SCO Summit 2022: Shahbaz Sharif with Vladimir Putin
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पाकिस्तान के अखबारों में ये खबर प्रमुखता से छपी है कि समरकंद में द्विपक्षीय मुलाकात के दौरान रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के सामने पाकिस्तान को प्राकृतिक गैस और कच्चा तेल बेचने की पेशकश की। पाकिस्तान में शरीफ की सरकार बनने के बाद से पेट्रोलियम पदार्थों के दाम अभूतपूर्व रूप से बढ़े हैं। इसके बीच पुतिन की ये पेशकश राहत पहुंचाने वाली खबर है। लेकिन यहां इस सवाल पर कयास ये लगाए जा रहे हैं कि क्या शहबाज शरीफ के नेतृत्व वाली पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) सरकार इस पेशकश को स्वीकार करेंगी?
रूस से तेल या गैस खरीदना इस वक्त अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में विवादास्पद फैसला माना जा रहा है। अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों का दुनिया भर के देशों पर दबाव बना हुआ है कि वे रूस के साथ ऐसा व्यापारिक संबंध ना बनाएं। शहबाज शरीफ ने प्रधानमंत्री बनने के बाद अमेरिका से रिश्ते सुधारने की खास कोशिश की है। इसका उन्हें फायदा भी हुआ है। हाल ही में अमेरिका ने पाकिस्तान को एफ-16 लड़ाकू विमानों के पुर्जे देने का एलान किया है। समझा जाता है कि उसने पाकिस्तान के लिए आईएमएफ से कर्ज मंजूर करवाने में भी मदद की।
बताया जाता है कि पाकिस्तान का एस्टैबलिशमेंट (सेना और खुफिया नेतृत्व) भी अमेरिका से अच्छे संबंध रखने का पक्षधर है। ये चर्चा रही है कि पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के साथ एस्टैबलिशमेंट के संबंध जिन कारणों से बिगड़े, उनमें एक खान की अमेरिका विरोधी नीति भी थी।
इस पृष्ठभूमि को देखते हुए पर्यवेक्षकों की राय है कि रूस से पेट्रोलियम खरीदने का फैसला करना शरीफ सरकार के लिए बेहद मुश्किल होगा। लेकिन अगर ऐसा फैसला नहीं हुआ, तो देश की जनता में असंतोष भड़क सकता है। पहले से ही महंगाई की पड़ रही मार के कारण शरीफ सरकार की अलोकप्रियता बढ़ती चली गई है। इमरान खान ने इस मुद्दे पर पीडीएम सरकार को घेर रखा है। भारत सरकार के रूस से सस्ता तेल खरीदने का उदाहरण देकर वे आरोप लगाते रहे हैं कि पाकिस्तान की ‘आयातित’ सरकार ने अमेरिका परस्त नीतियों के कारण अपनी जनता को मुसीबत में डाल रखा है।
शहबाज शरीफ शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की शिखर बैठक में हिस्सा लेने के लिए उज्बेकिस्तान के शहर समरकंद गए हैं। पाकिस्तान इस संगठन का पूर्ण सदस्य है। समरकंद में शहबाज शरीफ की ईरान के राष्ट्रपति सईद इब्राहिम रईसी से भी मुलाकात हुई। रूस की तरह ही ईरान से भी अमेरिका के संबंध तनावपूर्ण हैं। विश्लेषकों के मुताबिक इस बार एससीओ की शिखर बैठक पर दुनिया भर के देशों की खास नजर है। पश्चिमी देशों में इसे अमेरिका और यूरोप विरोधी लामबंदी के मंच के रूप में देखा जा रहा है। टीकाकारों का अनुमान है कि इस वजह से समरकंद में शहबाज शरीफ के कार्यक्रम पर अमेरिका की खास नजर होगी।
गुरुवार को समरकंद के लिए रवाना होने से पहले शरीफ ने एक ट्विट में ‘शंघाई भावना’ के प्रति पाकिस्तान की वचनबद्धता दोहराई। उन्होंन कहा- ‘दुनिया में आर्थिक उथल-पुथल के कारण एससीओ के सदस्य देशों में अधिक सहयोग जरूरी हो गया है। एससीओ दुनिया की 40 फीसदी आबादी की आकांक्षाओं का नुमाइंदा है।’ इस बीच यहां कयास लगाए जा रहे हैं कि समरकंद से लौटने के बाद शहबाज शरीफ के लिए घरेलू आकांक्षाओं और पश्चिमी कूटनीतिक अपेक्षाओं के बीच संतुलन बैठाने की चुनौती और कठिन हो जाएगी।