- आठ दिसंबर, 1989 को अमेरिका और रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) ने इस संधि पर हस्ताक्षर किए थे
- दोनों देशों के बीच जमीन से मार करने वाली मध्य दूरी की तक मार करने वाली मिसाइलों के परीक्षण पर रोक लगी
- परमाणु हमले का खतरे को दूर करने के लिए 310 से 3400 किलोमीटर तक क्षमता वाली मिसाइलें थी दायरे में
- अमेरिका की तरफ से राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन और सोवियत संघ के आखिरी राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाच्योव ने किए थे हस्ताक्षर
- 2 अगस्त, 2019 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस संधि से अलग होने की कर दी थी घोषणा
दुनिया में शुरू हो सकती है नई होड़
आईएनएफ संधि भले ही दुनिया की दो महाशक्तियों रूस और अमेरिका के बीच थीं, लेकिन अब तक इसका हवाला देकर अन्य देशों के मिसाइल परीक्षणों को भी सीमित रखा गया था। ऐसे में इन दोनों देशों के इस संधि से हटने का असर उन देशों पर भी दिखाई देगा, जो अभी तक चुपके-चुपके अपनी मिसाइल क्षमता बढ़ा रहे थे।
ये देश अब खुलकर मिसाइल परीक्षण करते दिखाई देंगे। खासतौर पर चीन इनमें अग्रणी है, जिसके बारे में पिछले साल अमेरिकी रक्षा विभाग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि उसकी बनाई 95 फीसदी मिसाइलें आईएनएफ संधि का उल्लंघन करती हैं। चीन के मिसाइल परीक्षणों का दायरा बढ़ाने पर भारत को भी इस होड़ में कूदने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।