श्रीलंका सरकार अब लोगों को भुखमरी के शिकार बच्चों को गोद ले लेने के लिए प्रोत्साहित करेगी। सरकार इस बारे में एक योजना तैयार कर रही है। बताया जाता है कि देश में लगातार जारी आर्थिक संकट के कारण 20 हजार से अधिक बच्चे भूखमरी के कगार पर हैं। सरकार इन बच्चों को राहत देने में खुद अक्षम पा रही है।
कुल मिला कर श्रीलंका में लगभग 63 लाख बच्चों के सामने खाद्य असुरक्षा की हलकी या गंभीर स्थितियां हैं। अगर इन बच्चों को तुरंत सहायता नहीं दी गई, तो उनकी हालत काफी बिगड़ सकती है। इस बारे में पिछले महीने संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं- खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) और वर्ल्ड फूड प्रोग्राम (डब्ल्यूईएफ) ने चेतावनी दी थी।
संयुक्त राष्ट्र की एक अन्य एजेंसी यूनिसेफ ने पिछले महीने जारी एक रिपोर्ट में कहा था कि देश में 57 लाख लोगों को तुरंत मानवीय मदद की जरूरत है। इनमें 23 लाख बच्चे शामिल हैँ। इससे श्रीलंका उन देशों में शामिल हो गया है, जहां के बाल कुपोषण सबसे ज्यादा है। श्रीलंका सरकार ने भी स्वीकार किया है कि देश में स्थिति गंभीर है।
श्रीलंका के स्वास्थ्य मंत्री केहलिया रामबुकवेला ने कहा है कि श्रीलंका सरकार के अधिकारी अनुदान दे सकने में सक्षम देशवासियों से संपर्क में हैं। उन्होंने इन लोगों से तुरंत धन देने की गुजारिश की है, ताकि बेहद कुपोषण के शिकार बच्चों की मदद की जा सके। ये बच्चे अभी भी स्कूल नहीं जा रहे हैं।
रामबुकवेला ने कहा- ‘धनी माता-पिता चाहें तो वे मदद कर सकते हैं। हर बच्चे पर हर महीने पांच हजार (श्रीलंकाई) रुपये का खर्च आएगा। एक व्यक्ति ने 20 बच्चों को गोद लिया है। एक अन्य व्यक्ति ने 100 बच्चों का खर्च उठाने का फैसला किया है। देश में कुपोषण में दो फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। यह खतरनाक स्थिति तो नहीं है, लेकिन इसको लेकर हमें सतर्क रहना होगा।’
वेबसाइट इकॉनमीनेक्स्ट.कॉम को रामबुकवेला ने बताया कि हर ग्राम सेवक डिवीजन में पांच से 10 ऐसे बच्चे मौजूद हैं, जो अत्यंत कुपोषण का शिकार हैं। उन्होंने कहा- ‘स्थिति रातों-रात तो नहीं सुधरेगी। न ही तुरंत खाद्य आपूर्ति में सुधार की संभावना है।’ उन्होंने बताया कि सरकार संपन्न व्यक्तियों को प्रोत्साहित करेगी कि वे कम से कम एक बच्चे के स्पॉन्सर बनें। यह वे सुनिश्चित करें कि वह बच्चा गंभीर कुपोषण की स्थिति से उबर जाए। ऐसे 30 हजार लोग अगर सामने आ जाएं, तो बच्चों के पोषण स्तर में सुधार हो सकता है।
श्रीलंका में इस साल के आरंभ में ही आर्थिक संकट ने भीषण रूप ले लिया था। इसके खिलाफ जन विद्रोह हुआ, जिसकी वजह से तत्कालीन राष्ट्रपति गोटाबया राजपक्षे को अपना पद छोड़ना पड़ा। लेकिन संकट से अब तक देश को कोई राहत नहीं मिली है। इसका बच्चों पर काफी खराब असर पड़ा है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि कुपोषण की अवस्था में पल रहे बच्चे बड़े होने पर भी शारीरिक रूप से कमजोर बने रहेंगे। इस रूप में ये संकट एक दीर्घकालिक चुनौती है।