वैश्विक महामारी (Pandemic) कोरोना वायरस (Coronavirus) से आज दुनियाभर के देश परेशान हैं। सभी अपनी तरफ से इस महामारी से निपटने की हर संभव कोशिश में लगे हुए हैं। अमेरिका इसके इलाज के लिए तरह-तरह के प्रयोग कर रहा है। इस बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कुछ दिनों में कोरोना संक्रमण के मामले 10 लाख हो जाएंगे और मौतों का आंकड़ा 50,000 तक पहुंच जाएगा। इस तरह की महामारी कोई पहली बार नहीं हुई है। 100 साल पहले भी विश्व इसी तरह की महामारी का दंश झेल चुका है। 1918-1919 में भी इसी तरह के हालात पैदा हो गए थे जब स्पैनिश फ्लू (Spanish Flu) महामारी बनकर उभरा था।
खासतौर पर बॉम्बे प्रेजिडेंसी में तेजी से फैलने के बाद इस वायरस ने उत्तर और पूर्व में सबसे ज्यादा तांडव मचाया था। जिस तरह करोना का इलाज करने वाले डॉक्टर्स इस बीमारी से संक्रमित हो रहे हैं उसी तरह उस वक्त भी ऐसी खबरें भी आईं कि मदद करने वाली नर्सें खुद फ्लू का शिकार हो गई थीं।
उस समय के तमाम अखबारों में विज्ञापन देकर स्वच्छता के लिए हाथ धोना सिखाया गया था। अखबारों में हाथ धोने के विज्ञापन थे। सड़कों पर पोस्टर लगाकर बताया गया कि वायरस से कैसे बचें। मास्क न पहनने पर जेल जाने तक का नियम बना था। महामारी की यही स्थिति आज फिर कोविड-19 में है। नर्सों की भर्ती निकली थी। सोशल डिस्टेंसिंग की सलाह दी गई थी।
अमेरिकन सोसाइटी ऑफ साइटोपैथोलॉजी के जर्नल में प्रकाशित शोध के मुताबिक कई अमेरिकी शहर में मृत्यु दर में 30 से 50 फीसदी कमी आई। क्योंकि यहां पर एहतियातन कदम फ्लू फैसने के साथ ही उठाए गए। वहीं, उन शहरों में मौतें ज्यादा हुई, जहां पर बाद में लॉकडाउन किया गया या फिर बाद में बंदी जैसे एहतियाती कदम उठाए गए।