में भी बढ़ोतरी की गई है। वैट की दर अब वापस 15 फीसदी पर पहुंच गई है। 2019 में राष्ट्रपति बनने के बाद अपने चुनावी वादे के मुताबिक गोटाबया राजपक्षे ने प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों तरह के करों में भारी कटौती की थी। इसे भी देश में पैदा हुए आर्थिक संकट का एक कारण बताया गया है।
टैक्स बढ़ोतरी के ताजा फैसले का देश भर में विरोध हुआ है। लेकिन सरकार समर्थक विशेषज्ञों ने विक्रमसिंघे सरकार के ताजा फैसले को जायज ठहराया है। आर्थिक विश्लेषक उमेश मोरामुडाली ने कहा है- ‘कोई भी सुधार करने से पहले उस पर आम सहमति तैयार करना जरूरी होता है, वरना सही फैसले पर उलटी प्रतिक्रिया होती है। लेकिन कुल मिला कर टैक्स नहीं बढ़ाया गया, तो आईएमएफ से कर्ज नहीं मिलेगा। उस हाल में आर्थिक स्थिति में सुधार संभव नहीं होगा।’ उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था ठीक से चल सके, इसे सुनिश्चित करना बहुत बड़ा काम है। टैक्स बढ़ोतरी उसी दिशा में लिया गया फैसला है।
इस बीच आम जन की प्रतिक्रिया यह है कि सरकार ने मंत्रियों और नौकरशाहों की लंबी फौज खड़ी कर रखी है। अब उसने उन पर हो रहे खर्च को घटाने के बजाय आम लोगों पर बोझ बढ़ाया है। आम प्रतिक्रियाओं में यह भी कहा गया है कि संकट सरकार के गैर जिम्मेदार फैसलों से पैदा हुआ। लेकिन अब उसका बोझ आम लोगों पर डाला जा रहा है।
आर्थिक रणनीतिकार ट्रेवर मेंडिस ने कहा है कि श्रीलंका के लोगों की आय अब पर्याप्त नहीं है। महंगाई के कारण लोगों की जिंदगी मुहाल हो गई है। इसलिए उन्हें टैक्स की नई दरों का बोझ ज्यादा महसूस होगा। लेकिन मेंडिस ने कहा कि अर्थव्यवस्था में दीर्घकालिक सुधार के लिए टैक्स आधार और टैक्स दरों में बढ़ोतरी जरूरी है। श्रीलंका में सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में सरकार का राजस्व गिर कर 8.7 फीसदी पर आ चुका है, जबकि 1980 के दशक में यह 20 प्रतिशत होता था।
लेकिन विपक्ष ऐसे तर्कों से सहमत नहीं है। विपक्षी सांसद और संसद की सार्वजनिक वित्त समिति के अध्यक्ष हर्षा डि सिल्वा ने कहा है कि सरकार को टैक्स दरें उतनी ही रखनी चाहिए, जिसे लोग बर्दाश्त कर पाएं। उन्होंने कहा- लेकिन सरकार लोगों का गला घोंटने और उन्हें मार डालने वाले रास्ते पर चल रही है। कोलंबो स्थित थिंक टैंक एडवोकेटा के अध्यक्ष मुर्तजा जाफरजी ने कहा है- ‘टैक्स बढ़ाने के बजाय सरकार को प्राइवेट बिजनेस कंपनियों को ऐसे प्रोत्साहन देने चाहिए, जिससे उनका मुनाफा बढ़े। ऐसा होने पर सरकार को अधिक टैक्स मिलेगा।’