श्रीलंका के तमिल मछुआरे दयनीय हाल में हैं। इसका मार्मिक चित्रण मुल्लैतिवू गए पत्रकारों ने अपनी रिपोर्टों में किया है। मुल्लैतिवू में ज्यादातर तमिल आबादी ही है। पेट्रोलियम के घोर संकट के कारण यहां के लोगों की जिंदगी ठहर गई है और उनकी आमदनी के स्रोत सूख गए हैं। केरोसीन न मिलने के कारण काफी समय से वे अपनी नौकाओं को लेकर मछली मारने समुद्र में नहीं जा पाए हैं।
जिस समय कोलंबो में हजारों सरकार विरोधी आंदोलनकारी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री निवास में घुसे, मुल्लैतिवू में चारों ओर भूख और अंधकार की कहानियां बिखरी हुई थीं। ब्लैक मार्केट में केरोसीन इतना महंगा है कि यहां के मछुआरों के लिए उसे खरीदना संभव नहीं है। इसलिए उनकी नौकाएं किनारों पर खड़ी हैं। नतीजा मछली की महंगाई के रूप में भी सामने आया है। जबकि मछली यहां के भोजन का नियमित हिस्सा है। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक यहां मछली साढ़े पांच सौ रुपये (भारतीय मुद्रा में) किलो से भी ज्यादा के भाव पर बिक रही है। उस क्षेत्र के बाशिंदों ने पत्रकारों को बताया कि महंगाई के कारण वे लोग रोज सिर्फ एक बार ही खाना खा पा रहे हैं।
विश्लेषकों के मुताबिक मुल्लैतिबू श्रीलंका की आम हालत का एक आईना है। मुल्लैतिवू जैसी स्थिति ही देश के ज्यादातर हिस्सों में हैं। विदेशी मुद्रा की कमी के कारण श्रीलंका पेट्रोलियम सहित तमाम जरूरी चीजों का आयात नहीं कर पा रहा है। इस कारण आम जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है।
जाफना यूनिवर्सिटी में राजनीतिक-अर्थशास्त्र के प्रोफेसर अहिलन कादिरगमर ने वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम से बातचीत में कहा- ‘अर्थव्यवस्था तो पूरी तरह ठहर चुकी है। लोगों के पास रोजगार के कोई विकल्प नहीं हैं। एक तरफ रोजमर्रा की जिंदगी की लागत बढ़ रही है, वहीं लोगों की आमदनी खत्म होती जा रही है।’ जून में श्रीलंका में मुद्रास्फीति की दर 54.6 फीसदी रही। यह एक रिकॉर्ड है। इसके पहले मई में भी महंगाई दर का रिकॉर्ड बना था, जब ये दर 39.1 फीसदी दर्ज हुई थी। अगर खाने-पीने की चीजों की महंगाई दर पर गौर करें, तो जून में यह 80.1 फीसदी रही।
मछली उद्योग का श्रीलंका के सकल घरेलू उत्पाद में योगदान 2.7 फीसदी है। इस कारोबार से लगभग छह लाख लोगों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रोजगार मिला हुआ था। चार जिलों- मुल्लैतिवू, जाफना, मन्नार और किलिनोच्चि- में 50 हजार से ज्यादा मछुआरे परिवार हैं। इन जिलों में लगभग 15 हजार मछली मारने में काम आने वाली नौकाएं हैं। समुद्र में जाकर शाम तक वापस लौटने के लिए प्रति दिन एक नौका में 20 लीटर केरोसीन डालना पड़ता है। एक समय केरोसीन 88 श्रीलंका रुपये प्रति लीटर था। आज यह ब्लैक मार्केट में 400 से 500 रुपये प्रति लीटर बिक रहा है।
वेबसाइट निक्कई एशिया ने मुल्लैतिवू के मजदूर तिरुकुनाबलासिंघम अमृताथसन की दुख भरी कहानी छापी है। इसके मुताबिक इस श्रमिक ने पिछले दो महीने से कुछ भी नहीं कमाया है। वे मछली मारने के जाल को समेटने का काम करते थे। इससे वे तीन से चार सौ रुपये (भारतीय मुद्रा) प्रति दिन कमा लेते थे। गृह युद्ध के समय उन्हें अपना एक पांव गंवाना पड़ा था। लेकिन अब उनका कहना है- ‘गृह युद्ध के दिनों में हमें भीख मांग कर कभी नहीं खाना पड़ा, जैसा अब करना पड़ रहा है।’