सऊदी अरब पर यमन के हूती हमलों के बीच 'मक्का समझौता' सवालों के घेरे में है। जानिए तुर्किये और परमाणु शक्ति संपन्न पाकिस्तान क्यों सऊदी की सैन्य मदद के लिए आगे नहीं आ रहे हैं।
यमन के विद्रोही- हूती संगठन की तरफ से सऊदी अरब पर लगातार हमले बोले जा रहे हैं। आलम यह है कि बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन्स के भीषण हमलों से सऊदी अरब के कई अहम ऊर्जा ढांचों, हवाई अड्डों और यानबू शहर के बंदरगाह के करीब लाल सागर (रेड सी) में वाणिज्यिक तेल टैंकरों को भारी नुकसान पहुंचा है। सऊदी अरब की तरफ से भी इन हमलों का जवाब देने की भरपूर कोशिश की जा रही है। हालांकि, हूतियों की ताकत के आगे फिलहाल सऊदी की रणनीति काम करती नहीं दिख रही।
विज्ञापन
इस बीच पूरी दुनिया में एक ही सवाल गूंज रहा है। वह यह कि एक महीने पहले सऊदी अरब के नेतृत्व में तीन इस्लामिक देशों के बीच एक-दूसरे के बचाव के लिए जो मक्का समझौता हुआ था, उसका क्या हुआ? क्यों इस समझौते के तहत सऊदी के साथ गठबंधन बनाने वाले पाकिस्तान और तुर्किये अब उसकी मदद के लिए आगे नहीं आ रहे हैं? एक परमाणु शक्ति होने के बावजूद पाकिस्तान क्यों सिर्फ धमकियों तक ही सीमित रह गया? उसके किस नेता ने क्या कहा है? आइये जानते हैं...
पहले जानें- सऊदी-हूतियों की जंग में हो क्या रहा है?
सऊदी अरब पर हूती विद्रोहियों का हमला।
- फोटो : अमर उजाला
हूतियों ने सऊदी अरब पर इन हमलों को उत्तर-पश्चिमी यमन में सऊदी हवाई हमलों के जवाब में की गई कार्रवाई बताया है।
सऊदी अरब की तरफ से पलटवार भी जारी।
- फोटो : अमर उजाला
सऊदी अरब पर हुए इन हमलों और लाल सागर में नौवहन बाधित होने का असर यह हुआ कि दुनियाभर में कच्चे तेल की आपूर्ति पर डर बैठ गया और यह $100 के पार चला गया।
अगर सऊदी पर हमले में भारी तबाही तो मक्का समझौते के साथी कहां?
गौरतलब है कि सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच बीते महीने मक्का समझौता हुआ था। जब इस डील पर हस्ताक्षर हुए थे, तब दावा किया गया था कि यह पश्चिमी देशों के संगठन- नाटो (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन) की तरह ही होगा। यानी मक्का समझौते में शामिल किसी एक देश पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा और वे एक-दूसरे के बचाव के लिए आगे आएंगे।
हालांकि, इस समझौते के सामने पहला परीक्षण एक महीने में ही सामने आ गया। इसके बावजूद न तो पाकिस्तान और न ही तुर्किये की तरफ से सऊदी को कुछ सैन्य मदद भेजी गई है।
मक्का रक्षा समझौता।
- फोटो : अमर उजाला
पाकिस्तान क्यों नहीं कर रहा सऊदी की मदद, क्या मजबूरी?
1. संसद में बना कानून है मजबूरी
पाकिस्तान के मक्का समझौते के बावजूद सऊदी की मदद न कर पाने की एक बड़ी वजह उसके कुछ पुराने कानून हैं, जिनमें अब तक बदलाव नहीं कराया जा सका है।
2015 में पाकिस्तान की संसद- मजलिस-ए-शूरा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर यमन संघर्ष में पूरी तरह तटस्थ रहने का आदेश दिया था।
यानी पाकिस्तान तब तक यमन के हूतियों को निशाना नहीं बना सकता, जब तक संसद कानून को न पलट दे या सरकार खुद संसदीय जनादेश का उल्लंघन कर दे।
पाकिस्तान की कूटनीति के तहत भी उसकी सेना युद्ध में तब तक नहीं उतर सकती, जब तक सऊदी पर कोई बड़ा पारंपरिक हमला न हो जाए।
इसके अलावा मुस्लिमों के पावन धार्मिक स्थल मक्का और मदीना पर कोई अस्तित्व से जुड़ा खतरा होने पर भी पाकिस्तानी सेना संघर्ष में कूद सकती है।
2. ईरान से रिश्ते भी आ रहे सऊदी की मदद के आड़े
यमन के हूती विद्रोही असल में शिया समुदाय से आते हैं, जो कि देश में सऊदी अरब की ओर से स्थापित की गई सुन्नी सरकार के खिलाफ जंग छेड़ रहे है। चूंकि ईरान एक शिया बहुल देश है, ऐसे में यमन की सुन्नी सरकार के खिलाफ वह हूती विद्रोहियों को कूटनीतिक और आर्थिक मदद मुहैया कराता रहा है।
पाकिस्तान की ईरान के साथ करीब 900 किलोमीटर लंबी संवेदनशील सीमा है। ऐसे में ईरान-समर्थित हूतियों के खिलाफ सीधी सैन्य कार्रवाई से तेहरान के साथ संबंध बिगड़ने और पश्चिमी सीमा पर नया तनाव पैदा होने का जोखिम है।
इतना ही नहीं पाकिस्तान में भले ही सुन्नी समुदाय का आबादी में वर्चस्व है, लेकिन यहां जनसंख्या में शियाओं की हिस्सेदारी भी करीब 15 से 20 फीसदी है। ऐसे में हूती विद्रोहियों पर कार्रवाई देश में ही मौजूद शिया समुदाय को नाराज कर सकती है और पाकिस्तान में अंदरूनी तनाव और सांप्रदायिक हिंसा बढ़ने का खतरा पैदा हो सकता है।
मक्का रक्षा समझौता।
- फोटो : अमर उजाला
3. पाकिस्तान के घरेलू हालात भी खराब
पाकिस्तान की सेना पहले से ही अपनी पूर्वी सीमा पर भारत के खिलाफ साजिश रचने, पश्चिमी सीमा पर अफगानिस्तान का सामना करने और घरेलू आतंकवाद से निपटने की कोशिश कर रहा है। साथ ही उसकी अर्थव्यवस्था भी लगातार संकट में बनी हुई है, जिससे उसकी युद्ध लड़ने की क्षमताएं सीमित हैं।
तुर्किये के एक अधिकारी के मुताबिक, मक्का समझौता साफ तौर पर रक्षात्मक प्रकृति का है। यह तुर्किये के अन्य देशों के साथ पहले से मौजूद समझौतों या अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियों को कम नहीं करता।
समझौते में एक सदस्य पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा, जैसी भाषा का इस्तेमाल जरूर हुआ है, लेकिन इसमें यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि किसी सदस्य पर हमला होने पर अन्य सदस्यों को किस प्रकार की सैन्य कार्रवाई करनी होगी। यानी बतोलेबाजी से इतर मक्का समझौता नाटो के आर्टिकल 5 की तरह स्वतः युद्ध में शामिल होने की बाध्यता नहीं बनाता।
तुर्किये और पाकिस्तान दोनों का प्राथमिक आर्थिक व सुरक्षा हित इस बात में निहित है कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और अधिक न फैले। सीधे सैन्य हस्तक्षेप से पूरे क्षेत्र में व्यापक युद्ध भड़कने का जोखिम है।
इस समझौते का मुख्य मकसद तीनों देशों- सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये की संयुक्त सैन्य क्षमता का प्रदर्शन कर एक कूटनीतिक और रणनीतिक रोकथाम का तंत्र बनाना है, न कि हर हमले के जवाब में सीधे मोर्चे पर युद्ध लड़ना।
पाकिस्तान ने सऊदी की मदद न कर पाने में क्या मजबूरी बताई?
1. प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ
दूसरी तरफ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सऊदी अरब पर हूती मिसाइल और ड्रोन हमलों की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए इन्हें कायरतापूर्ण बताया और कहा कि ये हमले आम नागरिकों के जीवन तथा क्षेत्रीय शांति व सुरक्षा के लिए खतरा हैं। उन्होंने सऊदी अरब की संप्रभुता, सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता के प्रति पाकिस्तान के दृढ़ समर्थन और एकजुटता को दोहराया।
2. रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने ख्वाजा आसिफ ने जियो टीवी को दिए एक साक्षात्कार के दौरान समझौते की शर्तों और पाकिस्तान की नीति को स्पष्ट किया। उन्होंने भरोसा देते हुए कहा कि यह एक संयुक्त रक्षा समझौता है। पाकिस्तान इस समझौते की शर्तों से बंधा हुआ है और जरूरत पड़ने पर सऊदी अरब के प्रति अपनी प्रतिबद्धताओं को निभाएगा। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कोई आक्रामक समझौता नहीं है जिसके तहत तीनों देश अपनी पहल पर किसी तीसरे देश पर हमला कर दें। अगर किसी एक सदस्य देश के खिलाफ आक्रामकता होती है, तो तीनों सदस्य देश मिलकर उसका जवाब देंगे।
इतना ही नहीं उन्होंने हूतियों को चेतावनी दी कि वे यमन संघर्ष को सऊदी अरब की सीमा में न बढ़ाएं। अगर वे ऐसा करते हैं, तो आक्रामकता से निपटने वाले समझौते के प्रावधान लागू हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि हमें ईंट का जवाब पत्थर से देने की जरूरत नहीं है