श्रीलंका में मध्य वर्ग तबाही झेल रहा है। बड़ी संख्या में इस तबके के लोगों की आजीविका चली गई है। उनकी वर्षों से की गई बचत खत्म हो गई है। इससे अब तक आराम की जिंदगी जीने वाले इस वर्ग की स्थिति गरीब समूहों जैसी होती जा रही है।
विशेषज्ञों के मुताबिक मध्य वर्ग की जीवन शैली पर सबसे ज्यादा मार तेजी से बढ़ी महंगाई से पड़ी है। साल भर में चावल, सब्जी और अन्य खाद्य पदार्थ 30 फीसदी ज्यादा महंगे हो गए हैं। अमेरिका की पेंसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के मुताबिक मार्च 2020 से मार्च 2022 के बीच श्रीलंका में पौष्टिक खाद्य 33 फीसदी तक महंगे हो चुके हैं। नतीजा यह है कि जिन बाजारों में आमतौर पर चहल-पहल रहती थी, आज वहां सन्नाटा बिखरा नजर आता है।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक श्रीलंका का मध्य वर्ग ही पहले राजपक्षे परिवार का सबसे बड़ा समर्थक था। लेकिन आज इस तबके में राष्ट्रपति गोतबया राजपक्षे और प्रधानमंत्री महिंद राजपक्षे को लेकर जबरदस्त गुस्सा देखने को मिल रहा है। मध्य वर्गीय चर्चाओं में ये आरोप आमतौर पर लगाया जाता है कि राजपक्षे शासन के गलत वित्तीय निर्णयों और भ्रष्टाचार के कारण आज देश कंगाली के कगार पर पहुंच गया है।
श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटबया राजपक्षे 2019 में भारी बहुमत से राष्ट्रपति चुने गए थे। उसके पहले उसी साल ईस्टर के मौके पर देश में भयानक आतंकवादी हमले हुए थे। उससे बने माहौल के बीच राजपक्षे ने देश की बहुसंख्यक सिंहली बौद्ध आबादी की सुरक्षा मजबूत करने का वादा किया था। लेकिन आर्थिक मोर्चे पर उनका प्रशासन पूरी तरह नाकाम रहा। इसी बीच कोरोना महामारी आ गई, जिससे पर्यटन ठप हो गया। उसका श्रीलंका के विदेशी मुद्रा भंडार में बहुत खराब असर पड़ा।
कोलंबो स्थित थिंक टैंक वेरिटे रिसर्च के कार्यकारी निदेशक निशान डि मेल ने कहा- ‘अगर श्रीलंका सरकार अपनी क्रेडिट रेटिंग को सुधारने के लिए जरूरी कदम नहीं उठा पा रही थी, उसे कर्ज चुकाने का कार्यक्रम फिर से तय करना चाहिए था। लेकिन सरकार ने इन दोनों में से कोई कदम नहीं उठाया। अब हमको उसके नतीजे भुगतने पड़ रहे हैं। इस हाल का एक असर महंगाई के रूप में सामने आया है, जिसका असर मध्य वर्ग पर भी पड़ा है। दूसरा असर चीजों का अभाव है, जिससे पूरी आबादी प्रभावित हुई है।’