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Ukraine: जेलेंस्की पर मंडराया दुनिया का 'कॉमेडियन राष्ट्रपति' होने का खतरा; यूक्रेन के खनिज पर ट्रंप की नजर

सार

  • बड़े असमंजस के मुहाने पर खड़ा यूक्रेन, न माया मिली और न मिले राम
  • 3 साल के युद्ध में खर्च की भरपाई के लिए यूक्रेन के खनिज पर ट्रंप की नजर
  • क्या अपने मिशन में सफल हो पाएंगे फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों
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वोलोडिमीर जेलेंस्की। - फोटो : x/@ZelenskyyUa
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विस्तार
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क्या यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमीर जेलेंस्की सच में एक 'कॉमेडियन राष्ट्रपति' साबित होने वाले हैं? पेशे से जेलेंस्की एक कॉमेडियन रहे हैं और उन पर 'दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय' वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। यूरोप यूक्रेन और जेलेंस्की को लेकर चिंतित जरूर है लेकिन किसी देश के पास कोई उपाय नहीं है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अमेरिका के अपने समकक्ष डोनाल्ड ट्रंप से मिलकर यूक्रेन के युद्ध से बाहर आने के लिए सम्मानजनक रास्ते की मांग की है। जबकि पुतिन और ट्रंप मुस्करा रहे हैं।
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राष्ट्रपति ट्रंप कभी भी यूक्रेन-रूस युद्ध के पक्ष में नहीं रहे। इसको लेकर जेलेंस्की की भूमिका को लेकर वह उन पर कॉमेडियन होने का तंज कसते रहे हैं। वह अभी जेलेंस्की को तानाशाह कहते हैं। ट्रंप ने इसी तरह के बयानों से पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन के नीतियों की कड़ी ओलोचना की थी। राष्ट्रपति चुनाव प्रचार में भी उन्होंने अमेरिका के लोगों से वादा किया था कि वह सत्ता में आए तो रूस-यूक्रेन युद्ध को रुकवा देंगे। मंडरा रहे आर्थिक मंदी के खतरे से दुनिया को बाहर ले आएंगे। अपने देश को ग्रेट अमेरिका बनाएंगे। राष्ट्रपति बनते ही ट्रंप ने बारी-बारी से नाटो संगठन, विश्व स्वास्थ्य संगठन, पेरिस के जलवायु परिवर्तन समझौते को झटका देना शुरू किया। यूक्रेन को भी झटका दे दिया और तत्काल प्रभाव से अमेरिका की सहायता पर रोक लगा दी।

बाइडन की नीति को ट्रंप ने उल्टा लटकाया
पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन जिस यूक्रेन को खाद पानी दे रहे थे और नाटो संगठन के सहयोग, यूरोप के साथ के बल पर राष्ट्रपति जेलेंस्की रूस से लड़ रहे थे, राष्ट्रपति ट्रंप की टीम ने उस नीति को उल्टा लटका दिया। संयुक्त राष्ट्र महासभा में यूरोपीय संघ की ओर से यूक्रेन पर हमले के लिए रूस के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पेश किया गया था। इस प्रस्ताव पर अमेरिका ने रूस का साथ देते हुए मतदान किया। यूक्रेन को उसके हाल पर छोड़ दिया। ब्रिक्स के सदस्य देश भारत-चीन समेत 65 देशों ने रूस के पक्ष में रुख अपनाते हुए मतदान में हिस्सा नहीं लिया। 
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यूरोपीय संघ का प्रस्ताव कमजोर पड़ा और यूक्रेन में शांति, शत्रुता को यथाशीघ्र खत्म करने, तनाव समाप्त करने की राष्ट्रपति ट्रंप की मंशा पर मुहर लग गई। राष्ट्रपति शी जिनपिंग, राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तीनों एक सीधी रेखा में हैं। यूरोप अमेरिकी रूख को मानने के लिए मजबूर है। महाशक्तियों के बीच में बन रही इस सहमति ने यूक्रेन की चिंताओं को काफी बढ़ा दिया है। राष्ट्रपति जेलेंस्की के दोनों हाथ खाली हैं। राष्ट्रपति जेलेंस्की गारंटी के साथ शांति मिलने की दशा में अपना पद छोड़ने के लिए भी तैयार हैं।  

अमेरिका मांग रहा है युद्ध में खर्च हुई सहायता राशि
राष्ट्रपति जेलेंस्की ने अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप को संदेश भेजा है। संदेश में कहा है कि वह तीन साल युद्ध के दौरान अमेरिका से मिले 500 अरब डॉलर को कर्ज नहीं मानते। उनके और तत्कालीन राष्ट्रपति बाइडन के बीच में बनी सहमति के आधार पर यह सहायता राशि है। कर्ज नहीं। जेलेंस्की ने कहा कि अमेरिका अपने 500 अरब डॉलर की भरपाई के लिए यूक्रेन के खनिज चाहता है। 

गौरतलब है कि तीन साल चला यह युद्ध चौथे साल में प्रवेश कर गया है। इन तीन सालों में दोनों देशों के करीब 2 लाख सैनिक मारे गए। 10 लाख यूक्रेन के लोगों ने घर बार छोड़कर बाहर शरण ले ली। 20 लाख से अधिक बच्चे त्रासदी का शिकार हुए। इस तबाही का मंजर तिना खतरनाक है कि कभी अपनी समृद्धता से इतराने वाले यूक्रेन में हर ओर युद्ध के विभिषिका की निशानी है। खरबों डॉलर का नुकसान हुआ। ऐसा नहीं है कि नुकसान के मामले में रूस के हाथ नहीं जले हैं। रूस के सैनिक भी यूक्रेन से लड़ते-लड़ते न केवल पश्त हुए हैं, बल्कि उसकी सामरिक क्षमता पर बड़ा असर पड़ा है। टैंक, युद्धपोत, विध्वंसक सभी की हानि हुई है।

क्या यूक्रेन को मिलेगा नाटो संगठन का सहारा?
यूक्रेन का युद्ध नाटो संगठन की उसकी सदस्यता की मंशा से शुरू हुआ था। यूक्रेन-रूस युद्ध की समाप्ति के लिए राष्ट्रपति ट्रंप और राष्ट्रपति पुतिन के अधिकारी चर्चा कर रहे हैं। ट्रंप बहुत हार्ड बार्गेनर माने जाते हैं। रूस, खासकर पुतिन क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर बहुत संवेदनशील रहते हैं। इसलिए यूक्रेन को नाटो संगठन के सदस्यता की संभावना यहीं से क्षीण हो जाती है। यूक्रेन की रूस से और क्षेत्रीय सुरक्षा जरूर एक बड़ा मुद्दा है। देखना होगा कि इस मामले में विश्व की दोनों महाशक्तियों का रुख क्या रहता है। 

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप यूरोपीय संघ और फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों की कितनी सुनते हैं। ब्रिटेन के पास हमेशा से अमेरिका को सुनने के सिवाय कोई चारा नहीं रहता। रूस और उसके कारोबारियों की चिंता दुनिया में अपने कारोबार, अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों को लेकर है। समझा जा रहा है कि राष्ट्रपति ट्रंप की टीम इन सबके बीच रास्ता निकालने में जुटी है। भारत के आर्थिक मामले के जानकारों का भी मानना है कि रूस-यूक्रेन युद्ध के समाप्त होने के बाद दुनिया में स्थिरता को बढ़ावा मिलेगा। इस विश्व के मंदी की तरफ जाने की संभावना तेजी से कम होगी।
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