अमेरिका के निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन के प्रशासन का चीन के प्रति कैसा रुख होगा, इसको लेकर दुनिया भर में कयास लगाए जा रहे हैं। क्या वे डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की तरह चीन के खिलाफ बेहद सख्त रुख अपनाएंगे, या कूटनीति के जरिए मतभेदों को हल करने की कोशिश करेंगे, इस सवाल पर अमेरिका-चीन संबंध के विशेषज्ञों ने अनुमान लगाने की कोशिश की है। इन्हीं मुद्दों पर मंगलवार को यहां एक कांफ्रेंस में भी अनेक विशेषज्ञों ने अपनी राय जताई।
इस वर्चुअल कांफ्रेंस का आयोजन यहां के प्रतिष्ठित अखबार साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की तरफ से किया गया। इसमें एक प्रमुख राय यह उभरी कि जो बाइडन को तब तक चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से निजी मुलाकात नहीं करनी चाहिए, जब तक चीन अपना आचरण नहीं सुधार लेता है। इसके बदले बाइडन को अमेरिका के सहयोगी देशों के साथ रिश्ते सुधारने पर ध्यान देना चाहिए, जो ट्रंप के कार्यकाल में कमजोर हो गए हैं।
सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के निदेशक बॉनी ग्लेसर ने कहा कि चीन यह मानकर चल रहा है कि अमेरिका कमजोर हो रहा है। वह अपने क्षय काल में है। इसलिए जो बाइडन को अपने कार्यकाल के आरंभिक दिनों में शी से मुलाकात नहीं करनी चाहिए, क्योंकि उससे चीन की ये राय और पक्की होगी। इसके बदले शी से मुलाकात के पहले बाइडन को अपने देश की समस्याएं सुलझाने, सहयोगी देशों से अमेरिका के रिश्तों में नई जान फूंकने और दुनिया में अमेरिकी प्रतिष्ठा बहाल करने पर ध्यान देना चाहिए।
जो बाइडन अगली 20 जनवरी को अमेरिका के राष्ट्रपति का पद संभालेंगे। ऐसी संभावना जताई जाती रही है कि देश में चीन विरोधी भावना के बावजूद वे चीन से अमेरिका की बातचीत जल्द से जल्द शुरू करने को तरजीह देंगे। बाइडेन ने एंथनी ब्लिंकेन को अपना विदेश मंत्री और जेक सुलिवान को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनाया है। दोनों चीन से बातचीत शुरू करने के समर्थक बताए जाते हैं। हालांकि उनकी हालिया टिप्पणियों से ये संदेश भी मिला है कि अब वे चार साल पहले की तुलना में चीन को अमेरिकी हितों के लिए कहीं ज्यादा बड़ा खतरा मानते हैं।
बराक ओबामा प्रशासन में पूर्वी एशिया मामलों में सलाहकार के तौर पर काम कर चुके डैनियल रुसेल ने कांफ्रेंस में कहा कि हाल के वर्षों में अमेरिका और चीन दोनों ने एक दूसरे प्रति के अपने रुख सख्त कर लिए हैँ। लेकिन उन्होंने कहा कि चीन के व्यवहार के कारण ही अमेरिका में उसके प्रति अविश्वास का माहौल बना है। इसलिए चीन को दूसरे देशों और पक्षों की बातों को सुनना चाहिए। उसे कम्युनिस्ट पार्टी के इको चैंबर (ऐसे माहौल में जहां सिर्फ मनपसंद बातें की जाती हैं) में नहीं घिरा रहना चाहिए।
जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के चीन नीति कार्यक्रम के निदेशक डेविड शैमबाऊ ने कहा कि एक मात्र देश जो चीन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पराया बना सकता है, वो खुद चीन है। उन्होंने कहा कि चीन दुनिया भर में अपने हाथ-पांव फैला रहा है। इसकी वजह से वह अपने लिए आलोचना और प्रतिरोध को आमंत्रित कर रहा है।
विशेषज्ञों ने कहा कि अमेरिका-चीन तनाव बढ़ने के बावजूद यह कल्पना करना अभी भी मुश्किल है कि दोनों देश आपस में बातचीत रोक देंगे। ग्लेसर ने सुझाव दिया अमेरिका को कामकाजी स्तर की बातचीत की पेशकश करनी चाहिए। संभवतया ऐसा व्यापार के मामले में किया जा सकता है। रुसेल ने कहा कि दोनों देशों के बीच बातचीत के रास्ते खुले ना हों, यह सोचना कठिन है। उन्होंने कहा कि ऐसा होना खतरनाक होगा, क्योंकि इसका मतलब होगा समस्याओं का बढ़ते और स्थितियों का बिगड़ते चले जाना।
वॉशिंगटन स्थित ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन के निदेशक चेंग ली ने कहा कि बाइडेन के राष्ट्रपति बनने के बाद उनकी तुरंत शी के साथ शिखर वार्ता परिपक्व कदम नहीं होगा। उन्होंने कहा कि इससे ज्यादा कुछ हासिल नहीं होगा, क्योंकि अमेरिका में अभी राजनीतिक माहौल चीन के खिलाफ है।