दो प्रांतों में चुनाव की तारीख के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से पहले ही शहबाज शरीफ सरकार ने सर्वोच्च न्यायपालिका पर हमला बोल दिया। शऱीफ सरकार और सत्ताधारी गठबंधन पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) ने बीते कुछ हफ्तों से सुप्रीम कोर्ट को सीधे निशाने पर ले रखा है। खास कर चीफ जस्टिस उमर अता बंदियाल उनके निशाने पर रहे हैं।
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि पंजाब और खैबर पख्तूनवा में प्रांतीय असेंबली चुनाव की तारीख को लेकर चल रहे विवाद पर अदालत मंगलवार को फैसला सुनाएगी। सोमवार रात शरीफ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार को उनके पद से हटाने का फैसला कर लिया। पीडीएम ने हाल में सुप्रीम कोर्ट के जजों में विभाजन कराने की रणनीति अपनाई है। इसके तहत सरकार जज काजी फायेज इसा के पक्ष में खड़ी हुई है। इसा ने चुनाव की तारीख के मामले में अपनी पहल पर दखल देने के न्यायमूर्ति बंदियाल के निर्णय पर सवाल उठाया था। अब सरकार ने कहा है कि रजिस्ट्रार इशरत अली ने न्यायमूर्ति इसा के एक आदेश का पालन नहीं किया था। इस वजह से उन्हें अपने पद से हटाया जा रहा है।
चुनाव तारीख के मामले में सुनवाई के दौरान जस्टिस बंदियाल ने कई कड़ी टिप्पणियां की थीं। सोमवार को प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने उन टिप्पणियों की सार्वजनिक आलोचना की। चीफ जस्टिस ने कहा था- ‘आज अगर आप संसद में जाएं, तो वहां ऐसे लोग संसद को संबोधित करते नजर आएंगे, जो कल तक जेल में थे और जो घोषित गद्दार हैँ। अब उन्होंने वहां कब्जा जमा लिया है। उनका सम्मान किया जा रहा है, क्योंकि वे जन प्रतिनिधि हैं।’
सोमवार को संसद में शहबाज शरीफ ने इस टिप्पणी पर कड़ा एतराज जताया। इसके एक दिन पहले पाकिस्तान सरकार ने संसद में वह बिल पेश कर दिया था, जिसके जरिए अपनी पहल पर किसी मामले में दखल देने के चीफ जस्टिस के अधिकार को खत्म करने का प्रावधान है। सोमवार को पीडीएम की कई बैठकें हुईं, जिनमें चुनाव तारीख मामले में संभावित फैसले पर विचार किया गया। इसमें निर्णय लिया गया कि तीन जजों की बेंच अगर तुरंत चुनाव कराने का आदेश देती है, तो उसे स्वीकार नहीं किया जाए। इस तरह शहबाज शरीफ सरकार ने न्यायपालिका को सीधी चुनौती देने का मन बनाया है।
पीडीएम में शामिल दलों ने बेंच में शामिल जजों न्यायमर्ति बंदियाल, जस्टिस एजाजुल अहसान और जस्टिस मुनीब अख्तर में अपने अविश्वास का इजहार किया। पीडीएम ने ध्यान दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट के कई जजों ने इस मामले की सुनवाई रोकने की मांग की थी।
अखबार एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि इस मुद्दे पर जजों के बीच पैदा हुए मतभेद का सत्ताधारी गठबंधन ने फायदा उठाने की रणनीति बनाई है।
पीडीएम की बैठक में गठबंधन में शामिल सभी दलों के बड़े नेता शामिल हुए। उन्होंने असहमत जजों की राय को प्रचारित करने और तीन जजों की बेंच का प्रतिकूल फैसला आने पर उसे ना मानने की वकालत की। विश्लेषकों के मुताबिक इससे पाकिस्तान में असामान्य स्थिति पैदा हो गई है। न्यायपालिका राजनीतिक आधार बंटी दिख रही है, जबकि सरकार खुलेआम न्यायपालिका में हस्तक्षेप करते हुए उसके अधिकार क्षेत्र को चुनौती दे रही है।