मौजूदा आर्थिक संकट के बीच जिस तरह श्रीलंका ने चीन के सामने हाथ फैलाया है, उससे यहां कई हलकों में यह अंदेशा जताया जा रहा है कि गोताबया राजपक्षे की सरकार फौरी राहत के लिए देश की संप्रभुता का सौदा कर रही है। आशंका यह है कि श्रीलंका कर्ज के जाल में फंस जाएगा, जिससे चीन को भारतीय महासागर में अपने पांव और फैलाने का मौका मिलेगा। जिस समय इस क्षेत्र में अमेरिका के साथ चीन का टकराव बढ़ रहा है, हिंद महासागर क्षेत्र में प्रभाव बढ़ाने का अवसर चीन के लिए एक वरदान की तरह है।
इस महीने के मध्य में चीन के विदेश मंत्री वांग यी कोलंबो यात्रा पर आए थे। उस मौके पर श्रीलंका सरकार ने उनसे चीन का कर्ज चुकाने की समयसीमा में छूट देने की गुजारिश की। साथ ही श्रीलंका ने चीन को अपने यहां से होने वाले निर्यात पर अधिक रियायतों की मांग की। 2021 में श्रीलंका से तकरीबन साढ़े तीन बिलियन डॉलर का निर्यात चीन को हुआ था।
श्रीलंकाई संसद में विपक्ष के सदस्य और जाने-माने अर्थशास्त्री हर्षा डि सिल्वा ने कुछ दिन पहले संसद में कहा कि जनवरी 2023 आते-आते श्रीलंका के विदेशी मुद्रा भंडार खाली हो चुका होगा। बल्कि उसमें कुल देनदारी की तुलना में लगभग 44 करोड़ डॉलर की कमी रहेगी। इस सूरत को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों मूडीज और फिच ने श्रीलंका का दर्जा बी से गिरा कर सी कर दिया है। विश्व बैंक ने कहा है कि बीते दो साल में आधे से ज्यादा श्रीलंकाई गरीबी रेखा के नीचे चले गए हैं। देश में पिछले नवंबर में मुद्रास्फीति की दर 11.1 फीसदी तक पहुंच गई थी। इस वजह से रोजमर्रा की जरूरत की चीजें आम लोगों की पहुंच से बाहर हो गई हैँ।
इस संकट के बीच राजपक्षे सरकार जिस तरह से खुद को चीन पर अधिक निर्भर बना रही है, उसको लेकर देश में विरोध बढ़ रहा है। चीन के खिलाफ श्रीलंका में जन भावनाएं पहले से मौजूद हैं। कोलंबो बंदरगाह का ठेका चीन को देने के लिए हुए समझौते के खिलाफ श्रीलंका के सुप्रीम कोर्ट में 18 याचिकाएं दायर की गई थीं। अप्रैल 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने इस करार के कई प्रावधानों को अवैध करार दिया था।