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आकार बदल इम्यूनिटी को धोखा दे रहा बहुरूपिया वायरस, वैज्ञानिकों को रहस्य के बारे में चला पता

अमर उजाला रिसर्च टीम, लंदन  Published by: अवधेश कुमार Updated Wed, 29 Jul 2020 05:25 AM IST
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कोरोना वायरस - फोटो : अमर उजाला
कोविड-19 के स्पाइक-प्रोटीन जिसे कोरोना कहते हैं। इसी से बीमारी फैलती है। अब उसके रहस्य के बारे में वैज्ञानिकों को एक नई जानकारी पता चली है जो हाल ही साइंस जर्नल में प्रकाशित हुई है।

वैज्ञानिकों ने जो देखा है उसके अनुसार वायरस जब मनुष्य की कोशिकाओं के संपर्क में आता है तो स्पाइक प्रोटीन अपना आकार बालों में लगने वाली हेयरपिन जैसा कर लेता है। वैज्ञानिकों का दावा है वायरस के इस नए रूप के बारे में पता चलने से वैक्सीन के निर्माण में लगे वैज्ञानिकों को मदद मिल सकती है। 


स्पाइक प्रोटीन एस-2 रिसेप्टर को जकड़ती है

वैज्ञानिकों की भाषा में स्पाइक प्रोटीन कोरोना वायरस की सतह पर मिलने वाली प्रोटीन है जो कांटे जैसी दिखती है। वायरस के संपर्क में आने वाले व्यक्ति पर यही स्पाइक प्रोटीन उसकी एस-2 रिसेप्टर कोशिकाओं को जकड़ लेती है और भीतर घुसकर अपना कुनबा बढ़ाना शुरू कर देती है। बॉस्टन चिल्ड्रेन हॉस्पिटल के डॉ. बिंग चेन ने क्रायोजेनिक इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी के जरिए वायरस के स्पाइक प्रोटीन को मनुष्य की कोशिका में चिपकने से पहले और बाद के आकार को फ्रीज कर ये दावा किया है कि कैसे वो शरीर में अधिक आक्रामक होने के लिए वायरस अपना आकार बदलता है।
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कोरोना वायरस - फोटो : अमर उजाला
कोविड-19 के स्पाइक-प्रोटीन जिसे कोरोना कहते हैं। इसी से बीमारी फैलती है। अब उसके रहस्य के बारे में वैज्ञानिकों को एक नई जानकारी पता चली है जो हाल ही साइंस जर्नल में प्रकाशित हुई है।

वैज्ञानिकों ने जो देखा है उसके अनुसार वायरस जब मनुष्य की कोशिकाओं के संपर्क में आता है तो स्पाइक प्रोटीन अपना आकार बालों में लगने वाली हेयरपिन जैसा कर लेता है। वैज्ञानिकों का दावा है वायरस के इस नए रूप के बारे में पता चलने से वैक्सीन के निर्माण में लगे वैज्ञानिकों को मदद मिल सकती है। 

स्पाइक प्रोटीन एस-2 रिसेप्टर को जकड़ती है

वैज्ञानिकों की भाषा में स्पाइक प्रोटीन कोरोना वायरस की सतह पर मिलने वाली प्रोटीन है जो कांटे जैसी दिखती है। वायरस के संपर्क में आने वाले व्यक्ति पर यही स्पाइक प्रोटीन उसकी एस-2 रिसेप्टर कोशिकाओं को जकड़ लेती है और भीतर घुसकर अपना कुनबा बढ़ाना शुरू कर देती है। बॉस्टन चिल्ड्रेन हॉस्पिटल के डॉ. बिंग चेन ने क्रायोजेनिक इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी के जरिए वायरस के स्पाइक प्रोटीन को मनुष्य की कोशिका में चिपकने से पहले और बाद के आकार को फ्रीज कर ये दावा किया है कि कैसे वो शरीर में अधिक आक्रामक होने के लिए वायरस अपना आकार बदलता है।

एस-2 रिसेप्टर से चिपकने के बाद भी आकार में अंतर

वैज्ञानिक उस वक्त हैरान रह गए जब उन्होंने एस-2 रिसेप्टर से चिपकने के बाद भी हेयरपीन आकार में बदलाव देखा। वायरस आकार बदलने के बाद भी वो पहले जैसा दिख रहा था वो भी बिना किसी कोशिका को अपनी चपेट में लिए बिना। इसका मतलब है कि स्पाइक पुराने रूप में भी शरीर में प्रवेश कर सकता है। 

डॉ. चेन का मानना है कि वायरस के आकार बदलने की क्षमता के कारण ही उसे तोड़ पाना मुश्किल है। ऐसा कई अध्ययनों में पता चला है कि वायरस कई तरह की सतह पर कुछ समय तक रह सकता है और ये उसके आकार बदलने की क्षमता से ही संभव है। इसी का नतीजा हो सकता है कि वो मनुष्य की शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता से भी अपना बचाव कर लेता हो।

स्पाइक प्रोटीन को स्थिर करना होगा

डॉ. चेन के अनुसार कोरोना की किसी दवा या वैक्सीन को असरदार बनाना है तो स्पाइक प्रोटीन को स्थिर करना होगा जिससे वे अपने आकार में बदलाव न कर सके। अगर प्रोटीन को स्थिर नहीं किया जाएगा तो वैक्सीन के जरिए जो एंटीबॉडीज दी जाएंगी वो उतनी असरदार नहीं होगी जितनी उम्मीद की जाएगी और वायरस को रोकने में वो सफल नहीं हो पाएगी। ऐसे में वैक्सीन पर काम कर रहे वैज्ञानिकों को इस ओर ध्यान देना होगा क्योंकि वायरस के स्पाइक प्रोटीन में बहुत से राज छिपे हैं।
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