यूक्रेन युद्ध शुरू होने के छह महीने बाद अब यूरोप अपने संकट में अधिक उलझता जा रहा है। नतीजतन पूरे यूरोप में यूक्रेन के प्रति समर्थन जताने का अब पहले जैसा उत्साह नहीं रह गया है। रूस ने बीते 24 फरवरी को यूक्रेन में अपनी विशेष सैनिक कार्रवाई शुरू की थी। बुधवार को युद्ध शुरू हुए छह महीने पूरे हो गए हैं।
इस बीच पूरे यूरोप में बिगड़ती आर्थिक स्थिति के बीच ठंड के मौसम को लेकर चिंता और गहरा गई है। जानकारों ने कहा है कि सर्दी का अगला सीजन यूरोप के लिए अग्निपरीक्षा की तरह होगा। मंगलवार को जारी हुए आंकड़ों ने यूरोप भर में आर्थिक मुश्किलों के और बढ़ने का संकेत दिया। यूरोपियन यूनियन (ईयू) में एसएंडपी ग्लोबल का परचेजिंग पॉवर इंडेक्स (पीएमआई) अगस्त में गिर कर 49.2 पर पहुंच गया है। जुलाई में यह 49.9 था। यह इंडेक्स कुल आर्थिक सेहत का संकेत देता है। इसके 50 से नीचे जाने का मतलब यह होता है कि अर्थव्यवस्था मंदी की तरफ जा रही है।
कॉमर्जबैंक में विश्लेषक क्रिस्टोफ वील ने एक समाचार एजेंसी से कहा- ‘अगस्त में पीएमआई में गिरावट जारी रहने का मतलब है कि सर्दियों के मध्य तक अर्थव्यवस्था के मंदीग्रस्त हो जाने की आशंका बढ़ रही है। रूस सीमित मात्रा में गैस सप्लाई कर रहा है। महंगाई दर ऊंची रहने के कारण आम घरों की तिजोरी में सेंध लग रही है, कंपनियां गहरे अनिश्चय का शिकार हैं और अर्थव्यवस्था संकट में दिख रही है।’ अगस्त में ईयू की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं जर्मनी और फ्रांस में गिरावट का रुख दर्ज हुआ।
कुल मिला कर बीते छह महीनों में यूरोपीय अर्थव्यवस्था बुरी तरह जख्मी हुई है। सर्दियों में हालात और बिगड़ने का अंदेशा है, जब घरों को गर्म रखने के लिए प्राकृतिक गैस और बिजली की मांग बढ़ जाएगी। पिछले साल तक यूरोप की जरूरत की 55 फीसदी गैस रूस से आती थी। इस बार ये सप्लाई अनिश्चित हो गई है।
अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन के एक विश्लेषण में कहा गया है कि बीते छह महीनों में रूस के खिलाफ सख्ती बरतने के मुद्दे पर यूरोपीय देशों में एकता बनी रही है। लेकिन सर्दियों में ये एकता बनाए रखना मुश्किल हो सकता है। कुछ दूसरे अधिकारियों ने कहा है कि यूक्रेन को हथियारों की सप्लाई की रणनीति अब पहले जितनी कारगर नहीं दिख रही है। यह एक अल्पकालिक रणनीति थी, लेकिन लंबे खिंचते युद्ध में इसका असर पहले जैसा नहीं रह गया है। नाटो (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन) के एक अधिकारी ने सीएनएन से कहा- ‘युद्थ की शुरुआत में पश्चिमी देशों का रुख उससे कहीं ज्यादा सख्त रहा, जितना रूस ने सोचा था। लेकिन बुरी खबर यह है कि युद्ध जितना लंबा खिंच रहा है, उसमें अल्पकालिक मकसद से दिए गए हथियार कारगर नहीं हो रहे हैं।’
कई दूसरे अधिकारियों ने भी अपना नाम ना छापने की शर्त पर सीएनएन से बातचीत में संभावना जताई कि युद्ध से थकान के कारण पश्चिमी देश रूस से समझौते की तरफ कदम बढ़ा सकते हैं। एक अधिकारी ने कहा- ‘फरवरी में पुतिन विरोधी कारवां में शामिल होना आसान था। अब युद्ध ऊबाऊ हाल में पहुंच गया है। रोजमर्रा के स्तर पर अब इसमें कम सफलताएं या विफलताएं हाथ लग रही हैं।’ संभवतः इसी स्थिति का परिणाम है कि जर्मनी और फ्रांस जैसे अब रूस से बातचीत शुरू करने की वकालत करने लगे हैं।