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क्या अब सुधर जाएंगे सऊदी अरब-पाकिस्तान के रिश्ते? सउदी के राजनयिक ने की इमरान खान से मुलाकात

Thu, 24 Dec 2020 04:57 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, इस्लामाबाद

सार

पाकिस्तानी विशेषज्ञों के मुताबिक दोनों देशों के बीच तनाव की शुरुआत 2015 में हुई, जब सऊदी अरब ने पाकिस्तान से यमन में चल रहे गृह युद्ध में सेना भेजने को कहा। पाकिस्तान की संसद ने इस अनुरोध को ठुकरा दिया...
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imran khan,xi jinping,saudi prince - फोटो : पीटीआई
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विस्तार
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सऊदी अरब के इस्लामाबाद स्थित राजदूत नवफ बिन सईद अल-मलिकी की यहां पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान से हुई मुलाकात के बाद दोनों देशों के संबंधों को लेकर नए सिरे से कयास लगाए जा रहे हैं। पिछले कुछ समय से लगातार इन दोनों देशों के संबंधों में तनाव बढ़ रहा था। हाल में जब कोरोना महामारी के बीच सऊदी अरब ने पाकिस्तान से कर्ज की किस्त चुकाने के लिए मजबूर किया, तब उसे दोनों देशों के पारंपरिक रिश्तों में चौड़ी होती दरार का संकेत माना गया।

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हालांकि पाकिस्तान ने ये किस्त चीन से मदद लेकर चुकाई। पाकिस्तान ने सऊदी अरब से तीन अरब डॉलर का कर्ज लिया है। उसमें उसने एक अरब डॉलर पिछले हफ्ते उसने चीन से ऋण लेकर चुकाए। लेकिन इस हफ्ते हुई मुलाकात के बाद अंदाजा लगाया जा रहा है कि दोनों पक्ष अब मेलमिलाप की कोशिश कर रहे हैं। 
    

अल-मलिकी के साथ मुलाकात के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कार्यालय ने कहा था कि इस दौरान द्विपक्षीय संबंधों और कोविड-19 की स्थिति पर चर्चा हुई। कार्यालय ने कहा कि दोनों पक्षों ने पाकिस्तान-सऊदी अरब के दीर्घकालिक दोस्ताना संबंधों को और मजबूत बनाने का संकल्प लिया।
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गौरतलब है कि सऊदी अरब और पाकिस्तान दोनों इस्लामी दुनिया के बड़े देश हैं। इस्लाम धर्म के सबसे पवित्र स्थल सऊदी अरब में हैं और सऊदी अरब को उनका संरक्षक समझा जाता है। इसलिए इस्लामी दुनिया में उसकी खास अहमियत है। उधर पाकिस्तान अकेला इस्लामी देश है, जिसके पास परमाणु हथियार हैं। दोनों देशों के रिश्ते पारंपरिक रूप से मजबूत रहे हैं। लेकिन हाल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदलते हालात के बीच इस रिश्ते में कड़वाहट आई है।   

सऊदी अरब के अपने कर्ज चुकाने की समयसीमा पर अड़ जाने से पाकिस्तान में भारी नाराजगी पैदा हुई। पाकिस्तान के अखबार द डॉन ने एक संपादकीय में लिखा कि सऊदी अरब ऐसा करेगा, अतीत में यह सोचना भी मुश्किल था। डॉन ने लिखा कि दोनों देशों ने अमेरिका के नेतृत्व में अफगानिस्तान से तत्कालीन सोवियत संघ को बाहर निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वे दोनों देशों के रिश्तों के सुनहरे दिन थे, जब वे अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन में एक ही पाले में थे। लेकिन आज हालात बदल गए हैं।

विश्लेषकों का कहना है कि सऊदी अरब आज भी अमेरिकी खेमे में मजबूती से मौजूद है, जबकि पाकिस्तान इस खेमे से लगभग बाहर हो चुका है। वह आज चीन के ज्यादा करीब है। साथ ही रूस के साथ उसकी नई निकटता बनी है। चीन और रूस आज अमेरिका के प्रतिद्वंद्वी देश हैं। सऊदी अरब और पाकिस्तान का अलग-अलग खेमों में चले जाना उनके संबंधों में आए पेच का प्रमुख कारण है।

पाकिस्तानी विशेषज्ञों के मुताबिक दोनों देशों के बीच तनाव की शुरुआत 2015 में हुई, जब सऊदी अरब ने पाकिस्तान से यमन में चल रहे गृह युद्ध में सेना भेजने को कहा। पाकिस्तान की संसद ने इस अनुरोध को ठुकरा दिया। पाकिस्तान आज भी मानता है कि उसका यह फैसला सही था। वह परोक्ष रूप से यमन में उसके बाद देखी गई मानवीय त्रासदी के लिए सऊदी अरब को दोषी मानता है।

इस बीच इस्लामी दुनिया में नए समीकरण बने हैं। टर्की और मलेशिया एक नई धुरी बनाने की कोशिश में हैं। पाकिस्तान का रुख इस नए समीकरण के प्रति नरम रहा है। हालांकि पिछले साल सऊदी अरब के दबाव में आकर आखिरी वक्त पर पाकिस्तान ने मलेशिया में हुए इस्लामी शिखर सम्मेलन में ना जाने का फैसला किया था। पाकिस्तान की दुविधा यह है कि टर्की और मलेशिया कश्मीर का मसला उठाने में आगे रहे हैं, जबकि सऊदी अरब भारत से अपने मजबूत रिश्तों के कारण इस मामले में अकसर चुप रहा है।

लेकिन पाकिस्तान सऊदी अरब को ज्यादा नाराज नहीं कर सकता, क्योंकि उस पर पाकिस्तान की आर्थिक निर्भरता है। पाकिस्तान के दस लाख लोग सऊदी अरब में काम करते हैं, जिनकी वहां से भेजी जाने वाली कमाई का पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में खास योगदान रहता है। इसीलिए सऊदी अरब की नाराजगी से पाकिस्तान परेशान था। इसीलिए सऊदी राजदूत की इमरान खान के साथ बैठक पर कूटनीतिकों की खास निगाह रही और अब वे इसके संभावित परिणामों पर नजर रख रहे हैं।

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