श्रीलंका की सत्तारूढ़ पार्टी श्रीलंका पोदुजाना पेरामुना (एसएलपीपी) ने राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे के रुख की अवहेलना करते हुए सोमवार को स्थानीय परिषद चुनाव जल्द कराने का आह्वान किया।
एसएलपीपी के महासचिव सागर करियावासम ने यहां संवाददाताओं से कहा, हम चुनाव आयोग को पत्र लिखकर वित्त मंत्री के साथ चर्चा करने और जल्दी चुनाव कराने की व्यवस्था करने का अनुरोध करेंगे। साथ ही उन्होंने चुनावी प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए अपनी पार्टी के दृढ़ संकल्प का संकेत दिया। .
सुप्रीम कोर्ट में है मामला, अगले महीने होनी है सुनवाई
राष्ट्रपति विक्रमसिंघे के पास वित्त मंत्रालय का भी कार्यभार है। उन्होंने द्वीप राष्ट्र में व्याप्त वित्तीय संकट के कारण पहले 340 से अधिक परिषदों के चुनाव स्थगित कर दिए थे। निर्धारित चुनाव पहले नौ मार्च को होना था, लेकिन राष्ट्रीय खजाने में धन की कमी के कारण इसे अनिश्चित काल के लिए बढ़ा दिया गया। फिलहाल यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है, विपक्ष ने सरकार को चुनाव आगे बढ़ाने के लिए मजबूर करने के लिए अदालत से हस्तक्षेप का आग्रह किया है। मामलों की सुनवाई सितंबर में होनी है।
2018 में हुआ था आखिरी चुनाव
इस बीच राष्ट्रपति विक्रमसिंघे अपने रुख पर कायम हैं कि देश के आर्थिक संकट से उबरने के बाद ही चुनाव कराए जा सकते हैं। स्थानीय सरकार के चुनाव हर चार साल में होते हैं, यह आखिरी बार 2018 में आयोजित किए गए थे। राजनीतिक दलों ने चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवारों को नामांकित किया था, लेकिन चुनाव आयोग ने कहा कि राजकोष से धन जारी नहीं होने के कारण वह चुनाव कराने में असमर्थ है।
करियावासम ने एसएलपीपी उम्मीदवारों के सामने आने वाली चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि वे चुनाव कानूनों से बंधे हैं क्योंकि चुनाव अवधि के दौरान सार्वजनिक गतिविधियों में उनकी भागीदारी पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। उन्होंने पार्टी की चिंताओं को रेखांकित करते हुए जोर देकर कहा, या तो चुनाव होना चाहिए या हमारे उम्मीदवारों को चुनाव प्रचार पर कानूनी प्रतिबंधों से मुक्त किया जाना चाहिए।
यूनाइटेड नेशनल पार्टी (यूएनपी) के सदस्य विक्रमसिंघे ने राष्ट्रपति पद तब ग्रहण किया था, जब एसएलपीपी ने उन्हें गोटबाया राजपक्षे का शेष कार्यकाल (नवंबर 2024 तक) पूरा करने के लिए वोट दिया था। गोटबाया राजपक्षे को पिछले साल जुलाई में देश में आर्थिक संकट की वजह से उनके खिलाफ देशव्यापी विरोध-प्रदर्शन के बाद इस्तीफा देना पड़ा था। हालांकि, पार्टी अब आंतरिक विभाजन से जूझ रही है। मुख्य विपक्षी पार्टी समागी जन बालावेगया (एसजेबी) और एसएलपीपी से अलग हुए अन्य समूहों का आरोप है कि स्थानीय चुनाव कराने में विक्रमसिंघे की अनिच्छा उनकी पार्टी की हार की आशंका की वजह है।