सार
श्रीलंका में राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके के कार्यकाल के एक साल पूरे होने पर प्रमुख तमिल पार्टी पत्र लिखकर तमिल मुद्दों पर वार्ता की मांग की है। पार्टी ने आरोप लगाया कि घोषणापत्र में किए वादों, जैसे स्थानीय सरकारों को अधिकार और नया संविधान पर अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। तमिल पार्टी ने इन मुद्दों पर बातचीत की मांग की है।
अनुरा कुमारा दिसानायके, राष्ट्रपति, श्रीलंका
- फोटो : PTI
श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके के कार्यकाल के एक साल पूरे होने पर श्रीलंका की प्रमुख तमिल पार्टी तमिल अरासु कच्ची (आईटीएके) ने उन्हें एक पत्र लिखा है। इसमें पार्टी ने तमिल संबंधित जो भी राष्ट्रीय स्तर के अहम मुद्दे हैं उसपर बातचीत करने की मांग उठाई है। बता दें कि दिसानायके ने 23 सितंबर 2024 को भारी जीत के बाद राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी। उनकी पार्टी नेशनल पीपल्स पावर (एनपीपी) ने अपने चुनावी घोषणापत्र में स्थानीय सरकारों को अधिक अधिकार देने और एक नया संविधान लाने का वादा किया था।
श्रीलंका में तमिल लोगों की प्रमुखता से आवाज उठाने वाली आईटीएके पार्टी ने अपने 22 सितंबर को लिखे पत्र में राष्ट्रपति दिसानायके के चुनावी घोषणापत्र का जिक्र किया। पत्र में कहा गया कि आपके राष्ट्रपति (दियानायके) कार्यभार संभालने को एक साल हो गया है। आपने चुनाव प्रचार और बाद में भी इस गंभीर मुद्दे को हल करने का वादा किया था, लेकिन अब तक इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। पार्टी ने यह भी बताया कि उसने आठ सदस्यों की एक समिति बनाई है जो राष्ट्रपति से इस मुद्दे पर बातचीत शुरू करेगी।
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संविधान सुधार की दिशा में क्या-क्या हुआ?
श्रीलंका की एनपीपी सरकार के प्रवक्ता और मंत्री नालिंदा जयतिसा ने भी हाल ही में यह स्वीकार किया कि संविधान सुधार को लेकर अब तक कोई काम नहीं हुआ है। सरकार ने पहले वादा किया था कि स्थगित प्रांतीय परिषद चुनाव एक साल के भीतर कराए जाएंगे, लेकिन अब उसमें और देरी की घोषणा कर दी गई है।
क्या है श्रीलंका में तमिल समुदाय की आवाज और मांग, समझिए
गौरतलब है कि श्रीलंका में तमिल समुदाय मुख्य रूप से देश के उत्तर और पूर्वी हिस्सों में रहता है। इनमें दो समूह हैं, श्रीलंकाई तमिल और भारतीय मूल के तमिल। तमिलों को राजनीतिक अधिकार देने के लिए 1987 में भारत और श्रीलंका के बीच इंडो-लंका समझौता हुआ था, जिसके तहत संविधान में 13वां संशोधन कर नौ प्रांतों में परिषदें बनाई गईं।
दिलचस्प बात यह है कि मौजूदा सत्ताधारी गठबंधन एनपीपी की प्रमुख पार्टी जनता विमुक्ति पेरमुना (जेवीपी) ने उस समय इस समझौते के खिलाफ विद्रोह किया था। लगभग 30 वर्षों तक लिट्टे नामक उग्रवादी संगठन ने उत्तर और पूर्व में एक स्वतंत्र तमिल राष्ट्र के लिए सशस्त्र संघर्ष किया था, जो 2009 में उसके नेता वेलुपिल्लई प्रभाकरन की मौत के साथ समाप्त हो गया।
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