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Sri Lanka: सरकार विरोधी आंदोलनकारियों पर आतंकवाद निरोधक कानून के तहत कार्रवाई

Wed, 24 Aug 2022 03:19 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कोलंबो

सार

Sri Lanka: एक सरकारी अधिकारी ने कहा- ‘सिर्फ बम या बंदूक लाना या लोगों की हत्या करना ही आतंकवाद नहीं होता है। डराना-धमकाना, सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट करना, घरों को जलाना आदि भी आतंकवाद की परिभाषा के तहत ही आता है।’
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Sri Lanka - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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श्रीलंका में अलगाववाद का मुकबला करने के लिए बनाए गए आतंकवाद निरोधक कानून (पीटीए) का अब रानिल विक्रमसिंघे सरकार अरागलया (सरकार विरोधी आंदोलन) से जुड़े रहे कार्यकर्ताओं के खिलाफ खुल कर इस्तेमाल कर रही है। ये कानून इतना सख्त है कि 2010 में इस पर अपना विरोध जताने के लिए यूरोपियन यूनियन ने श्रीलंका को कारोबार में मिलने वाली रियायतें कुछ समय के लिए रोक दी थीं।   

आलोचकों ने कहा है कि इस कानून के अंदर अपराध की परिभाषा इतनी अस्पष्ट है कि सरकार विरोधी कोई भी गतिविधि के खिलाफ इसका इस्तेमाल संभव हो जाता है। जिन नागरिकों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनों में हिस्सा लिया, उन पर इसका इस्तेमाल किया गया है।

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श्रीलंका में अरागलया की शुरुआत इस वर्ष मार्च में हुई। महंगाई और जरूरी चीजों के अभाव के विरोध में तब हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतरे। तब आंदोलन को श्रीलंका की आजादी के बाद सबसे बड़ा शांतिपूर्ण प्रतिरोध बताया गया था। लेकिन इस दौरान छिटपुट हिंसा हुई। बड़े पैमाने पर हिंसा की पहली घटना मई में हुई, जब गोटा गो गामा (गोटाबया राजपक्षे अपने घर जाओ) प्रतिरोध स्थल पर मौजूद प्रदर्शनकारियों पर पूर्व राष्ट्रपति गोटाबया राजपक्षे के समर्थकों ने हमला कर दिया। उसके जवाब में प्रदर्शनकारियों ने भी कई वाहनों और सांसदों के घरों पर हमला किया। सत्ताधारी दल के एक सांसद की इस दौरान मौत हो गई।

जुलाई में तत्कालीन प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे के निजी आवास को प्रदर्शनकारियों ने जला दिया। फिर वे राष्ट्रपति सचिवालय, प्रधानमंत्री कार्यालय और राष्ट्रपति निवास घुस गए। वहां उन्होंने कई दिन तक कब्जा जमाए रखा। अब इन सभी मामलों में मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं। कथित दोषी लोगों की पहचान के लिए सरकार ने मुहिम छेड़ रखी है।

एक सरकारी अधिकारी ने वेबसाइट इकॉनमीनेक्स्ट.कॉम से बातचीत में कहा- ‘सिर्फ बम या बंदूक लाना या लोगों की हत्या करना ही आतंकवाद नहीं होता है। डराना-धमकाना, सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट करना, घरों को जलाना आदि भी आतंकवाद की परिभाषा के तहत ही आता है।’ इस कानून के तहत जिन लोगों को नोटिस जारी किए गए हैं, उनमें इंटर यूनिवर्सिटी स्टूडेंड्स फेडरेशन के संयोजक वसंता मुदालिगे, इंटर यूनिवर्सिटी भिक्खु फेडरेशन के संयोजक गलवेवा सिरिधम्मा थेरो, और केलानिया यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन के सदस्य हशंता जावांता गुनाथिलके भी हैं।

पीटीए 1978 में बना था। हाल के वर्षों में इसका छिटपुट इस्तेमाल ही हुआ है। 2019 में ईस्टर संडे को हुए बम धमाकों के बाद इसका इस्तेमाल किया गया। लेकिन अब इस कानून को राजपक्षे सरकार के खिलाफ चार महीने तक चले आंदोलन में शामिल हुए कार्यकर्ताओं के खिलाफ किया जा रहा है। जबकि अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार संस्थाएं लगातार सरकार से अनुरोध कर रही हैं कि इन कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार ना किया जाए। संयुक्त राष्ट्र के स्पेशल रैपोटियर ऑन ह्यूमन राइट्स डिफेंडर्स मेरी लॉलोर ने इस बारे में राष्ट्रपति विक्रमसिंघे को पत्र लिखा है।

मानव अधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा है- ‘प्रदर्शनकारियों की मनमानी गिरफ्तारी और उन पर गंभीर आरोप में मुकदमे दर्ज करना उचित नहीं है। उन पर आतंकवाद से संबंधित आरोप लगाना अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है।’

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