रूस और पाकिस्तान का सैनिक अभ्यास आज से शुरू हो गया। यह 21 नवंबर तक चलेगा। ये साझा सैनिक अभ्यास दोनों देशों के बीच मजबूत होते संबंधों की सीधी मिसाल हैं। साथ ही इससे मध्य और दक्षिण एशिया में नई धुरी बनने की संभावना भी पैदा हुई है। इन अभ्यासों को कूटनीतिक हलकों में खास अहमियत दी जा रही है। यह अभ्यास ऐसे वक्त में हो रहा है जब भारत, अमेरिका, जापान व ऑस्ट्रेलिया भारतीय समुद्री क्षेत्र में मालाबार सैन्य अभ्यास कर रहे हैं।
पहले अमेरिकी खेमे में था पाकिस्तान
बीसवीं सदी के उत्तरार्ध और इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में रूस और पाकिस्तान के संबंध ठीक नहीं थे। पाकिस्तान को दशकों तक अमेरिकी खेमे का देश माना जाता था। रूस भारत का खास दोस्त था। लेकिन बीते कुछ वर्षों में समीकरण बदले हैं। भारत का अब अमेरिका से खास रिश्ता बन गया है। उधर रूस और पाकिस्तान करीब आए हैं। 2016 में दोनों देशों ने साझा सैनिक अभ्यास शुरू किए।
तीन बार पाक व दो बार रूस में हुए साझा अभ्यास
रूस-पाकिस्तान के इस बार के साझा अभ्यास का नाम द्रुझबा-5 रखा गया है। पाकिस्तान के सरकारी बयान के मुताबिक इसका मकसद आतंकवाद से लड़ने के अनुभवों को साझा करना है। इस बार ये अभ्यास पाकिस्तान तारबेला इलाके में हो रहे हैं। अब तक पांच में से तीन बार ये अभ्यास पाकिस्तान में और दो बार रूस में हुए हैं।
रूस का सैनिक खर्च ब्रिटेन से तीन गुना
रूस सैनिक ताकत के मामले में आज भी दुनिया की बड़ी ताकत है। अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ माइकल कॉफमैन के मुताबिक 2005 से 2018 के बीच उसने अपने सैनिक खर्च को बढ़ाकर दो गुना कर लिया। उसका सैनिक खर्च ब्रिटेन के सैनिक खर्च से तीन गुना ज्यादा है।
नाटो देशों से बेहतर है रूसी सेना
पश्चिमी जानकारों के मुताबिक रूस के पास आज भी बड़ी सेना है और युद्ध की तैयारी के लिहाज से वह चुस्त-दुरुस्त है। ब्रिटेन की रक्षा खुफिया एजेंसी के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल जिम हॉकनहल ने हाल में एक इंटरव्यू में कहा था कि रूस 30 दिन के भीतर आधुनिक हथियारों से लैस एक लाख फौज जुटा सकता है। इस मामले में उसकी क्षमता नाटो (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन) से भी बेहतर है। ले. ज. हॉकनहल ने बताया था कि रूस लगातार अभ्यासों के जरिए अपने सैनिकों को युद्ध के लिए तैयार रखता है। वह दो घंटे के नोटिस पर 5000 सैनिकों को हवाई जहाज से कहीं भेजने की तैयारी रखता है।
रूस व चीन के मजबूत हैं संबंध
जानकारों के मुताबिक पिछले दो दशक में रूस और चीन के बीच रक्षा सहयोग काफी मजबूत हुआ है। उच्च आधुनिक रक्षा तकनीक के मामले में चीन रूस से आगे निकल चुका है। उसकी टक्कर अब अमेरिका से है। लेकिन हथियार बनाने का रूस का ढांचा आज भी उससे मजबूत है। इसलिए इन दोनों देशों का सहयोग एक दूसरे को लाभ पहुंचाने वाला साबित हुआ है। चूंकि दोनों देश का टकराव अमेरिका और पश्चिमी देशों से है, इसलिए उनका संबंध मौजूदा सामरिक स्थितियों का एक तरह से तार्किक परिणाम भी है।
आतंकवाद से जोड़कर दिया अहम संदेश
इसीलिए पाकिस्तान से रूस के साझा सैनिक अभ्यास को सामरिक हलकों में अहम माना जाता है। पाकिस्तान के चीन से पहले से गहरे रक्षा संबंध हैं। पाकिस्तान अपनी रक्षा जरूरतों के लिए अब काफी हद तक चीन पर निर्भर है। पिछले पांच साल से अब इस कड़ी में रूस भी शामिल हो गया है। इस बार के सैनिक अभ्यास में आतंकवाद से लड़ाई का पहलू जोड़कर दोनों देशों ने जो संदेश देने की कोशिश है, उसे भी कूटनीतिज्ञ खास अहमियत दे रहे हैं। क्या यह इस मुद्दे पर पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर राहत देने की एक कोशिश है, इस सवाल पर कूटनीतिक हलकों में अटकलें लगाई जा रही हैं।