Sri Lanka: Ranil Wickremesinghe
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श्रीलंका के राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे की आर्थिक उपायों पर राजनीतिक आम सहमति बनाने की कोशिश को एक और झटका लगा है। संकट की इस घड़ी में विक्रमसिंघे सर्वदलीय सरकार बनाने की कोशिश में रहे हैं। लेकिन अब सत्ताधारी श्रीलंका पोडुजना पेरामुना (एसएलपीपी) पार्टी का ही एक धड़ा विपक्ष से जा मिला है। एसएलपीपी के अध्यक्ष और पूर्व विदेश मंत्री जीएल पीरिस के नेतृत्व में 13 सांसदों के गुट ने अब संसद में विपक्षी बेंचों पर बैठने का एलान किया है। ये सांसद काफी समय एसएलपीपी में असंतुष्ट गुट के रूप में काम कर रहे थे।
पीरिस और उनके साथ अब सदन में निर्दलीय सांसदों के गुट के रूप में बैठेंगे। उनकी इस घोषणा का विपक्ष के नेता सजित प्रेमदासा ने स्वागत किया है। स्वागत संदेश के साथ प्रेमदासा ने एसएलपीपी के नेता डलास अलहाप्पेरुमा के साथ अपनी एक तस्वीर भी शेयर की। अलहाप्पेरुमा को प्रेमदासा ने जुलाई में हुए राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष का उम्मीदवार बनाया था। उन्हें समर्थन देने के लिए तब प्रेमदासा ने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली थी।
राष्ट्रपति चुनाव में अलहाप्पेरुमा हार गए थे। तब 225 सदस्यीय संसद में 134 वोट हासिल कर विक्रमसिंघे विजयी हुए थे। इस बड़े बहुमत को देखते हुए ऐसा नहीं लगता कि 13 सांसदों के अलग होने से मौजूदा सरकार के बहुमत के लिए तुरंत कोई खतरा होगा। लेकिन अब उसका बहुमत बहुत छोटा हो गया है।
पर्यवेक्षकों के मुताबिक पीरिस गुट के ताजा फैसले से ये उम्मीद और कमजोर पड़ गई है कि देश को मौजूदा गंभीर आर्थिक संकट से निकालने के लिए राजनीतिक दल एकजुट हो पाएंगे। विक्रमसिंघे लगातार सर्वदलीय सरकार बनाने की पेशकश करते रहे हैं। लेकिन मुख्य विपक्षी दल समगी जना बुलावेगया (एसजेबी) ने सरकार में शामिल होने से इनकार किया है। कुछ रोज पहले उसने यह जरूर कहा था कि वह संसदीय समितियों का हिस्सा बन कर सरकार की मदद कर सकती है, लेकिन वह मंत्री पद लेने को तैयार नहीं है।
एसजेबी के सांसद हर्षा डि सिल्वा ने विक्रमसिंघे सरकार की तरफ से पेश अंतरिम बजट में शामिल कुछ प्रस्तावों की तारीफ की है। उन्होंने बुधवार को कहा- ‘ये प्रस्ताव ठोस हैं। इसके बावजूद ये बात मेरी कल्पना से बाहर है कि मेरी पार्टी एसएलपीपी के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल होगी।’ उन्होंने कहा कि दोनों पार्टियों की नीतियां एक दूसरे के विरोधी हैं। डि सिल्वा के इस बयान पर सत्ता पक्ष ने कड़ी प्रतिक्रिया जताई। विमानन मंत्री निल सिरपाला ने कहा है कि एसजेबी दुविधा में फंसी हुई है। वह पद चाहती है, लेकिन स्वीकार करने से डर रही है।
पर्यवेक्षकों के मुताबिक विक्रमसिंघे सरकार मोटे तौर पर पूर्व राष्ट्रपति गोटाबया राजपक्षे की नीतियों पर चल रही है। अंतरिम बजट में शामिल प्रस्तावों के जरिए उसने जहां आम लोगों पर टैक्स बोझ बढ़ाने की पहल की है, वहीं धनी तबकों के राजस्व वसूलने का कोई प्रस्ताव इसमें नहीं है। आलोचकों के मुताबिक अगर ये बजट प्रस्ताव लागू हुए, तो आम लोगों की आर्थिक स्थिति और बिगड़ेगी। इससे जन असंतोष और भड़कने की सूरत बनेगी। इसलिए विपक्षी दल जन असंतोष के निशाने पर आने से बचने की कोशिश कर रहे हैं।